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मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा

प्रकाशित: 01-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के दौरान न्यूयॉर्क में दिया गया यह संदेश भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श के लिहाज से सामान्य बयान नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने वहां भारत की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक पहचान की चर्चा करते हुए हिंदू-मुस्लिम संबंधों, सहअस्तित्व और संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका यह कहना कि भारत में यदि कोई यह सोचता है कि मुस्लिम नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू भी नहीं है, भारतीय समाज की विविधता को स्वीकार करने वाले विचार के रूप में सामने आया है। उनके संबोधन में एकता, मानवता और सभी समुदायों के सम्मान का संदेश प्रमुख रहा। भारत सदियों से अनेक धर्मों, भाषाओं, जातियों, परंपराओं और संस्कृतियों का देश रहा है। आज पूरी दुनिया में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर तनाव बढ़ रहा है। समाचार सामग्री में भी इस बात पर जोर है कि धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर दुनिया में तनाव बढ़ रहा है और दूसरे को नकारने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।
भारतीय राजनीति में इस बयान की असली परीक्षा अमेरिका के मंच पर नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक जीवन में होगी।
सवाल यह है कि क्या यही संदेश गांव, कस्बे, विश्वविद्यालय, मंदिर, मस्जिद, बाजार और राजनीतिक मंचों तक भी उसी मजबूती के साथ पहुंचेगा? यदि हिंदू और मुस्लिम को एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करना चाहिए, तो यह सिद्धांत केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिए गए भाषण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे जमीन पर सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाना होगा। इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। भागवत का अमेरिका जाना और वहां भारतीय मूल के लोगों तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच भारत की सामाजिक अवधारणा को प्रस्तुत करना इस बात का संकेत है कि संघ अब अपने विचारों को वैश्विक मंच पर भी अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर रहा है। अमेरिका में प्रवासी भारतीयों को लेकर भी उन्होंने महत्वपूर्ण संदेश दिया।
न्यूयॉर्क की राजनीति ने इस यात्रा को और दिलचस्प बना दिया। समाचार में उल्लेख है कि कार्पाम को लेकर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के विरोध का संदर्भ भी सामने आया।
लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या संगठन के विचारों से असहमति होना असामान्य बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि असहमति हिंसा या नफरत में न बदले। किसी विचार का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन व्यक्ति अथवा समुदाय के अस्तित्व को नकारना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।