वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

धार्मिक ट्रस्टों में वित्तीय सुशासन की अनिवार्यता

प्रकाशित: 14-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. प्रदीप कुमार केशरी
हाल के दिनों में देश के कुछ प्रमुख धार्मिक संस्थानों से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं, दानराशि के कथित दुरुपयोग तथा परिसंपत्तियों के प्रबंधन को लेकर उठे प्रश्नों ने एक गंभीर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है। इन घटनाओं को किसी एक धर्म, संप्रदाय या संस्था तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस संस्थागत व्यवस्था का है जिसके भरोसे करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास और हजारों करोड़ रुपये की सार्वजनिक आस्था से निर्मित संपत्ति संचालित होती है।
यदि ऐसे विवाद बार-बार सामने आते हैं, तो उनका प्रभाव केवल संबंधित संस्था की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता। इससे श्रद्धालुओं का विश्वास प्रभावित होता है, धर्मार्थ गतिविधियों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं और भारत की तेजी से विकसित हो रही आस्था अर्थव्यवस्था भी दीर्घकाल में प्रभावित हो सकती है। इसलिए आज आवश्यकता किसी एक विवाद पर प्रतिक्रिया देने की नहीं, बल्कि यह विचार करने की है कि क्या भारत के धार्मिक ट्रस्ट इक्कीसवीं सदी की आर्थिक और प्रशासनिक अपेक्षाओं के अनुरूप संचालित हो रहे हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था की चर्चा प्राय कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र के संदर्भ में की जाती है। हाल के वर्षों में डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित अर्थव्यवस्था और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था जैसे नए विमर्श भी नीति-निर्माण के केंद्र में आए हैं। किंतु एक और आर्थिक शक्ति तेजी से उभर रही है, जिस पर अभी अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया गया है-आस्था अर्थव्यवस्था (इaग्tप् म्दिंहदस्ब्)।
आस्था अर्थव्यवस्था से आशय उन सभी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आर्थिक गतिविधियों से है, जो धार्मिक आस्था, तीर्थयात्राओं, धार्मिक पर्यटन, स्वैच्छिक दान, धर्मार्थ संस्थाओं, पूजा-सामग्री, आतिथ्य, परिवहन, हस्तशिल्प तथा उनसे जुड़े रोजगार और सेवाओं के माध्यम से उत्पन्न होती हैं। यह केवल धार्मिक गतिविधियों का समुच्चय नहीं, बल्कि सामाजिक पूंजी, सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय उद्यमिता और समावेशी विकास का एक व्यापक आर्थिक तंत्र है।
भारत विश्व की सबसे प्राचीन और सर्वाधिक जीवंत आध्यात्मिक परंपराओं का देश है। प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, चर्चों, मठों, बौद्ध विहारों, जैन तीर्थों और सूफी दरगाहों की यात्रा करते हैं। इन यात्राओं के साथ परिवहन, होटल, धर्मशालाएँ, भोजनालय, प्रसाद उद्योग, पुष्प व्यवसाय, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार, डिजिटल भुगतान तथा हजारों लघु एवं मध्यम उद्यम जुड़े हुए हैं। परिणामस्वरूप आस्था केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव नहीं रहती, बल्कि स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति बन जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता मिली है। अनेक तीर्थस्थलों पर आधुनिक अवसंरचना का विकास हुआ है, जिससे स्थानीय व्यापार, पर्यटन, परिवहन और रोजगार को नई गति मिली है। दूसरी ओर, करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा स्वेच्छा से दिए जाने वाले दान से अस्पताल, विद्यालय, छात्रावास, अन्नक्षेत्र, गौशालाएँ, आश्रम, पुस्तकालय और अनेक समाजसेवी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। इस दृष्टि से धार्मिक ट्रस्ट भारत के सबसे बड़े परोपकारी संस्थागत नेटवर्कों में गिने जा सकते हैं।
अर्थशास्त्र की दृष्टि से यह पूंजी अत्यंत विशिष्ट है। यह न तो सरकार का कर-राजस्व है और न ही निजी निवेशकों की पूंजी। यह समाज के विश्वास से निर्मित सामाजिक पूंजी (एदम्ग्aत् ण्aज्ग्taत्) है। यदि इसका पारदर्शी और दक्षतापूर्वक उपयोग हो, तो यह शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए एक स्थायी वित्तीय आधार बन सकती है।
किसी भी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसकी पूंजी नहीं, बल्कि उस पर जनता का विश्वास होता है। बैंकिंग व्यवस्था इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। लोग अपनी जीवनभर की बचत बैंकों में इसलिए जमा करते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि उनका धन मजबूत संस्थागत व्यवस्था द्वारा सुरक्षित है। यही सिद्धांत धार्मिक ट्रस्टों पर भी लागू होता है। श्रद्धालु दान इसलिए नहीं देते कि उन्हें कोई कानूनी बाध्यता है; वे इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि उनका अर्पण धर्म, सेवा और लोककल्याण के उद्देश्य से उपयोग किया जाएगा।
यही कारण है कि धार्मिक ट्रस्ट केवल संपत्ति के स्वामी नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास के न्यासधारी (इग्dल्म्ग्arगे) हैं। उनकी जिम्मेदारी केवल धन का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उसका पारदर्शी, उत्तरदायी और उद्देश्यपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना भी है।
समस्या आस्था की नहीं, बल्कि संस्थागत शासन की है। जहाँ विशाल सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन आधुनिक वित्तीय प्रणालियों के अनुरूप नहीं होता, वहाँ अनियमितताओं की संभावना बढ़ जाती है। हाल के वर्षों में विभिन्न धार्मिक संस्थाओं से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं, भूमि प्रबंधन, खरीद प्रक्रियाओं तथा दानराशि के उपयोग को लेकर उठे प्रश्न इसी ओर संकेत करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक संस्थाएँ समाज की सेवा नहीं कर रहीं; वस्तुत अधिकांश संस्थाएँ उत्कृष्ट सेवा कार्य कर रही हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि उनके प्रशासन को आधुनिक वित्तीय सुशासन से सुदृढ़ बनाया जाए।
विश्व के अनेक देशों ने धर्मार्थ संस्थाओं के लिए ऐसे वित्तीय शासन मॉडल विकसित किए हैं, जिनमें धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप किए बिना पारदर्शिता, स्वतंत्र लेखा परीक्षण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाता है। भारत इन अनुभवों से सीख सकता है, किंतु उनकी यथावत् प्रतिलिपि नहीं कर सकता। हमारी धार्मिक विविधता, संघीय व्यवस्था और संविधान के अनुच्छेद 26 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता एक अलग दृष्टिकोण की मांग करती है।
भारत को एक स्वदेशी वित्तीय शासन मॉडल विकसित करना होगा। मैं इसे 'सीमित वित्तीय नियामक' (ऊप्ग्ह इग्हहम्ग्aत् Rाgल्त्atद) का मॉडल कहता हूँ। इसका उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं का संचालन अपने हाथ में लेना नहीं होगा। यह पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपराओं अथवा आध्यात्मिक निर्णयों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसका कार्य केवल यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़े धार्मिक ट्रस्ट आधुनिक वित्तीय प्रशासन के न्यूनतम मानकों का पालन करें।
इसके अंतर्गत समान लेखांकन मानक, डिजिटल बहीखाता, स्वतंत्र वार्षिक लेखा परीक्षण, परिसंपत्तियों का डिजिटल अभिलेखीकरण, आय-व्यय का सार्वजनिक प्रकटीकरण, हितों के टकराव से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश तथा शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था विकसित की जा सकती है। साथ ही धार्मिक ट्रस्टों को बैंकिंग क्षेत्र की सफल व्यवस्थाएं-जैसे मेकर-चेकर प्रणाली, आंतरिक लेखा परीक्षण, जोखिम प्रबंधन और डिजिटल ऑडिट टेल-भी अपनानी चाहिए। दानपात्रों से प्राप्त नकदी की गणना और बैंक में जमा करने की प्रक्रिया भी मानकीकृत होनी चाहिए। ये सुधार धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित नहीं करेंगे; बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास को और अधिक मजबूत बनाएँगे। वित्तीय सुशासन किसी धार्मिक संस्था पर अविश्वास का प्रतीक नहीं है, बल्कि ईमानदार और समर्पित प्रबंधकों की प्रतिष्ठा की रक्षा करने वाला सबसे प्रभावी साधन है।
अब समय आ गया है कि भारत आस्था अर्थव्यवस्था को सार्वजनिक नीति के एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में भी स्वीकार करे। जिस प्रकार कृषि, उद्योग और पर्यटन के आर्थिक योगदान का अध्ययन किया जाता है, उसी प्रकार राष्ट्रीय आस्था अर्थव्यवस्था उपग्रह लेखांकन (इaग्tप् म्दिंहदस्ब् एatात्त्ग्tा Aम्म्दल्हू) विकसित करने पर विचार होना चाहिए। इससे धार्मिक पर्यटन, स्वैच्छिक दान, धर्मार्थ व्यय, रोजगार तथा उनसे उत्पन्न प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और प्रेरित आर्थिक प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन संभव होगा। साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
भारत की सभ्यता ने सदैव यह संदेश दिया है कि आस्था केवल व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि लोकमंगल का भी आधार है। इक्कीसवीं सदी में इस लोकमंगल को स्थायी शक्ति देने के लिए आस्था के साथ सुशासन, श्रद्धा के साथ पारदर्शिता और आध्यात्मिकता के साथ वित्तीय उत्तरदायित्व को जोड़ना होगा।
यदि भारत अपनी आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक वित्तीय शासन, संस्थागत उत्कृष्टता और संवैधानिक मूल्यों के साथ जोड़ने में सफल होता है, तो वह केवल विश्व की सबसे बड़ी आस्था अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि विश्व की सबसे विश्वसनीय आस्था अर्थव्यवस्था भी बन सकता है। यही आस्था से अर्थव्यवस्था और अर्थव्यवस्था से राष्ट्र-निर्माण की भारत की अगली विकास यात्रा होगी।
(लेखक अर्थशास्त्राr एवं सेवानिवृत्त बैंकर हैं।)