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स्क्रीन की दुनिया में सिमटता बचपन

प्रकाशित: 01-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
डिजिटल क्रांति ने मनुष्य के जीवन को जितनी तेजी से बदला है, उतनी तेजी से शायद ही किसी दूसरी तकनीक ने बदला हो। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज सूचना, शिक्षा और संवाद के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। दुनिया की उंगलियों पर ज्ञान उपलब्ध है। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक असहज प्रश्न भी खड़ा हो रहा है कि जिस तकनीक को दुनिया तक पहुंचाने में तकनीकी कंपनियां सबसे आगे हैं, उन्हीं कंपनियों के कुछ शीर्ष अधिकारी अपने बच्चों को उससे दूर क्यों रख रहे हैं?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीक के इन शिल्पकारों को डिजिटल प्लेटफॉर्म की चमक के साथ साथ बचपन पर पड़ने वाला प्रभाव भी मालूम है।
माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने अपने बच्चों को 14 वर्ष की उम्र तक मोबाइल फोन नहीं दिया। गूगल के प्रमुख सुंदर पिचाई ने बताया था कि उनका 11 वर्षीय बेटा फोन का इस्तेमाल नहीं करता था। स्नैप के प्रमुख इवान स्पीगल ने छोटे बच्चे के लिए स्क्रीन टाइम शून्य रखने और बड़े बच्चों को फोन न देने की बात कही। एप्पल के प्रमुख टिम कुक ने भी बच्चों को सोशल साइट्स से दूर रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने बच्चों के बाहर खेलने को महत्व देने की बात कही है। ओपन एआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन भी अपने बच्चों के एआई इस्तेमाल को सीमित रखते हैं। इन व्यक्तिगत फैसलों को वैज्ञानिक प्रमाण या पालन-पोषण का सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता। लेकिन इन लोगों की सावधानी यह सोचने के लिए अवश्य विवश करती है कि क्या हम अपने बच्चों को डिजिटल दुनिया इतनी आसानी से सौंप रहे हैं, जितनी आसानी से उसके निर्माता स्वयं अपने बच्चों को नहीं सौंपना चाहते?
यहां सोशल मीडिया को पूरी तरह खलनायक बना देना भी उचित नहीं होगा। इंटरनेट ने ज्ञान के द्वार खोले हैं। विद्यार्थी विज्ञान, भाषा, इतिहास, संगीत और कला की सामग्री तक पहुंच सकते हैं। वे नए कौशल सीख सकते हैं, अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर सकते हैं और दुनिया भर के लोगों से संवाद कर सकते हैं। समस्या तकनीक में नहीं, उसके अनियंत्रित इस्तेमाल में है।
बच्चों और किशोरों के मामले में यह समस्या अधिक गंभीर हो जाती है। इस उम्र में आत्मनियंत्रण, व्यक्तित्व और सामाजिक समझ अभी विकसित हो रहे होते हैं। दूसरी ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता का ध्यान अधिक से अधिक समय तक बनाए रखने के लिए लगातार नई सामग्री, नोटिफिकेशन, सुझाव और अंतहीन स्क्रॉलिंग उपलब्ध कराते हैं। बच्चे के लिए इससे बाहर निकलना आसान नहीं होता।
मोबाइल की शुरुआत अक्सर आवश्यकता से होती है और धीरे-धीरे वह सुविधा, मनोरंजन तथा आदत में बदल जाता है। पढ़ाई के लिए फोन हाथ में आया, फिर कुछ मिनट वीडियो, गेम या सोशल मीडिया के लिए निकल गए। यही कुछ मिनट कब घंटों में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। इसका सबसे पहला असर अक्सर नींद पर दिखाई देता है। रात में मोबाइल देखने से सोने का समय आगे खिसकता है और नींद कम होती है। पर्याप्त नींद न मिलने का प्रभाव अगले दिन की एकाग्रता, स्मरण, सीखने की क्षमता और मनोदशा पर पड़ सकता है। यानी रात का डिजिटल मनोरंजन अगले दिन की पढ़ाई और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
सोशल मीडिया बच्चों के सामने लोकप्रियता का एक नया पैमाना भी रखता है कि उन्हें कितने लाइक्स, कितने व्यूज मिले और उनके कितने फॉलोअर्स हैं। किशोरावस्था में बच्चा पहले ही अपने रूप और व्यक्तित्व को लेकर संवेदनशील होता है। जब आत्मसम्मान दूसरों की डिजिटल प्रतिािढया से जुड़ने लगे तो उसका आत्मविश्वास अस्थिर हो सकता है।
सबसे बड़ी भूल तब होती है जब बच्चा अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना दूसरों की डिजिटल जिंदगी से करने लगता है। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन वास्तविक जीवन का पूरा चित्र नहीं होता। वहां लोग अपने जीवन के चुने हुए और आकर्षक क्षण दिखाते हैं। बच्चा इस अंतर को समझे बिना दूसरों की चमक को अपनी कमी समझ सकता है। इससे असंतोष, हीनभावना और मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
साइबर बुलिंग इस समस्या को और गंभीर बनाती है। विद्यालय में होने वाला उपहास स्कूल की सीमा तक रह सकता है, लेकिन सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणी, फर्जी अकाउंट, निजी तस्वीरों का प्रसार या किसी वीडियो को वायरल कर देना बच्चे का पीछा घर तक कर सकता है। दुर्भाग्य यह है कि कई बच्चे ऐसी घटनाओं को माता-पिता से भी छिपाते हैं। उन्हें डर रहता है कि शिकायत करने पर मोबाइल ही छीन लिया जाएगा।
इसलिए माता-पिता का पहला हथियार प्रतिबंध नहीं, विश्वास होना चाहिए। बच्चे को यह भरोसा मिले कि डिजिटल दुनिया में कोई समस्या आने पर वह बिना भय के परिवार को बताए। गलती पर डांटने से अधिक जरूरी है बच्चे को यह समझाना कि समस्या छिपाने से बढ़ती है, बताने से उसका समाधान संभव है।
भारत में डिजिटल निर्भरता का प्रश्न और जटिल है। कोरोना महामारी ने शिक्षा को अचानक मोबाइल और इंटरनेट पर निर्भर कर दिया। महामारी समाप्त होने के बाद भी इसका प्रभाव बना रहा। आज अनेक विद्यालयों में गृहकार्य, नोट्स, पीडीएफ, वीडियो, परियोजनाओं के निर्देश और सूचनाएं मोबाइल के माध्यम से भेजी जाती हैं। यहां अभिभावक दुविधा में हैं। वे चाहते हैं कि बच्चा मोबाइल से दूर रहे, लेकिन पढ़ाई का काम उसी पर आता है। जिस उपकरण पर गृहकार्य मिलता है, उसी पर गेम, वीडियो और सोशल मीडिया भी मौजूद हैं। छोटे बच्चे के लिए पढ़ाई और मनोरंजन के बीच सीमा बनाए रखना स्वाभाविक रूप से कठिन है।
इसलिए बच्चों की डिजिटल आदतों के लिए केवल माता-पिता को दोष देना उचित नहीं होगा। शिक्षा व्यवस्था को भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के प्रत्येक कार्य को स्मार्टफोन पर निर्भर करने की आवश्यकता पर विद्यालयों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। हर सूचना डिजिटल माध्यम से देना आधुनिकता नहीं है। पुस्तक, कागज, कक्षा और शिक्षक के प्रत्यक्ष संवाद का अपना महत्व है। डिजिटल शिक्षा उपयोगी है, लेकिन शिक्षा को डिजिटल बना देना और बचपन को डिजिटल बना देना दो अलग बातें हैं। विद्यालयों को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें तकनीक आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल हो, लेकिन सुविधा के नाम पर उसकी अनिवार्यता न बने। खासकर छोटे बच्चों के लिए निजी स्मार्टफोन को शैक्षणिक आवश्यकता बना देना कहीं से भी उचित नहीं है।
तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी प्लेटफॉर्म की पूरी व्यवस्था उपयोगकर्ता का ध्यान अधिक देर तक बांधे रखने पर आधारित है तो बच्चों के मामले में अतिरिक्त सावधानी आवश्यक है। सरकार को बाल-सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, आयु-उपयुक्त सामग्री और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही के लिए प्रभावी नियम बनाने होंगे। कंपनियों को भी बच्चों की कमजोरियों को व्यावसायिक लाभ का साधन बनाने से बचना होगा। लेकिन इसका समाधान बच्चों को तकनीक से पूरी तरह काट देना भी नहीं है। डिजिटल दुनिया से परिचित होना आज की आवश्यकता है। बच्चों को तकनीक का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना सिखाना होगा ताकि उन्हें समझ आए कि उन्हें क्या देखना है, क्या साझा करना है, किससे संवाद करना सुरक्षित है और किसी भी असुविधाजनक स्थिति में किससे सहायता लेनी है।
घर में भी कुछ सामान्य अनुशासन जरूरी हैं। सोने के समय मोबाइल बच्चे के कमरे में न हो। भोजन के समय फोन अलग रखा जाए। पढ़ाई और मनोरंजन का समय अलग हो। छोटे बच्चों को बिना आवश्यकता व्यक्तिगत स्मार्टफोन न दिया जाए। और सबसे महत्वपूर्ण है कि माता-पिता स्वयं अपने व्यवहार से उदाहरण प्रस्तुत करें। जो अभिभावक स्वयं हर समय मोबाइल में डूबे हों, वे बच्चों से डिजिटल संयम की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? बचपन केवल स्क्रीन पर सिमटकर विकसित नहीं होता। खेल का मैदान, किताब, प्रकृति, मित्रों से आमने-सामने संवाद, परिवार की बातचीत, कला, संगीत और कल्पना - ये सभी बच्चे के व्यक्तित्व की आधारशिला हैं। यदि मोबाइल इन अनुभवों का स्थान लेने लगे तो प्रश्न तकनीक का नहीं, हमारी प्राथमिकताओं का है।
तकनीकी जगत के दिग्गजों की सावधानी को अंधानुकरण की तरह नहीं, चेतावनी के संकेत की तरह देखना चाहिए। वे तकनीक के लाभ जानते हैं, लेकिन उसके व्यावसायिक ढांचे और मनोवैज्ञानिक प्रभावों से भी परिचित हैं। उनके फैसले हमें कम से कम इतना सोचने के लिए जरूर प्रेरित करते हैं कि बच्चों को डिजिटल सुविधा देने और डिजिटल निर्भरता पैदा करने के बीच एक महीन लेकिन निर्णायक अंतर है।
अंतत प्रश्न यह नहीं है कि हमारा बच्चा कितना डिजिटल है। असली प्रश्न यह है कि बच्चा डिजिटल दुनिया का उपयोग कर रहा है या डिजिटल दुनिया उसके समय, ध्यान और बचपन का उपयोग कर रही है? बच्चे को डिजिटल दुनिया से परिचित कराना आधुनिकता है लेकिन उसे उस दुनिया का आदी बना देना आधुनिकता नहीं, हमारी विफलता है। हमें ऐसी शिक्षा और ऐसी पारिवारिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें तकनीक बच्चे की सहायक बने, उसकी स्वामिनी नहीं। मोबाइल उसके हाथ में हो, लेकिन उसका बचपन मोबाइल के हाथ में न चला जाए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)