दूरदर्शी चालः एक ‘हार’ में छिपी बड़ी जीत की कहानी
प्रकाशित: 21-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
कांतिलाल मांडात्sा
लोकसभा में सीटें बढ़ाने, परिसीमन लागू करने और महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने से जुड़े विधेयकों का गिरना पहली नजर में भले ही नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक झटका दिखाई देता हो, लेकिन भारतीय राजनीति को सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि यह घटनाक्रम दरअसल एक गहरी रणनीति का हिस्सा था, और यही वह बिंदु है जहां विपक्ष की बुद्धिमत्ता पर तरस आता है क्योंकि उसने इस पूरे खेल को केवल संख्या के नजरिए से देखा, जबकि भाजपा इसे नैरेटिव और जनमत के स्तर पर खेल रही थी।
जब सरकार को पहले से यह स्पष्ट था कि एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है और संविधान संशोधन जैसे विधेयक को पास कराना संभव नहीं होगा, तब भी ऐसे बिल को संसद में लाना किसी जल्दबाजी या राजनीतिक भूल का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि यह एक सुनियोजित कदम था, जिसका उद्देश्य केवल विधेयक पारित कराना नहीं बल्कि पूरे देश में एक मजबूत संदेश देना था, और भाजपा इसमें सफल भी रही, क्योंकि उसने महिला आरक्षण जैसे नैतिक रूप से मजबूत मुद्दे को केंद्र में रखकर विपक्ष को एक ऐसी स्थिति में खड़ा कर दिया जहां उसका हर कदम उसे नुकसान पहुंचाने वाला था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार की गई अपीलें, जिसमें उन्होंने सांसदों से अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने और देश की महिलाओं को उनका अधिकार देने की बात कही, केवल भावनात्मक अपील नहीं थीं बल्कि एक राजनीतिक फ्रेम तैयार करने की कोशिश थीं, जिसमें जो भी इस विधेयक का विरोध करेगा, वह सीधे-सीधे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खड़ा दिखाई देगा, और यही वह जाल था जिसे विपक्ष समझ नहीं पाया, उसने तकनीकी मुद्दो- जैसे जनगणना का आधार, परिसीमन का समय और क्षेत्रीय असंतुलन-को आगे रखकर विरोध किया, लेकिन जनता के बड़े हिस्से के लिए यह बहस इतनी जटिल नहीं है, उनके लिए सीधा सवाल है कि महिलाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर कौन साथ खड़ा था और कौन विरोध में।
यही वह क्षण है जहां भाजपा की राजनीतिक चतुराई स्पष्ट रूप से सामने आती है, क्योंकि उसने यह सुनिश्चित किया कि भले ही विधेयक पारित न हो, लेकिन चर्चा का केंद्र वही बना रहे, और हुआ भी यही, आज बहस इस बात पर नहीं है कि बिल क्यों गिरा, बल्कि इस बात पर है कि महिलाओं को उनका हक देने में किसने बाधा डाली, और इस नैरेटिव में भाजपा खुद को प्रयास करने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि विपक्ष रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है।
विपक्ष के नेताओं, खासकर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान इस बात को और स्पष्ट करते हैं कि वे इस पूरे मुद्दे को किस तरह समझने में चूक गए, उन्होंने इसे एक राजनीतिक चाल कहकर खारिज करने की कोशिश की, लेकिन यह समझ नहीं पाए कि राजनीति में कई बार चाल ही असली खेल होती है, और जो उसे पहचान नहीं पाता, वह खुद मोहरा बन जाता है, यही कारण है कि आज विपक्ष इस “जीत’’ पर भले ही संतुष्ट दिखाई दे रहा हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह उसके लिए एक नुकसानदायक स्थिति बन सकती है। भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम के जरिए एक साथ कई लक्ष्य साधे हैं, उसने महिला मतदाताओं के बीच अपनी प्रतिबद्धता का संदेश दिया, विपक्ष को नैतिक रूप से कठघरे में खड़ा किया और आने वाले चुनावों के लिए एक प्रभावी मुद्दा तैयार किया, खासकर उन राज्यों में जहां महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभाती हैं, यह कोई संयोग नहीं है कि इस पूरे घटनाक्रम का समय भी चुनावी माहौल के आसपास रखा गया, क्योंकि ऐसे समय में बनाए गए नैरेटिव का प्रभाव अधिक गहरा होता है।
इसके अलावा सरकार ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने कदमों को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाएगी, अन्य संबंधित विधेयकों पर वोटिंग टालकर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि यह एक लंबी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पहले राजनीतिक और सामाजिक माहौल तैयार किया जाएगा और फिर उपयुक्त समय पर संशोधित प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ा जाएगा, यह दूरदर्शिता ही भाजपा को अन्य दलों से अलग बनाती है।
वहीं विपक्ष की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है, जहां वह तात्कालिक जीत के उत्साह में इतना डूबा हुआ है कि उसे यह समझ ही नहीं आ रहा कि उसने अनजाने में भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक हथियार दे दिया है, यही कारण है कि उसकी इस जीत में भी एक तरह की कमजोरी छिपी हुई है, क्योंकि वह जनभावनाओं के स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाया।
अंतत यह कहा जा सकता है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल एक विधेयक के पास या फेल होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में बदलते खेल के नियमों का उदाहरण है, जहां केवल बहुमत ही नहीं बल्कि नैरेटिव, समय और मनोविज्ञान भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भाजपा ने इन सभी पहलुओं को साधते हुए एक ऐसी चाल चली है जिसे समझने में विपक्ष पूरी तरह असफल रहा है, और यही कारण है कि आज उसकी “हार’’ भी एक रणनीतिक जीत के रूप में दिखाई दे रही है, जबकि विपक्ष की “जीत’’ में भी एक केतरह की असमंजस और दूरदृष्टि की कमी साफ झलकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार हैं।)
लोकसभा में सीटें बढ़ाने, परिसीमन लागू करने और महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने से जुड़े विधेयकों का गिरना पहली नजर में भले ही नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक झटका दिखाई देता हो, लेकिन भारतीय राजनीति को सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि यह घटनाक्रम दरअसल एक गहरी रणनीति का हिस्सा था, और यही वह बिंदु है जहां विपक्ष की बुद्धिमत्ता पर तरस आता है क्योंकि उसने इस पूरे खेल को केवल संख्या के नजरिए से देखा, जबकि भाजपा इसे नैरेटिव और जनमत के स्तर पर खेल रही थी।
जब सरकार को पहले से यह स्पष्ट था कि एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है और संविधान संशोधन जैसे विधेयक को पास कराना संभव नहीं होगा, तब भी ऐसे बिल को संसद में लाना किसी जल्दबाजी या राजनीतिक भूल का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि यह एक सुनियोजित कदम था, जिसका उद्देश्य केवल विधेयक पारित कराना नहीं बल्कि पूरे देश में एक मजबूत संदेश देना था, और भाजपा इसमें सफल भी रही, क्योंकि उसने महिला आरक्षण जैसे नैतिक रूप से मजबूत मुद्दे को केंद्र में रखकर विपक्ष को एक ऐसी स्थिति में खड़ा कर दिया जहां उसका हर कदम उसे नुकसान पहुंचाने वाला था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार की गई अपीलें, जिसमें उन्होंने सांसदों से अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने और देश की महिलाओं को उनका अधिकार देने की बात कही, केवल भावनात्मक अपील नहीं थीं बल्कि एक राजनीतिक फ्रेम तैयार करने की कोशिश थीं, जिसमें जो भी इस विधेयक का विरोध करेगा, वह सीधे-सीधे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खड़ा दिखाई देगा, और यही वह जाल था जिसे विपक्ष समझ नहीं पाया, उसने तकनीकी मुद्दो- जैसे जनगणना का आधार, परिसीमन का समय और क्षेत्रीय असंतुलन-को आगे रखकर विरोध किया, लेकिन जनता के बड़े हिस्से के लिए यह बहस इतनी जटिल नहीं है, उनके लिए सीधा सवाल है कि महिलाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर कौन साथ खड़ा था और कौन विरोध में।
यही वह क्षण है जहां भाजपा की राजनीतिक चतुराई स्पष्ट रूप से सामने आती है, क्योंकि उसने यह सुनिश्चित किया कि भले ही विधेयक पारित न हो, लेकिन चर्चा का केंद्र वही बना रहे, और हुआ भी यही, आज बहस इस बात पर नहीं है कि बिल क्यों गिरा, बल्कि इस बात पर है कि महिलाओं को उनका हक देने में किसने बाधा डाली, और इस नैरेटिव में भाजपा खुद को प्रयास करने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि विपक्ष रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है।
विपक्ष के नेताओं, खासकर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान इस बात को और स्पष्ट करते हैं कि वे इस पूरे मुद्दे को किस तरह समझने में चूक गए, उन्होंने इसे एक राजनीतिक चाल कहकर खारिज करने की कोशिश की, लेकिन यह समझ नहीं पाए कि राजनीति में कई बार चाल ही असली खेल होती है, और जो उसे पहचान नहीं पाता, वह खुद मोहरा बन जाता है, यही कारण है कि आज विपक्ष इस “जीत’’ पर भले ही संतुष्ट दिखाई दे रहा हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह उसके लिए एक नुकसानदायक स्थिति बन सकती है। भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम के जरिए एक साथ कई लक्ष्य साधे हैं, उसने महिला मतदाताओं के बीच अपनी प्रतिबद्धता का संदेश दिया, विपक्ष को नैतिक रूप से कठघरे में खड़ा किया और आने वाले चुनावों के लिए एक प्रभावी मुद्दा तैयार किया, खासकर उन राज्यों में जहां महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभाती हैं, यह कोई संयोग नहीं है कि इस पूरे घटनाक्रम का समय भी चुनावी माहौल के आसपास रखा गया, क्योंकि ऐसे समय में बनाए गए नैरेटिव का प्रभाव अधिक गहरा होता है।
इसके अलावा सरकार ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने कदमों को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाएगी, अन्य संबंधित विधेयकों पर वोटिंग टालकर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि यह एक लंबी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पहले राजनीतिक और सामाजिक माहौल तैयार किया जाएगा और फिर उपयुक्त समय पर संशोधित प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ा जाएगा, यह दूरदर्शिता ही भाजपा को अन्य दलों से अलग बनाती है।
वहीं विपक्ष की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है, जहां वह तात्कालिक जीत के उत्साह में इतना डूबा हुआ है कि उसे यह समझ ही नहीं आ रहा कि उसने अनजाने में भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक हथियार दे दिया है, यही कारण है कि उसकी इस जीत में भी एक तरह की कमजोरी छिपी हुई है, क्योंकि वह जनभावनाओं के स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाया।
अंतत यह कहा जा सकता है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल एक विधेयक के पास या फेल होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में बदलते खेल के नियमों का उदाहरण है, जहां केवल बहुमत ही नहीं बल्कि नैरेटिव, समय और मनोविज्ञान भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भाजपा ने इन सभी पहलुओं को साधते हुए एक ऐसी चाल चली है जिसे समझने में विपक्ष पूरी तरह असफल रहा है, और यही कारण है कि आज उसकी “हार’’ भी एक रणनीतिक जीत के रूप में दिखाई दे रही है, जबकि विपक्ष की “जीत’’ में भी एक केतरह की असमंजस और दूरदृष्टि की कमी साफ झलकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार हैं।)