पॉक्सो कानून में दर्ज मामले समाज के सामने बड़ी चुनौती
प्रकाशित: 14-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित निर्माणाधीन मॉल में दरिंदों के द्वारा एक बच्ची के साथ कथित दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर शव फेंकने की घटना भी समाज को झकझोर देने वाली है। मॉल में काम करने वाले मजदूरों की यह बच्ची थी और निर्माण अधीन बिल्डिंग में ही रहकर अपना गुर्जर बसर कर रहे थे। लगता है इस बिल्डिंग में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे। यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह केवल एक जघन्य अपराध नहीं बल्कि मानवता को शर्मसार करने वाला कृत्य है। समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड यह नहीं है कि वह कितनी ऊंची इमारतें, मॉल, सड़कें और आधुनिक सुविधाएं विकसित कर रहा है, बल्कि यह है कि वहां महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है। दुर्भाग्य से देश के विभिन्न राज्यों से आए दिन नाबालिग बच्चियों और बच्चों के साथ दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म, अपहरण और हत्या जैसी हृदय विदारक घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं, बल्कि समाज में बढ़ती विकृत मानसिकता, महिलाओं और बच्चों के प्रति असंवेदनशीलता तथा नैतिक मूल्यों के क्षरण का भी संकेत देती हैं। किसी मासूम बच्चे के साथ यौन हिंसा करना और फिर उसकी हत्या कर साक्ष्य मिटाने का प्रयास करना अत्यंत अमानवीय और घिनौना अपराध है। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार जीवनभर ऐसे दर्द के साथ जीने को मजबूर हो जाता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। एनसीआरबी के आंकड़े भी बताते हैं कि बच्चों के विरुद्ध अपराध तथा यौन अपराधों के मामले लगातार बड़ी संख्या में दर्ज हो रहे हैं। यद्यपि अधिक मामले दर्ज होना इस बात का भी संकेत हो सकता है कि लोग अब शिकायत दर्ज कराने के लिए पहले की तुलना में अधिक आगे आ रहे हैं, फिर भी ऐसी घटनाओं की निरंतरता गंभीर चिंता का विषय है। विशेष रूप से नाबालिगों के विरुद्ध अपराधों में पॉक्सो कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या समाज के सामने बड़ी चुनौती प्रस्तुत करती है। सरकारों ने समय-समय पर कानूनों को कठोर बनाया है। पॉक्सो अधिनियम, बीएनएस के प्रावधान, फास्ट ट्रैक अदालतें, डीएनए जांच, सीसीटीवी निगरानी तथा महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े अनेक कदम उठाए गए हैं। इसके बावजूद यदि ऐसी घटनाएं रुक नहीं रही हैं, तो यह स्पष्ट है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। कानून का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब त्वरित और निष्पक्ष जांच हो, दोषियों को शीघ्र सजा मिले और न्याय प्रािढया में अनावश्यक विलंब न हो। समाज की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। बच्चों को गुड टच और बैड टच की जानकारी देना, स्कूलों और परिवारों में जागरूकता बढ़ाना, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना तथा संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत सूचना पुलिस को देना आवश्यक है। निर्माणाधीन इमारतों, मॉल, फैक्ट्रियों और सुनसान स्थानों पर सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। जहां बड़ी संख्या में लोग कार्यरत हों, वहां सीसीटीवी, सुरक्षा कर्मियों का प्रभावी सत्यापन और नियमित निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए। मीडिया और समाज को भी ऐसे मामलों में संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।