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देश विरोधी सोच

प्रकाशित: 17-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
देश विरोधी सोच
देश के राजनेता और राजनीतिक पार्टियों को जब अपने से ज्यादा दूसरे के हितों की किसी भी कारणवश चिन्ता सताए तो उस देश का बंटाधार होना निश्चित है। भारत सरकार अपने बड़े सुरक्षा रणनीतिक उद्देश्य के लिए ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। ग्रेट निकोबार द्वीप, मलक्का जलडमरूमध्य के एकदम निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त मार्गें में से एक है। इस क्षेत्र में मजबूत मौजूदगी होने से भारत वैश्विक समुद्री मार्गों और हिन्द महासागर में चीनी गतिविधियों पर नजर रख सकेगा। चीन की चिन्ता को अपनी चिन्ता मानने वाले भारतीय नेताओं का सक्रिय होना स्वाभाविक है। इसीलिए जब रविवार को कांग्रेस के एक बड़े नेता और चीन के भारत में प्रचण्ड समर्थक जयराम रमेश ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर दोबारा अनुराध किया कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया जाए क्योंकि इससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान होगा बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय की भावनाओं की उपेक्षा भी होगी।
दरअसल जयराम रमेश ने इस मेगा प्रोजेक्ट के खिलाफ पहले भी रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पाटी की तरफ से अपनी चिन्ता व्यक्त कर चुके हैं। इसके बाद पाटी के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने भी उन क्षेत्रों का दौरा किया जहां भारत सरकार ने 92000 करोड़ रुपए से इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना का श्री गणेश करने जा रही है। सवाल यूं ही नहीं पूछे जाते कि कांग्रेस और चीन के बीच यह कैसा रिश्ता है कि जब भी चीनी हितों को भारतीय नीति, रणनीति या निर्माण से चुनौती की संभावना होती है तो इस पाटी के नेताओं के पेट में ऐंठन शुरू हो जाती है।
यह सच है कि पर्यावरण देश की बहुत बड़ी चिन्ता है किन्तु जो रणनीतिक अथवा व्यापारिक परियोजनाएं अपरिहार्य हैं, उन्हें तो पूरा करना ही होगा। विकास और पर्यावरण में संतुलन बैठाना सरकार का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। यदि समुद्री जीवों की इतनी ही चिन्ता की जाए तो बन्दरगाह निर्माण और विकास का कोई कार्य ही नहीं हो सकता। आज तो बढ़ती जनसंख्या और टैफिक की जरूरतों को देखकर सरकारें समुद्र तल पर रोड निर्माण की परियोजनाएं बनाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस सरकार के दौरान जयराम रमेश खुद पर्यावरण मंत्री थे और सरकार नेवीगेशन के लिए रामसेतु तोड़ने के लिए सेतु समुद्रम परियोजना को मंजूरी दे दी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू पक्ष की आस्था की उपेक्षा के मुद्दे पर अनुमति देने से मना कर दिया था। अब तो इस परियोजना पर विचार होना ही असंभव है।
सच तो यह है कि चीन अपने कुछ पालतू बुद्धिजीवियों और राजनेताओं को खरीदकर रखता है जो उसको जरूरत पड़ने पर परोक्ष रूप से समर्थन करते हैं। चीन ने तो प्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस पाटी से एमओयू कर रखा है कि यह पाटी एक दूसरे के हितों के लिए काम करेंगे। संयोग देखिए चीन में ओलम्पिक के आयोजन के अवसर पर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आमंत्रित था और जयराम रमेश भी वहीं पर मौजूद थे। जब कांग्रेस की तरफ से एमओयू पर हस्ताक्षर राहुल गांधी ने की तो उस वक्त यही जयराम रमेश ज्ञान बांट रहे थे कि उन्हें इस बात को जानकर हैरानी होती है कि आखिर भारत के वाणिज्य विभाग में कार्यरत वरिष्ठ अधिकारी चीनी व्यापारिक प्रस्तावों पर तत्काल मंजूरी देने में देर क्यों करते हैं! मजे की बात तो यह है कि जब वाणिज्य मंत्रालय के मंत्री सार्वजनिक रूप से किसी देश की धरती पर अपने ही विभाग के अधिकारियों की आलोचना करेंगे तो उसका क्या असर पड़ेगा अफसरशाही पर!
लब्बोलुआब यह है कि हित कोई भी हो, वह राष्ट्रहित से बड़ा कदापि नहीं हो सकता। चीन ने तो पाकिस्तान में ग्वादर, बांग्लादेश का चटगांव और श्रीलंका में हम्बनटोटा जैसे बंदरगाह बनाकर भारत के खिलाफ घेराबन्दी कर चुके हैं और आज जब भारत ‘ग्रेट निकोबार परियोजना' के माध्यम से चीन की परवाह किए बगैर अपने रणनीतिक महत्व को मान्यता देने का साहसिक एवं सराहनीय परियोजना शुरू करने जा रहा है तो चीन के समर्थन में भारत के ही कुछ राजनेता इस परियोजना की बेशमी से आलोचना कर रहे हैं। 1962-63 में यही काम भारतीय कम्यूनिस्ट पाटी ने भी किया था। जब भारतीय सैनिक चीनी सैनिकों के खिलाफ रक्षात्मक भूमिका निभा रहे थे तो भारत के कामरेड हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू और भारतीय सेना को हमलावर बता कर युद्ध के लिए दोनों को जिम्मेदार बता रहे थे। उस विचारधारा का तो सत्यानाश हो गया। आज वह विचार धारामात्र जेएनयू तक सिमट कर रह गई है पता नहीं, कांग्रेस के कुछ लोग उसी विचारधारा को गले में लपेट कर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पाटी को उच्छिन्न करने पर तुले हैं। ऐसे लोग देश में राष्ट्रीय हितों के खिलाफ तो काम करते ही हैं, अपनी पाटी की भी छवि खराब करते हैं।