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चुनावी शतरंज पर असंवैधानिक चालों का बढ़ता तिलिस्म

प्रकाशित: 20-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
चुनावी शतरंज पर असंवैधानिक चालों का बढ़ता तिलिस्म
रविन्द्र अरजरिया
सत्ता की जंग में तलवारें भांजने वाले लोग निहित स्वार्थों की वेदी पर देश के विकास को बलि के रूप में अर्पित करने पर तुले हैं। कोई घुसपैठियों की दम पर आतंक का राज्य कायम करने में लगा है तो कोई टुकड़े-टुकड़े गैंग को खुला संरक्षण दे रहा है। कोई सम्प्रदाय विशेष को लुभाने में जुटा है तो कोई जाति विशेष का संरक्षक होने का दावा कर रहा है। कहीं भाषा की दुहाई पर मनमानियां हो रहीं हैं तो कहीं मान्यताओं के अपमान पर आाढाsश व्यक्त हो रहा है। कोई अयोग्यों को व्यवस्था में भागीदार बनाने पर तुला है तो कोई जन्म के आधार पर शोषण की कहानियां सुना रहा है।
कहीं लिंग के आधार पर बटवारे को रेखांकित किया जा रहा है तो कहीं अतीत की षड्यंत्रकारी व्याख्यायें हो रहीं हैं। छद्म भेष में छुपे राष्ट्रीय शत्रु आज हर गली, हर गांव और हर वर्ग में मीरजाफर की तरह निरंतर सक्रिय हैं। कहीं स्वयं को बुद्धिजीवी बता कर अपने सहयोगियों के माध्यम से प्रायोजित पुरस्कार पाने वाले विष वमन कर रहे हैं तो कहीं संविधान की आड़ में निजिता पर प्रहार हो रहे हैं।
सरकारी सम्पत्ति हड़पने की तो होड़ सी लगी है। अतिक्रमण, नाजायज कब्जे और गैरकानूनी अधिकार जैसी स्थितियां तो समूचे देश में बनी हुई हैं। ऐसे में सत्ता सुख की कामना करने वाले साम, दाम, दण्ड, भेद के चारों हथियार एक साथ उपयोग में ला रहे हैं। महिलाओं को कहीं चांदी के सिक्कों का लालच दिया जाता है तो कहीं सशक्तिकरण के नाम पर सुविधायें। वर्ग विशेष को चिकित्सा से लेकर शिक्षा तक, नौकरियों से लेकर निकायों तक और धन से लेकर घर तक की मृगमारीचिका के पीछे दौड़ाने वाले अब जीवन का खतरा, वर्ग संघर्ष, जातिगत द्वेष, असुरक्षा का भय, परिवार की चिन्ता, लाल-हरे का भेद और कट्टरता का आगाज बताकर निदान हेतु स्वयं को एक मात्र विकल्प के रूप में स्थापित करने में लगे हैं।
जनआन्दोलन के नाम पर असामाजिक तत्वों का खुलकर सहयोग लिया जा रहा है। आक्रोश की चिंगारी लगाकर उसे हवा देने के लिए सोशल मीडिया के अनेक प्लेटफार्म का खुलकर उपयोग हो रहा है। तर्कों की कसौटी पर मनगढ़न्त प्रमाण रखे जा रहे हैं। कोई स्वाधीनता के बाद से लम्बे समय तक के कार्यकाल को काला अध्याय बता रहा है तो कोई अपनी पीठ स्वयं ही ठोककर विजेता बन रहा है। अनेक जन्मजात नेताओं और उनके चाटुकारों ने तो सदन की गरिमा को किस्तों में कत्ल करने की सुपाड़ी तक ले रखी है जिसके क्रियान्वय में हाथपाई, मारपीट और छीनाछपटी जैसी स्थितियां आये दिन देखने को मिल रहीं हैं। शब्दों ने मर्यादा का परिधान तो कब का उतार फैंका है। नग्न नृत्य की तैयारियां भी पूरी हो चुकीं हैं जिसका छोटा-बड़ा रिहर्सल प्रत्येक सत्र में देखने को मिल ही जाता है। संसद से लेकर सड़क तक कूटनीतिक चालें चलीं जा रहीं हैं।
राष्ट्र के लिए दूरगामी खतरे उत्पन्न करने वाली स्थितियां निर्मित की जा रहीं हैं। पांच राज्यों के चुनावों और उसके बाद की निर्वाचन श्रंखला के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति चल रही है। दिल्ली दरबार से लेकर कोलकता तक में वातावरणीय तापमान से कहीं ज्यादा वोट हड़पने की गर्मी है। संवैधानिक व्यवस्थाओं ने अपने सिद्धान्तों से हटकर धरातल पर मनमाना आकार लेना शुरू कर दिया है।
दलगत राजनीति से जुड़े लोगों के पास कानून तोड़ने का अधिकार सुरक्षित होता जा रहा है। कार्यपालिका के कर्तव्यों की शतप्रतिशत परिणति केवल लिखित दायित्वों तक सीमित होकर दस्तावेजी प्रमाणों में सिमट कर रह गई है। राजतंत्र का दबाव, भीड़तंत्र का दबाव, वरिष्टतंत्र का दबाव, निजतंत्र का दबाव, परिवारतंत्र का दबाव, स्वार्थतंत्र का दबाव जैसे अनगिनत दबावों के मध्य अपनी भावी पीढ़ियों को आर्थिक प्रचुरता का भण्डार भेंट करने की लालसा से लालायित अधिकांश कार्यालय आज राष्ट्रीय संकल्पों को दरकिनार करने में लगे हैं। आधुनिक से अतिआधुनिक बनने की होड़ में नित नये उपकरण, तकनीक और व्यवस्था थोपने का क्रम निरंतर तीव्रगामी हो रहा है जिससे शासकीय औपचारिकतायें कठिन पहेली बन गईं हैं।
प्रत्येक पंचवर्षीय कार्यकाल में अनेक बार व्यवस्था का तकनीकी स्वरूप बदला जाता हैं, कार्य पद्धतियों में परिवर्तन होता हैं और नियुक्त होते हैं स्थाई सेवादारों की सेवा के लिए अनुबंधित सेवाकर्मीं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाहों तक की वेतन वृद्धि आसमान छूने की हर बार कोशिश करती है। तुष्टीकरण की नीति पर चलने वाले लोगों की सत्ता लोलुपता ने परिश्रमी नागरिकों को मेहनत से पलायन कराके आराम तलबी के शौक में झौंक दिया है। हरामखोरी की योजनाओं को सुविधाओं की सौगात बताकर लाइलाज बीमारी का वायरस छोड़ा जा रहा है। मुफ्तखोरी को अधिकार के रूप में मान्यता मिलती जा रही है। सरकारों के उल्लेखनीय कृत्यों के रूप में मंचों की शोभा बनने वाली फेरिस्त में हरामखोरी को बढ़ावा देने वाले आंकड़ों का बाहुल्य होता है। योजनाओं को सरकार की सकारात्मक सोच के साथ जोड़कर परोसा जाता है। पांच साल के अस्थाई सत्ताधारी अपने कार्यकाल को बढ़ाने और विपक्षीजन सत्ता सुख भोगने के लिए कुछ भी करने को तैयार नजर आते हैं। मौका मिलते ही वे देश के अन्दर और बाहर स्वयं की उपलब्धियों का ढिढोरा पीटने लगते हैं, विपक्ष का नकारात्मक रूप प्रस्तुत करने लगते हैं और बन जाते हैं समूचे नागरिकों के एकमात्र ठेकेदार। संस्कारों को तिलांजलि देने वाले दलों की सिद्धान्तविहीनता, आदर्शहीनता और स्वार्थपरिता अब पूरी तरह से सामने आ चुकी है जिसके आधार पर आम आवाम अपने विवेक की तराजू पर निजी लाभ हेतु मोलभाव करने में जुटा है।
राष्ट्रवादिता का ढिंढोरा पीटने वालों के परिवारजन स्वयं विदेशी मानसिकता में अकण्ठ डूबे दिख रहे हैं। चुनावी शतरंज पर असंवैधानिक चालों का बढ़ता तिलिस्म अब किसी से छुपा नहीं है। दिल्ली के दांवपेंच दिल्लगी बनकर स्थापित होने लगे हैं। राजनीति ने कूटनीति के रास्ते पर चलकर अब षड्यंत्र नीति का पड़ाव भी पार कर लिया है जिसे रोकने के लिए आम नागरिक को राष्ट्र हित का निस्वार्थ संकल्प लेना पड़ेगा तभी स्वार्थ में पूरी तरह डूब चुका मानसिक प्रदूषण दूर हो सकेगा।