अभिव्यक्ति की आजादी के आवरण में फैलती ईशनिंदा
प्रकाशित: 17-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
चुनावी बयार के बाद सनातन विरोधियों के स्वर एक बार फिर मुखरित होने लगे हैं। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर फिर से विवादित बयान दिया। उन्होंने फिर से सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही है। है। इस दौरान राज्य के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय उर्फ जोसेफ विजय चंद्रशेखर भी सदन में मौजूद थे जिन्होंने पूरे भाषण को ध्यान से सुना ही नहीं बल्कि अन्त में हाथ जोडकर अपनी सहमति भी जताई। विगत 2023 के 2 सितंबर को योजनाबद्ध ढंग से सनातन उन्मूलन सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि कुछ चीजों का विरोध नहीं किया जा सकता, उन्हें खत्म कर देना चाहिए। हम डेंगू, मच्छर, मलेरिया या कोरोना वायरस का विरोध नहीं कर सकते हैं। हमें इन्हें खत्म करना होगा। इसी तारतम्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के तत्कालीन सांसद ए राजा ने भी सनातन धर्म के खिलाफ जमकर जहर उगला था। ए राजा ने कहा था कि सनातन की तुलना एचआईवी और कुष्ठ रोग जैसी सामाजिक कलंक वाली बीमारियों से करनी चाहिए। इसी तरह हम सनातन धर्म का भी विरोध नहीं कर सकते, इसे खत्म करना है। उस समय आपत्तिजनक टिप्पणी से सनातन परम्पराओं को मानने वालों की भावनायें ही आहत नहीं हुई थी बल्कि सम्प्रदायगत संघर्ष की स्थितियां भी निर्मित होने लगीं थी तब विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के 14 पूर्व न्यायाधीशों, 130 पूर्व नौकरशाहों और 118 रिटायर्ड आर्म्ड फोर्सेज ऑफिसर्स सहित देश के 262 प्रतिष्ठित नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर तमिलनाडु सरकार में तत्कालीन मंत्री और डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म को खत्म करने वाली टिप्पणी पर संज्ञान लेने का आग्रह किया था। उन्हीं उदयनिधि स्टालिन द्वारा अब विधानसभा में दिये गये वक्तव्य का समर्थन करते हुए सत्ताधारी तमिलगा वेट्री कज़गम यानी टीवीके पार्टी के विधायक वी.एम.एस. मुस्तफा ने आग में घी का काम किया है। उल्लेखनीय है कि वंशवादी परम्परा से जन्मजात नेता बनने वाले उदयनिधि स्टालिन के पिता मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन यानी एम.के. स्टालिन तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके भी पिता मुथुवेल करुणानिधि उर्फ एम करुणानिधि भी राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। तमिलनाडु के इसाई वेल्लार समुदाय के इस परिवार ने हमेशा ही सनातन का खुला विरोध ही नहीं किया बल्कि धर्मगत युद्ध का धरातल तैयार करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी। इतिहास गवाह है कि वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा के आधार पर समूची सृष्टि के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले सनानत धर्म की शाश्वत उपस्थिति के संकेत आदिकाल से ही मिलते रहे हैं जिसे महात्मा मूसा ने 3000 वर्ष पूर्व बाइबल ओल्ड टेस्टामेन्ट में, महात्मा जरथुस्त्र ने 2700 वर्ष पूर्व अवेस्ता में, भगवान महावीर ने 2600 वर्ष पूर्व सूत्रग्रन्थ में, महात्मा बुद्ध ने 2500 वर्ष पूर्व त्रिपिटक में, ईसा मसीह ने 2000 वर्ष पूर्व बाइबल न्यू टेस्टामेंट में, हजरत मुहम्मद साहब ने 1400 वर्ष पूर्व कुरान शरीफ में, आदिगुरु शंकराचार्य ने 1200 वर्ष पूर्व, संत कबीर साहब ने 600 वर्ष पूर्व, गुरु नानक देव ने 500 वर्ष पूर्व, स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 200 वर्ष पूर्व तथा स्वामी परमानन्द जी ने लगभग 100 वर्ष पूर्व पुष्ट ही किया है। प्रेम, सौहार्द, अपनत्व और भाईचारा की आधारशिला पर स्थापित सनातन पर संकीर्ण मानसिकता के विभाजनाकारियों द्वारा हमेशा ही आघात किया जाता रहा है। शक्ति, सत्ता और षड्यंत्रों का सहारा लेकर हमेशा से ही मीरजाफरों की जमातों ने अपने करतब दिखाने की कोशिशें की हैं। राजनैतिक खेमे ने तो हमेशा ही गिरगिट को अपना आदर्श माना है। चुनावी दौर में माला, मंत्र और मंदिरों का ढोंग रचा। जालीदार टोपी पहनकर मजारों पर चादर चढाई। सफेद पोशाक में मोमबत्ती लेकर चर्चों में गये। जातिगत देवताओं के देवालयों में माथा टेका। अभिनय की चरमसीमा पर पहुंच चुके राजनेताओं की अनेक जमातें वर्तमान के वैश्विक अशान्ति काल में भी अपने षड्यंत्रों को अल्पविराम तक नहीं दे रहीं हैं। जन्मजात नेताओं के साथ-साथ सम्प्रदायगत, जातिगत, उपजातिगत, भाषागत, क्षेत्रगत नेताओं की बाढ़ सी आ गई है। राष्ट्रधर्म को तिलांजलि देकर ये सभी रंगे सियार विभाजनकारी षड्यंत्र करने में जुटे हैं। काल के गाल में पहुंचने वाली स्थितियों के संकेत मिलने के बाद भी वे स्वयं को अमर मानते हुए भौतिक संचय में जी जान से जुटे हैं। कभी धर्म को संघर्ष का मुद्दा बनाया जाता है तो कभी जातियों को लड़ाने का आधार तैयार किया जाता है। कभी भाषा का भेद पैदा किया जाता है तो कभी क्षेत्रगत वैमनुष्यता फैलाई जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी के आवरण में ईशनिंदा करने वाले केवल और केवल सनातन पर ही कुठाराघात करने का साहस कर पाते हैं। उन्हें मालूम है कि शान्ति के पुजारियों को शक्ति की सामर्थ से प्रताड़ित करना आसान है। अन्य किसी धर्म के विरोध में एक भी शब्द बोलना, मौत को आमंत्रण देने जैसा है। सरलता, विनम्रता और सहयोग जैसे गुणों को सनातन धर्मावलंबियों की कमजोरी मानने वाले आतिताई हमेशा ही मनमानियां करते रहे हैं। अतीतकालीन घटनाओं पर यदि संविधान के विभिन्न अंगों ने स्वत संज्ञान लेकर तत्काल कडी कार्यवाही की होती तो सदन के अंदर देश के एक बडे वर्ग को अपमानित करने का कोई भी नेता दुस्साहस नहीं हो सकता था। इस तरह के षड्यंत्रों को अमली जामा पहनाने वालों को सबक सिखाने हेतु अब आम आवाम को स्वयं ही आगे आना होगा अन्यथा वे बांटो और राज्य करो की आक्रान्ता नीतियों पर सत्ता, शक्ति और सामर्थ से देश के निरीह निवासियों का निरंतर शोषण करते रहेंगे।
चुनावी बयार के बाद सनातन विरोधियों के स्वर एक बार फिर मुखरित होने लगे हैं। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर फिर से विवादित बयान दिया। उन्होंने फिर से सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही है। है। इस दौरान राज्य के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय उर्फ जोसेफ विजय चंद्रशेखर भी सदन में मौजूद थे जिन्होंने पूरे भाषण को ध्यान से सुना ही नहीं बल्कि अन्त में हाथ जोडकर अपनी सहमति भी जताई। विगत 2023 के 2 सितंबर को योजनाबद्ध ढंग से सनातन उन्मूलन सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि कुछ चीजों का विरोध नहीं किया जा सकता, उन्हें खत्म कर देना चाहिए। हम डेंगू, मच्छर, मलेरिया या कोरोना वायरस का विरोध नहीं कर सकते हैं। हमें इन्हें खत्म करना होगा। इसी तारतम्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के तत्कालीन सांसद ए राजा ने भी सनातन धर्म के खिलाफ जमकर जहर उगला था। ए राजा ने कहा था कि सनातन की तुलना एचआईवी और कुष्ठ रोग जैसी सामाजिक कलंक वाली बीमारियों से करनी चाहिए। इसी तरह हम सनातन धर्म का भी विरोध नहीं कर सकते, इसे खत्म करना है। उस समय आपत्तिजनक टिप्पणी से सनातन परम्पराओं को मानने वालों की भावनायें ही आहत नहीं हुई थी बल्कि सम्प्रदायगत संघर्ष की स्थितियां भी निर्मित होने लगीं थी तब विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के 14 पूर्व न्यायाधीशों, 130 पूर्व नौकरशाहों और 118 रिटायर्ड आर्म्ड फोर्सेज ऑफिसर्स सहित देश के 262 प्रतिष्ठित नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर तमिलनाडु सरकार में तत्कालीन मंत्री और डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म को खत्म करने वाली टिप्पणी पर संज्ञान लेने का आग्रह किया था। उन्हीं उदयनिधि स्टालिन द्वारा अब विधानसभा में दिये गये वक्तव्य का समर्थन करते हुए सत्ताधारी तमिलगा वेट्री कज़गम यानी टीवीके पार्टी के विधायक वी.एम.एस. मुस्तफा ने आग में घी का काम किया है। उल्लेखनीय है कि वंशवादी परम्परा से जन्मजात नेता बनने वाले उदयनिधि स्टालिन के पिता मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन यानी एम.के. स्टालिन तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके भी पिता मुथुवेल करुणानिधि उर्फ एम करुणानिधि भी राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। तमिलनाडु के इसाई वेल्लार समुदाय के इस परिवार ने हमेशा ही सनातन का खुला विरोध ही नहीं किया बल्कि धर्मगत युद्ध का धरातल तैयार करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी। इतिहास गवाह है कि वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा के आधार पर समूची सृष्टि के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले सनानत धर्म की शाश्वत उपस्थिति के संकेत आदिकाल से ही मिलते रहे हैं जिसे महात्मा मूसा ने 3000 वर्ष पूर्व बाइबल ओल्ड टेस्टामेन्ट में, महात्मा जरथुस्त्र ने 2700 वर्ष पूर्व अवेस्ता में, भगवान महावीर ने 2600 वर्ष पूर्व सूत्रग्रन्थ में, महात्मा बुद्ध ने 2500 वर्ष पूर्व त्रिपिटक में, ईसा मसीह ने 2000 वर्ष पूर्व बाइबल न्यू टेस्टामेंट में, हजरत मुहम्मद साहब ने 1400 वर्ष पूर्व कुरान शरीफ में, आदिगुरु शंकराचार्य ने 1200 वर्ष पूर्व, संत कबीर साहब ने 600 वर्ष पूर्व, गुरु नानक देव ने 500 वर्ष पूर्व, स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 200 वर्ष पूर्व तथा स्वामी परमानन्द जी ने लगभग 100 वर्ष पूर्व पुष्ट ही किया है। प्रेम, सौहार्द, अपनत्व और भाईचारा की आधारशिला पर स्थापित सनातन पर संकीर्ण मानसिकता के विभाजनाकारियों द्वारा हमेशा ही आघात किया जाता रहा है। शक्ति, सत्ता और षड्यंत्रों का सहारा लेकर हमेशा से ही मीरजाफरों की जमातों ने अपने करतब दिखाने की कोशिशें की हैं। राजनैतिक खेमे ने तो हमेशा ही गिरगिट को अपना आदर्श माना है। चुनावी दौर में माला, मंत्र और मंदिरों का ढोंग रचा। जालीदार टोपी पहनकर मजारों पर चादर चढाई। सफेद पोशाक में मोमबत्ती लेकर चर्चों में गये। जातिगत देवताओं के देवालयों में माथा टेका। अभिनय की चरमसीमा पर पहुंच चुके राजनेताओं की अनेक जमातें वर्तमान के वैश्विक अशान्ति काल में भी अपने षड्यंत्रों को अल्पविराम तक नहीं दे रहीं हैं। जन्मजात नेताओं के साथ-साथ सम्प्रदायगत, जातिगत, उपजातिगत, भाषागत, क्षेत्रगत नेताओं की बाढ़ सी आ गई है। राष्ट्रधर्म को तिलांजलि देकर ये सभी रंगे सियार विभाजनकारी षड्यंत्र करने में जुटे हैं। काल के गाल में पहुंचने वाली स्थितियों के संकेत मिलने के बाद भी वे स्वयं को अमर मानते हुए भौतिक संचय में जी जान से जुटे हैं। कभी धर्म को संघर्ष का मुद्दा बनाया जाता है तो कभी जातियों को लड़ाने का आधार तैयार किया जाता है। कभी भाषा का भेद पैदा किया जाता है तो कभी क्षेत्रगत वैमनुष्यता फैलाई जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी के आवरण में ईशनिंदा करने वाले केवल और केवल सनातन पर ही कुठाराघात करने का साहस कर पाते हैं। उन्हें मालूम है कि शान्ति के पुजारियों को शक्ति की सामर्थ से प्रताड़ित करना आसान है। अन्य किसी धर्म के विरोध में एक भी शब्द बोलना, मौत को आमंत्रण देने जैसा है। सरलता, विनम्रता और सहयोग जैसे गुणों को सनातन धर्मावलंबियों की कमजोरी मानने वाले आतिताई हमेशा ही मनमानियां करते रहे हैं। अतीतकालीन घटनाओं पर यदि संविधान के विभिन्न अंगों ने स्वत संज्ञान लेकर तत्काल कडी कार्यवाही की होती तो सदन के अंदर देश के एक बडे वर्ग को अपमानित करने का कोई भी नेता दुस्साहस नहीं हो सकता था। इस तरह के षड्यंत्रों को अमली जामा पहनाने वालों को सबक सिखाने हेतु अब आम आवाम को स्वयं ही आगे आना होगा अन्यथा वे बांटो और राज्य करो की आक्रान्ता नीतियों पर सत्ता, शक्ति और सामर्थ से देश के निरीह निवासियों का निरंतर शोषण करते रहेंगे।