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ईरान बनाम अफगानिस्तान: शरिया में महिलाओं की तुलनात्मक स्थिति

प्रकाशित: 01-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
तनवीर ज़ाफरी
इस्लामी जीवन पद्धति और क़ानूनी व्यवस्था को शरिया कहते हैं। शरिया में इबादत, खान-पान, पहनावा, व्यापार, विवाह, तल़ाक, विरासत, अपराध और सज़ा जैसे जीवन के तमाम पहलू शामिल हैं। इसके द्वारा क़ुरान, सुन्नत, हदीस, इज्मा व क़यास जैसे पुराने स्थापित नियमों के आधार पर नए ज़माने की समस्याओं का हल निकालने का दावा किया जाता है। परन्तु आज के आधुनिक दौर में सऊदी अरब, अ़फग़ानिस्तान व ईरान जैसे देशों में जहां शरिया को देश के मुख्य संविधान और आपराधिक क़ानून के रूप में लागू किया गया है वहीं भारत, पाकिस्तान, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में शरिया केवल पर्सनल लॉ' विवाह, तल़ाक, संपत्ति तक ही सीमित है, जबकि इन्हीं देशों में अपराधिक मामलों के लिए देश का धर्मनिरपेक्ष क़ानून लागू होता है। अ़फग़ानिस्तान की तालिबान सरकार व संगठन शरिया के नाम पर अत्यंत रूढ़िवादी और क़बीलाई व्याख्या लागू करती है। जबकि पाकिस्तान में भी शरिया क़ानून पूरी तरह लागू नहीं है, बल्कि वहाँ एक हाइब्रिड या मिश्रित क़ानूनी प्रणाली काम करती है। जिसमें ब्रिटिश काल के धर्मनिरपेक्ष सामान्य क़ानून और इस्लामी शरिया क़ानून दोनों का मिश्रण है। सवाल यह है कि जब इस्लाम धर्म का कलमा एक, क़ुरआन एक, रसूल एक नमाज़, रोज़ा हज, ज़कात सब एक तो इस्लामी देशों में ही शरिया क़ानून की व्याख्या अलग अलग क्यों? और यदि अलग है तो इसमें सही कौन और ग़लत कौन? और दुनिया किस शरिया व्यवस्था को सही व इस्लामी शरिया के रूप में देखे? इसी सन्दर्भ में केवल ईरान व अ़फग़ानिस्तान में लागू शरिया क़ानून व इसके अंतर्गत दोनों देशों में महिलाओं की स्थिति व उनपर पड़ने वाले प्रभाव का जायज़ा लेने की कोशिश करते हैं।
अ़फग़ानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान गत पांच वर्षों में वहां की महिलाओं की स्थिति को लेकर जो रिपोर्ट्स संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक मानवाधिकार संगठनों द्वारा तैयार की गयी है उसके मुताब़िक वहाँ महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। रिपोर्ट्स के अनुसार अ़फग़ानिस्तान में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। अ़फग़ानिस्तान दुनिया का एक मात्र देश है जहां लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित है। यहाँ कक्षा 6 से आगे लड़कियों के स्कूल जाने और महिलाओं के विश्वविद्यालय जाने पर पूरी तरह रोक है। तालिबान ने विश्वविद्यालयों से महिलाओं से जुड़े 18 कोर्स हटा दिए हैं और महिलाओं द्वारा लिखी गई लगभग 140 किताबों को भी प्रतिबंधित कर दिया है। ऐसी ही सख्त पाबंदियों के चलते अब अ़फग़ानिस्तान में केवल 7ज्ञ् महिलाएँ ही रोज़गार में बची हैं। यहां महिलाओं को ग़ैर-सरकारी संगठनों, सरकारी मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्रों में काम करने से रोक दिया गया है। ब्यूटी पार्लर्स को भी पूरी तरह बंद कर दिया गया है, जिससे लाखों महिलाओं की कमाई का ज़रीया छिन गया। नए तालिबानी क़ानून और क्रिमिनल कोड वर्ष 2026 में तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुनज़ादा द्वारा हस्ताक्षरित 90 पन्नों की नई दंड संहिता ने महिलाओं की स्थिति को दासों जैसा बना दिया है। इस नए क़ानून के तहत पति को अपनी पत्नी या बेटी को शारीरिक सज़ा देने यानी उसे पीटने की अनुमति है, बशर्ते कि महिला की कोई हड्डी न टूटे या शरीर पर गहरा खुला घाव न दिखाई दे।
अ़फग़ानिस्तान में यदि कोई महिला अदालत जाना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढके होकर अपने उसी पुरुष अभिभावक, पति या भाई के साथ आना होगा, जिसने उस पर अत्याचार किया है। महिलाओं से तल़ाक का अधिकार छीन लिया गया है, जबकि बाल विवाह को बढ़ावा देने वाले नियमों को कड़ा किया गया है। महिलाएँ बिना किसी पुरुष रिश्तेदार के घर से बाहर लंबी दूरी की यात्रा व सार्वजनिक परिवहन का उपयोग नहीं कर सकतीं। यहाँ सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के ऊँची आवाज़ में बोलने पर भी पाबंदी लगा दी गई है। महिलाओं के पार्क, जिम, मनोरंजन केंद्रों और मेलों में जाने पर पूरी तरह रोक है। लड़कियों की मेडिकल शिक्षा बंद होने के कारण आने वाले समय में देश में महिला डॉक्टरों और दाइयों की भारी कमी होने वाली है। अ़फग़ान संस्कृति में महिलाएँ पुरुष डॉक्टरों से इलाज नहीं करवा सकतीं, जिसके कारण डॉक्टरों और दाइयों की कमी से मातृ मृत्यु दर में 50ज्ञ् से अधिक की वृद्धि की आशंका जताई गई है। इस तालिबानी दमनकारी माहौल के कारण अ़फग़ान महिलाओं में मानसिक अवसाद, अकेलेपन और आत्महत्या की प्रवृत्तियों में भारी उछाल आया है। यहाँ की 70ज्ञ् से अधिक महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहद ख़राब है। विभिन्न वैश्विक मंचों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार तालिबान के इस क्रूर तंत्र का विरोध किया जा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती और तालिबान की हठधर्मी के कारण अ़फग़ान महिलाओं की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। वास्तव में अ़फग़ानिस्तान मेंशरिया का कम वहाँ की स्थानीय पश्तून क़बीलाई संस्कृति का अधिक प्रभाव है।
उधर ईरान के शरिया मॉडल व इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों व हदीस अनुसार, ज्ञान प्राप्त करना हर मुस्लिम पुरुष और महिला का कर्तव्य है। यहाँ महिलाओं को पीएचडी और चिकित्सा सहित उच्च शिक्षा प्राप्त करने की पूरी अनुमति है।ईरान में महिलाओं की शिक्षा पर कोई प्रतिबंध न होने की वजह से ही यहाँ महिला साक्षरता दर 85ज्ञ् से अधिक है। इसके अलावा, ईरान के विश्वविद्यालयों में 50ज्ञ् से 60ज्ञ् छात्र महिलाएँ हैं, जो विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। अधिकांश वैश्विक इस्लामी विद्वान ईरान के इस क़दम को शरिया के अनुकूल मानते हैं। ईरान के शरिया मॉडल में महिलाओं को संपत्ति रखने, व्यापार करने और अपनी कमाई पर पूरा अधिकार रखने की स्वतंत्रता दी गई है। ग़ौर तलब है कि पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद की पत्नी हज़रत ख़दीजा स्वयं एक बड़ी व्यवसायी थीं। ईरान में महिलाएँ डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और संसद सदस्य बन सकती हैं। वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकती हैं, जो शरिया के आर्थिक अधिकारों के दायरे में आता है। ईरान में हिजाब या शालीनता शरिया का एक हिस्सा है, लेकिन इसे लागू करने के तऱीकों पर विवाद है। यहाँ हिजाब अर्थात बालों को ढकना अनिवार्य है और इसका उल्लंघन करने पर नैतिकता पुलिस द्वारा सज़ा भी दी जाती है। मानवाधिकार विशेषज्ञ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शरिया की अति-कट्टर व्याख्या मानते हैं। ईरान में शरिया आधारित कसास (जैसे को तैसा) और इस्लामी दंड कानून लागू हैं, लेकिन इसमें एक आधुनिक क़ानूनी प्रक्रिया यानी अदालतें, वकील और अपील का अधिकार शामिल है। जबकि अ़फगानिस्तान में तालिबान की न्याय प्रणाली पूरी तरह अनौपचारिक और क़बीलाई है, जहाँ कोड़े मारना, पत्थरों से मारना, और सार्वजनिक रूप से फांसी देना आम है। अ़फगानिस्तान में महिलाओं को क़ानूनी सुरक्षा या निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार न के बराबर है। अ़फगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों की शिक्षा को अपराध बना दिया गया है। परन्तु आज ईरान ने जिस तरह अमेरिका जैसी महाशक्ति का म़ुकाबला किया है उसमें ईरान की महिलाओं का भी पुरुषों से कम योगदान नहीं है। ऐसे में शरिया की वास्तविक और समयानुसार व्याख्या होना बहुत ज़रूरी है। अ़फग़ानिस्तान जैसी कटरपंथी रूढ़िवादी व क़बीलाई संस्कृति को थोपना कम से कम शरिया क़ानून तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)