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महिला आरक्षण विधेयक खारिज: लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन बिल खारिज

प्रकाशित: 19-04-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
महिला आरक्षण विधेयक खारिज: लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन बिल खारिज
संसद के बजट सत्र के समापन के ठीक पहले एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया। लोकसभा में शुक्रवार (17 अप्रैल 2026) को महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वें संशोधन) विधेयक 2026 को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका और वह खारिज हो गया। सरकार को 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में केवल 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट रहे। कुल 528 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा लिया।
यह विधेयक नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) को जल्द लागू करने के लिए लाया गया था। 2023 का कानून महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देता है, लेकिन उसकी क्रियान्विति जनगणना और परिसीमन के बाद तय की गई थी। सरकार ने 2026 में इसे आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने, परिसीमन प्रक्रिया को तेज करने और 2029 के चुनावों से आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव रखा था। विपक्ष का एकजुट विरोध विपक्षी दलों ने बिल का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन के जरिए दक्षिणी राज्यों की संसदीय सीटों को कम करने और अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस, डीएमके समेत कई विपक्षी दल ने कहा कि बिना नई जनगणना के परिसीमन निष्पक्ष नहीं होगा और इससे ओबीसी तथा दक्षिण भारत की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अंतिम समय में भी सभी दलों से “अंतःकरण की आवाज” पर वोट करने की अपील की। अमित शाह ने कहा कि दक्षिणी राज्यों की सीटों में वृद्धि होगी और सरकार जाति जनगणना के लिए भी तैयार है, लेकिन विपक्ष नहीं माना परिणामस्वरूप बिल दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। मतदान के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संबंधित अन्य बिलों (परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन) को वापस ले लिया। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं • सरकार पक्ष: भाजपा ने इसे विपक्ष की “महिलाओं के साथ धोखाधड़ी” बताया। उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था, लेकिन अब जब लागू करने का समय आया तो विपक्ष ने रोड़ा अटकाया। कई भाजपा नेताओं ने कहा कि इतिहास विपक्ष को इसका जवाब मांगेगा। • विपक्ष: राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने बिल को “शर्मनाक” करार दिया और आरोप लगाया कि यह चुनावी मैप को रिग करने की साजिश है। उन्होंने दावा किया कि महिला आरक्षण का समर्थन तो है, लेकिन परिसीमन से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति है। यह मोदी सरकार के 12 साल के शासन में लोकसभा में पहली बड़ी विधायी हार मानी जा रही है। महिला आरक्षण की यात्रा महिला आरक्षण की मांग दशकों पुरानी है। 1996 से कई बार बिल पेश हुए, लेकिन पास नहीं हो सके। 2023 में NDA सरकार ने इसे पारित करवाया, जिसे ऐतिहासिक कदम माना गया। पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी पहले से ही अच्छी है (लगभग 50 प्रतिशत तक), लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिल के खारिज होने से 2029 के चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने की संभावना अब कम हो गई है। मूल 2023 कानून अब 2027 जनगणना और उसके बाद के परिसीमन पर निर्भर रहेगा, जिससे देरी हो सकती है। आगे क्या? संसद का बजट सत्र साइन डाई स्थगित हो चुका है। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार अगले सत्र में नया रास्ता अपनाएगी या विपक्ष से बातचीत बढ़ाएगी। महिला संगठन और कई नागरिक समाज के लोग इस मुद्दे पर निराशा जता रहे हैं। वे चाहते हैं कि महिला आरक्षण को किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द लागू किया जाए, बिना राजनीतिक खेल के। यह घटनाक्रम दिखाता है कि भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन उसे लागू करने में अभी भी गहरी विभाजन और अविश्वास बरकरार है। देश की आधी आबादी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सपना अभी अधूरा ही रह गया है।