गौतम बुद्ध के उपदेश और आज की दुनिया में उनकी प्रासंगिकता
प्रकाशित: 01-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बुद्ध परूणिमा केवल एक धरमिक पर्व नहीं, बल्कि शांति, करुणा, अहिसा और मानवता का संदेश देने वाला पावन दिन है। यह हमें गौतम बुद्ध के जीवन से प्रेरणा लेकर संयम, सत्य, सद्भाव और विश्व शांति के मार्ग पर चलने की सीख देता है। आज के तनावपूर्ण वैश्विक समय में यह पर्व मानवता को एकता, प्रेम और सह- अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है।
हर वर्ष वैशाख मास की परूणिमा तिथि पर बुद्ध परूणिमा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के नौवें अवतार महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। इस वर्ष बुद्ध परूणिमा 1 मईं 2026, शुावार को मनाईं जाएगी।
ज्योतिषाचार्यो के अनुसार इस वर्ष परूणिमा तिथि 30 अप्रैल की रात 09 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर 1 मईं 2026 की रात 10 बजकर 52 मिनट तक प्रभावी रहेगी। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 1 मईं को मनाया जाएगा। यह दिन भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधि) और महापरिनिर्वाणतीनों की स्मृति को सर्मपित है। इस अवसर पर देश-विदेश में श्रद्धालु ध्यान, प्रार्थना, दान और अहिसा के संदेश का पालन करते हैं।
विशेषकर बोधगया, सारनाथ और वुशीनगर जैसे पवित्र स्थलों पर बड़े आयोजन होते हैं। बुद्ध परूणिमा का पर्व हमें करुणा, शांति और मध्यम मार्ग के सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा देता है, जिससे मानव जीवन में नैतिकता और सद्भाव का विकास होता है। पाठकों को बताता चलूं कि वैशाख परूणिमा को ‘बुद्ध परूणिमा’, ‘पीपल परूणिमा’
और ‘बुद्ध जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है। ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि यह दिन भगवान विष्णु को भी सर्मपित माना जाता है, क्योंकि पुराणों के अनुसार महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। स्कन्द पुराण में वैशाख मास को समस्त मासों में श्रेष्ठ बताया गया है, इसलिए यह मास विष्णु भगवान को अत्यंत प्रिय है। इस दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा की जाती है। पा पुराण और मत्स्य पुराण में वैशाख मास में स्नान और दान को श्रेष्ठ बताया गया है-’वैशाखे मासि स्नानं च, दानं च विशेषत:।’ इस मास में पवित्र तीर्थो पर स्नान, दान-पुण्य और व्रत से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
शास्त्रों के अनुसार वैशाख शुक्ल त्रयोदशी से लेकर परूणिमा तक की तिथियों को ‘पुष्करणी तिथियाँ’ कहा जाता है। मान्यता है कि एकादशी को अमृत प्रकट हुआ, द्वादशी को भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की, त्रयोदशी को देवताओं ने अमृत का पान किया, चतुर्दशी को दैत्यों का संहार हुआ और परूणिमा को देवताओं को उनका राज्य पुन: प्राप्त हुआ।इस दिन यमराज (धर्मराज) की वृपा प्राप्त करने के लिए व्रत रखने और दान करने का विशेष विधान है।
शक्कर, तिल, पंखे, जूते-चप्पल, घड़ा, दूध-खीर, अन्न-वस्त्र आदि का दान अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। परूणिमा के दिन चंद्रदेव को अघ्र्यं देना शुभ फलदायी होता है। साथ ही मां लक्ष्मी की पूजा से घर में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। उन्हें बताशा, खीर, मिठाईं, नारियल और कमल का पूल र्अपित किया जाता है। इस दिन भगवान राम और हनुमान जी की पूजा भी की जाती है तथा हनुमान जी को सिदूर चढ़ाया जाता है। पितरों के निमित्त पिडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार में शांति एवं समृद्धि आती है। हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि भगवान गौतम बुद्ध को ‘एशिया का प्रकाश’ कहा जाता है। उनका जन्म 563 ईंसा पूर्व नेपाल के कपिलवस्तु स्थित लुम्बिनी वन में वैशाख परूणिमा के दिन हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्यवंश के राजा थे और माता महामाया थीं। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था और उनका पालन-पोषण राजवुमार के रूप में हुआ। बाद में उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागकर सत्य की खोज की। आज के संदर्भ में देखा जाए तो उनका जन्म नेपाल में हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि भारत रही। यहीं उन्हें बोधि प्राप्त हुईं और यहीं से उन्होंने संपूर्ण विश्व को ज्ञान का संदेश दिया। आज जापान, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, तिब्बत, भूटान, वंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, थाईंलैंड, मकाऊ, म्यांमार, श्रीलंका जैसे अनेक देश बौद्ध संस्वृति से प्रभावित हैं।पाठक जानते हैं कि महात्मा बुद्ध ने जीवन में अहिसा, करुणा, शांति, मैत्री और बंधुत्व का संदेश दिया। उनके अनुसार मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। शुद्ध विचारों से किया गया कर्म सुख देता है और अशुद्ध विचार दुख का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि तीन चीजें कभी छुपाईं नहीं जा सकतीं-सूर्यं, चंद्रमा और सत्य। उनका यह भी संदेश था कि एक दीपक हजारों दीपक जला सकता है, फिर भी उसकी रोशनी कम नहीं होती, इसी प्रकार सद्गुण बांटने से कम नहीं होते।बुद्ध के अनुसार व्यत्ति को वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि भूतकाल और भविष्य में खोकर दुख ही मिलता है। उन्होंने कहा कि बुराईं से बुराईं को नहीं जीता जा सकता, प्रेम से ही संसार जीता जा सकता है। जो व्यत्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक विजेता है। व्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और व्रोध से स्वयं को ही नुकसान होता है।
उनका यह भी कहना था कि केवल ज्ञान पढ़ना या सुनना पर्यांप्त नहीं है, जब तक उसे जीवन में न अपनाया जाए उसका कोईं लाभ नहीं। बुद्ध ने यह स्पष्ट किया कि उनके उपदेशों को बिना जांचे स्वीकार न किया जाए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपनी बुद्धि और अनुभव से सत्य को परखे। उनका धर्म तर्वसंगत, वैज्ञानिक सोच पर आधारित और अंधविश्वास विरोधी था। वे मानते थे कि संसार में अंतिम और अपरिवर्तनीय वुछ भी नहीं है, केवल परिवर्तन ही सत्य है।
बहरहाल, आज विश्व में कईं क्षेत्रों में युद्ध और तनाव की स्थिति बनी हुईं है। रूस-यूोन युद्ध, इ़जराइल-हमास संघर्ष, चीनताइवान तनाव, भारत-चीन सीमा विवाद, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया तनाव और ईंरान-इ़जराइल तनाव वैश्विक शांति के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में बुद्ध के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं, क्योंकि उन्होंने युद्ध का पूर्ण विरोध किया और कहा कि हर युद्ध में केवल विनाश और पीड़ा होती है। उन्होंने ‘आष्टांगिक मार्ग’
बताया-’सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाव्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।’ यही मार्ग मनुष्य को राग, द्वेष, मोह, लोभ, घृणा और भय से मुत्त करता है। इन्हीं विकारों से हिसा, शोषण, अन्याय, आतंकवाद और युद्ध उत्पन्न होते हैं। आज की दुनिया में तनाव, अवसाद, आर्थिक असमानता और नैतिक गिरावट बढ़ रही है, ऐसे में बुद्ध का मार्ग समाधान प्रस्तुत करता है। इतना ही नहीं, उन्होंने पंचशील सिद्धांत भी दिए। मसलन -चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना, नशा न करना आदि। साथ ही उन्होंने सामाजिक समानता, महिला सशत्तिकरण और नैतिक जीवन पर बल दिया। बुद्ध ने यह भी कहा कि घृणा को घृणा से नहीं जीता जा सकता, उसे केवल प्रेम से जीता जा सकता है। वास्तव में, ’ाोध में हजारों शब्दों को गलत बोलने से अच्छा मौन वह एक शब्द है जो शांति लाता है।’ उनका यह संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था।
अंतत: बुद्ध परूणिमा केवल एक धरमिक पर्व नहीं, बल्कि शांति, करुणा, अहिसा और मानवता का संदेश देने वाला पावन दिन है। यह हमें गौतम बुद्ध के जीवन से प्रेरणा लेकर संयम, सत्य, सद्भाव और विश्व शांति के मार्ग पर चलने की सीख देता है। आज के तनावपूर्ण वैश्विक समय में यह पर्व मानवता को एकता, प्रेम और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है।
(लेखक , प्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार हैं।)
हर वर्ष वैशाख मास की परूणिमा तिथि पर बुद्ध परूणिमा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के नौवें अवतार महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। इस वर्ष बुद्ध परूणिमा 1 मईं 2026, शुावार को मनाईं जाएगी।
ज्योतिषाचार्यो के अनुसार इस वर्ष परूणिमा तिथि 30 अप्रैल की रात 09 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर 1 मईं 2026 की रात 10 बजकर 52 मिनट तक प्रभावी रहेगी। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 1 मईं को मनाया जाएगा। यह दिन भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधि) और महापरिनिर्वाणतीनों की स्मृति को सर्मपित है। इस अवसर पर देश-विदेश में श्रद्धालु ध्यान, प्रार्थना, दान और अहिसा के संदेश का पालन करते हैं।
विशेषकर बोधगया, सारनाथ और वुशीनगर जैसे पवित्र स्थलों पर बड़े आयोजन होते हैं। बुद्ध परूणिमा का पर्व हमें करुणा, शांति और मध्यम मार्ग के सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा देता है, जिससे मानव जीवन में नैतिकता और सद्भाव का विकास होता है। पाठकों को बताता चलूं कि वैशाख परूणिमा को ‘बुद्ध परूणिमा’, ‘पीपल परूणिमा’
और ‘बुद्ध जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है। ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि यह दिन भगवान विष्णु को भी सर्मपित माना जाता है, क्योंकि पुराणों के अनुसार महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। स्कन्द पुराण में वैशाख मास को समस्त मासों में श्रेष्ठ बताया गया है, इसलिए यह मास विष्णु भगवान को अत्यंत प्रिय है। इस दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा की जाती है। पा पुराण और मत्स्य पुराण में वैशाख मास में स्नान और दान को श्रेष्ठ बताया गया है-’वैशाखे मासि स्नानं च, दानं च विशेषत:।’ इस मास में पवित्र तीर्थो पर स्नान, दान-पुण्य और व्रत से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
शास्त्रों के अनुसार वैशाख शुक्ल त्रयोदशी से लेकर परूणिमा तक की तिथियों को ‘पुष्करणी तिथियाँ’ कहा जाता है। मान्यता है कि एकादशी को अमृत प्रकट हुआ, द्वादशी को भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की, त्रयोदशी को देवताओं ने अमृत का पान किया, चतुर्दशी को दैत्यों का संहार हुआ और परूणिमा को देवताओं को उनका राज्य पुन: प्राप्त हुआ।इस दिन यमराज (धर्मराज) की वृपा प्राप्त करने के लिए व्रत रखने और दान करने का विशेष विधान है।
शक्कर, तिल, पंखे, जूते-चप्पल, घड़ा, दूध-खीर, अन्न-वस्त्र आदि का दान अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। परूणिमा के दिन चंद्रदेव को अघ्र्यं देना शुभ फलदायी होता है। साथ ही मां लक्ष्मी की पूजा से घर में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। उन्हें बताशा, खीर, मिठाईं, नारियल और कमल का पूल र्अपित किया जाता है। इस दिन भगवान राम और हनुमान जी की पूजा भी की जाती है तथा हनुमान जी को सिदूर चढ़ाया जाता है। पितरों के निमित्त पिडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार में शांति एवं समृद्धि आती है। हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि भगवान गौतम बुद्ध को ‘एशिया का प्रकाश’ कहा जाता है। उनका जन्म 563 ईंसा पूर्व नेपाल के कपिलवस्तु स्थित लुम्बिनी वन में वैशाख परूणिमा के दिन हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्यवंश के राजा थे और माता महामाया थीं। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था और उनका पालन-पोषण राजवुमार के रूप में हुआ। बाद में उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागकर सत्य की खोज की। आज के संदर्भ में देखा जाए तो उनका जन्म नेपाल में हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि भारत रही। यहीं उन्हें बोधि प्राप्त हुईं और यहीं से उन्होंने संपूर्ण विश्व को ज्ञान का संदेश दिया। आज जापान, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, तिब्बत, भूटान, वंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, थाईंलैंड, मकाऊ, म्यांमार, श्रीलंका जैसे अनेक देश बौद्ध संस्वृति से प्रभावित हैं।पाठक जानते हैं कि महात्मा बुद्ध ने जीवन में अहिसा, करुणा, शांति, मैत्री और बंधुत्व का संदेश दिया। उनके अनुसार मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। शुद्ध विचारों से किया गया कर्म सुख देता है और अशुद्ध विचार दुख का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि तीन चीजें कभी छुपाईं नहीं जा सकतीं-सूर्यं, चंद्रमा और सत्य। उनका यह भी संदेश था कि एक दीपक हजारों दीपक जला सकता है, फिर भी उसकी रोशनी कम नहीं होती, इसी प्रकार सद्गुण बांटने से कम नहीं होते।बुद्ध के अनुसार व्यत्ति को वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि भूतकाल और भविष्य में खोकर दुख ही मिलता है। उन्होंने कहा कि बुराईं से बुराईं को नहीं जीता जा सकता, प्रेम से ही संसार जीता जा सकता है। जो व्यत्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक विजेता है। व्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और व्रोध से स्वयं को ही नुकसान होता है।
उनका यह भी कहना था कि केवल ज्ञान पढ़ना या सुनना पर्यांप्त नहीं है, जब तक उसे जीवन में न अपनाया जाए उसका कोईं लाभ नहीं। बुद्ध ने यह स्पष्ट किया कि उनके उपदेशों को बिना जांचे स्वीकार न किया जाए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपनी बुद्धि और अनुभव से सत्य को परखे। उनका धर्म तर्वसंगत, वैज्ञानिक सोच पर आधारित और अंधविश्वास विरोधी था। वे मानते थे कि संसार में अंतिम और अपरिवर्तनीय वुछ भी नहीं है, केवल परिवर्तन ही सत्य है।
बहरहाल, आज विश्व में कईं क्षेत्रों में युद्ध और तनाव की स्थिति बनी हुईं है। रूस-यूोन युद्ध, इ़जराइल-हमास संघर्ष, चीनताइवान तनाव, भारत-चीन सीमा विवाद, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया तनाव और ईंरान-इ़जराइल तनाव वैश्विक शांति के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में बुद्ध के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं, क्योंकि उन्होंने युद्ध का पूर्ण विरोध किया और कहा कि हर युद्ध में केवल विनाश और पीड़ा होती है। उन्होंने ‘आष्टांगिक मार्ग’
बताया-’सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाव्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।’ यही मार्ग मनुष्य को राग, द्वेष, मोह, लोभ, घृणा और भय से मुत्त करता है। इन्हीं विकारों से हिसा, शोषण, अन्याय, आतंकवाद और युद्ध उत्पन्न होते हैं। आज की दुनिया में तनाव, अवसाद, आर्थिक असमानता और नैतिक गिरावट बढ़ रही है, ऐसे में बुद्ध का मार्ग समाधान प्रस्तुत करता है। इतना ही नहीं, उन्होंने पंचशील सिद्धांत भी दिए। मसलन -चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना, नशा न करना आदि। साथ ही उन्होंने सामाजिक समानता, महिला सशत्तिकरण और नैतिक जीवन पर बल दिया। बुद्ध ने यह भी कहा कि घृणा को घृणा से नहीं जीता जा सकता, उसे केवल प्रेम से जीता जा सकता है। वास्तव में, ’ाोध में हजारों शब्दों को गलत बोलने से अच्छा मौन वह एक शब्द है जो शांति लाता है।’ उनका यह संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था।
अंतत: बुद्ध परूणिमा केवल एक धरमिक पर्व नहीं, बल्कि शांति, करुणा, अहिसा और मानवता का संदेश देने वाला पावन दिन है। यह हमें गौतम बुद्ध के जीवन से प्रेरणा लेकर संयम, सत्य, सद्भाव और विश्व शांति के मार्ग पर चलने की सीख देता है। आज के तनावपूर्ण वैश्विक समय में यह पर्व मानवता को एकता, प्रेम और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है।
(लेखक , प्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार हैं।)