जनहित, विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता की दृष्टि से क्या बंगाल में सत्ता परिवर्तन आवश्यक है?
प्रकाशित: 21-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
बंगाल ने भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन में अग्रणी भूमिका निभाई है। जगदीश चन्द्र बोस और प्रफुल्ल चन्द्र राय ने विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साहित्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने नवजागरण को दिशा दी है। स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चन्द्र बोस और खुदीराम बोस का योगदान अविस्मरणीय है। औद्योगिक क्षेत्र में जूट उद्योग और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव से आधुनिक उद्योगों की नींव पड़ी। इसलिए पश्चिम बंगाल की राजनीति आज केवल सत्ता के प्रश्न तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह जनहित, विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता जैसे मूलभूत मानकों की कसौटी पर भी खरा उतरना आवश्यक है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या इन मानकों की पूर्ति के लिए राज्य में सत्ता परिवर्तन आवश्यक है, या वर्तमान व्यवस्था ही इन उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम है? जनहित की दृष्टि से देखें तो किसी भी सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं यथा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करना होता है। बंगाल में अनेक जनकल्याणकारी योजनाएँ संचालित हैं, जिनसे समाज के एक बड़े वर्ग को लाभ भी मिला है। किंतु इसके साथ ही बेरोजगारी, उद्योगों के पलायन और निवेश की कमी जैसे प्रश्न भी लगातार उठते रहे हैं। यदि जनहित के व्यापक और दीर्घकालिक स्वरूप को ध्यान में रखा जाए, तो यह आवश्यक हो जाता है कि शासन केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित न रहे, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और अवसरों के सृजन पर भी ठोस कार्य करे। यदि वर्तमान व्यवस्था इसमें अपेक्षित गति नहीं दे पा रही, तो परिवर्तन की मांग स्वाभाविक रूप से उभरती है। विकास के संदर्भ में बंगाल का अतीत गौरवपूर्ण रहा है, किंतु वर्तमान में वह अपेक्षित औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास की दौड़ में कुछ पीछे दिखाई देता है। बड़े निवेश, रोजगार के अवसर और आधुनिक अवसंरचना किसी भी राज्य को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाते हैं। यह तर्क दिया जाता है कि सत्ता परिवर्तन से नई नीतियाँ और नई सोच सामने आ सकती है, जिससे विकास को गति मिलेगी। वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि विकास एक सतत प्रािढया है, जिसके लिए नीतिगत निरंतरता और स्थिरता भी उतनी ही आवश्यक है। अत यह विचार करना होगा कि क्या वर्तमान सरकार विकास की गति को तेज करने में सक्षम है, या इसके लिए नए नेतृत्व की आवश्यकता है। सुशासन के प्रश्न पर स्थिति और भी संवेदनशील हो जाती है। कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक निष्पक्षता और पारदर्शिता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। बंगाल में समय-समय पर राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के आरोप सामने आते रहे हैं, जो सुशासन की धारणा को चुनौती देते हैं। यदि शासन व्यवस्था निष्पक्ष और उत्तरदायी नहीं दिखती, तो जनता के मन में असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
बंगाल ने भारत के बौद्धिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन में अग्रणी भूमिका निभाई है। जगदीश चन्द्र बोस और प्रफुल्ल चन्द्र राय ने विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साहित्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने नवजागरण को दिशा दी है। स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चन्द्र बोस और खुदीराम बोस का योगदान अविस्मरणीय है। औद्योगिक क्षेत्र में जूट उद्योग और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव से आधुनिक उद्योगों की नींव पड़ी। इसलिए पश्चिम बंगाल की राजनीति आज केवल सत्ता के प्रश्न तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह जनहित, विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता जैसे मूलभूत मानकों की कसौटी पर भी खरा उतरना आवश्यक है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या इन मानकों की पूर्ति के लिए राज्य में सत्ता परिवर्तन आवश्यक है, या वर्तमान व्यवस्था ही इन उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम है? जनहित की दृष्टि से देखें तो किसी भी सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं यथा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करना होता है। बंगाल में अनेक जनकल्याणकारी योजनाएँ संचालित हैं, जिनसे समाज के एक बड़े वर्ग को लाभ भी मिला है। किंतु इसके साथ ही बेरोजगारी, उद्योगों के पलायन और निवेश की कमी जैसे प्रश्न भी लगातार उठते रहे हैं। यदि जनहित के व्यापक और दीर्घकालिक स्वरूप को ध्यान में रखा जाए, तो यह आवश्यक हो जाता है कि शासन केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित न रहे, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और अवसरों के सृजन पर भी ठोस कार्य करे। यदि वर्तमान व्यवस्था इसमें अपेक्षित गति नहीं दे पा रही, तो परिवर्तन की मांग स्वाभाविक रूप से उभरती है। विकास के संदर्भ में बंगाल का अतीत गौरवपूर्ण रहा है, किंतु वर्तमान में वह अपेक्षित औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास की दौड़ में कुछ पीछे दिखाई देता है। बड़े निवेश, रोजगार के अवसर और आधुनिक अवसंरचना किसी भी राज्य को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाते हैं। यह तर्क दिया जाता है कि सत्ता परिवर्तन से नई नीतियाँ और नई सोच सामने आ सकती है, जिससे विकास को गति मिलेगी। वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि विकास एक सतत प्रािढया है, जिसके लिए नीतिगत निरंतरता और स्थिरता भी उतनी ही आवश्यक है। अत यह विचार करना होगा कि क्या वर्तमान सरकार विकास की गति को तेज करने में सक्षम है, या इसके लिए नए नेतृत्व की आवश्यकता है। सुशासन के प्रश्न पर स्थिति और भी संवेदनशील हो जाती है। कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक निष्पक्षता और पारदर्शिता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। बंगाल में समय-समय पर राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के आरोप सामने आते रहे हैं, जो सुशासन की धारणा को चुनौती देते हैं। यदि शासन व्यवस्था निष्पक्ष और उत्तरदायी नहीं दिखती, तो जनता के मन में असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)