यूपी में शिक्षकों को साधने में जुटी योगी सरकार
प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अजय कुमार
गांव की पगडंडियों से लेकर कस्बों की गलियों तक, उत्तर प्रदेश में 'मास्टर साहब' का रुतबा किसी नेता से कम नहीं होता। बच्चों को पहाड़े रटाने वाला यही शिक्षक चुनाव के मौसम में पूरे मोहल्ले की राय बदलने की ताकत रखता है। यही वजह है कि पिछले तीन महीनों में योगी आदित्यनाथ सरकार ने शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के लिए घोषणाओं की मानो झड़ी ही लगा दी है। कैशलेस इलाज से लेकर करोड़ों के दुर्घटना बीमा तक, हर फैसला सीधे इस बड़े वोट-बैंक को साधने की कोशिश जैसा दिख रहा है।पहले जरा आंकड़ों की जमीन पर खड़े होकर समझें कि यह तबका है कितना बड़ा। अकेले बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत ही करीब पांच से छह लाख नियमित शिक्षक काम कर रहे हैं। इनके साथ डेढ़ लाख के आसपास शिक्षामित्र और लगभग पच्चीस हजार अंशकालिक अनुदेशक भी इसी तंत्र का हिस्सा हैं। इसके अलावा राजकीय और सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और स्टाफ की संख्या दो से ढाई लाख के बीच बैठती है। जब इनमें रिटायर हो चुके शिक्षक और इन सबके परिवार जोड़ दिए जाएं, तो यह संख्या तीस से चालीस लाख वोटों तक पहुंच जाती है। सिर्फ संख्या ही नहीं, समाज में शिक्षक की जो साख होती है, वह इस असर को और बड़ा बना देती है। गांव का वोटर चुनाव के वक्त मास्टर साहब की बात को गंभीरता से लेता है, और चुनाव ड्यूटी से लेकर वोटर लिस्ट दुरुस्त करने तक का ज्यादातर काम भी इन्हीं के कंधों पर टिका होता है। शायद इसीलिए कोई भी सरकार इस तबके को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।
अब बात करते हैं उन फैसलों की, जिन्होंने पिछले कुछ हफ्तों में सुर्खियां बटोरीं। जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री ने वाराणसी की धरती से 'मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना' की शुरुआत की। इस योजना के दायरे में करीब बारह से पंद्रह लाख शिक्षक, शिक्षामित्र, अनुदेशक और यहां तक कि स्कूलों में खाना बनाने वाली रसोइया बहनें भी आ गई हैं। हर परिवार को सालाना पांच लाख रुपये तक का इलाज मुफ्त मिलेगा, और इसका पूरा प्रीमियम खुद सरकार भरेगी। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि लंबे समय से शिक्षक संगठन स्वास्थ्य सुरक्षा की मांग उठाते रहे हैं, खासकर कोविड के बाद जब अचानक इलाज का खर्च आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगा था। इसी कड़ी में सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के साथ मिलकर एक बड़ा दुर्घटना बीमा कवर भी शुरू किया है। नियमित शिक्षकों के परिवार को अब किसी हादसे की सूरत में एक करोड़ रुपये तक मिल सकते हैं, जबकि संविदा पर काम कर रहे अनुदेशकों और शिक्षामित्रों को तीस से अस्सी लाख रुपये तक का कवर दिया गया है। यह उन तबकों के लिए बड़ी राहत है, जो अब तक किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित थे।अनुदेशकों की बात करें तो उनकी कहानी थोड़ी अलग है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके बेहद कम मानदेय पर नाराजगी जताई थी, जिसके बाद मई में सरकार हरकत में आई और मासिक मानदेय नौ हजार से बढ़ाकर सीधे सत्रह हजार रुपये कर दिया।
गांव की पगडंडियों से लेकर कस्बों की गलियों तक, उत्तर प्रदेश में 'मास्टर साहब' का रुतबा किसी नेता से कम नहीं होता। बच्चों को पहाड़े रटाने वाला यही शिक्षक चुनाव के मौसम में पूरे मोहल्ले की राय बदलने की ताकत रखता है। यही वजह है कि पिछले तीन महीनों में योगी आदित्यनाथ सरकार ने शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के लिए घोषणाओं की मानो झड़ी ही लगा दी है। कैशलेस इलाज से लेकर करोड़ों के दुर्घटना बीमा तक, हर फैसला सीधे इस बड़े वोट-बैंक को साधने की कोशिश जैसा दिख रहा है।पहले जरा आंकड़ों की जमीन पर खड़े होकर समझें कि यह तबका है कितना बड़ा। अकेले बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत ही करीब पांच से छह लाख नियमित शिक्षक काम कर रहे हैं। इनके साथ डेढ़ लाख के आसपास शिक्षामित्र और लगभग पच्चीस हजार अंशकालिक अनुदेशक भी इसी तंत्र का हिस्सा हैं। इसके अलावा राजकीय और सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और स्टाफ की संख्या दो से ढाई लाख के बीच बैठती है। जब इनमें रिटायर हो चुके शिक्षक और इन सबके परिवार जोड़ दिए जाएं, तो यह संख्या तीस से चालीस लाख वोटों तक पहुंच जाती है। सिर्फ संख्या ही नहीं, समाज में शिक्षक की जो साख होती है, वह इस असर को और बड़ा बना देती है। गांव का वोटर चुनाव के वक्त मास्टर साहब की बात को गंभीरता से लेता है, और चुनाव ड्यूटी से लेकर वोटर लिस्ट दुरुस्त करने तक का ज्यादातर काम भी इन्हीं के कंधों पर टिका होता है। शायद इसीलिए कोई भी सरकार इस तबके को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।
अब बात करते हैं उन फैसलों की, जिन्होंने पिछले कुछ हफ्तों में सुर्खियां बटोरीं। जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री ने वाराणसी की धरती से 'मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना' की शुरुआत की। इस योजना के दायरे में करीब बारह से पंद्रह लाख शिक्षक, शिक्षामित्र, अनुदेशक और यहां तक कि स्कूलों में खाना बनाने वाली रसोइया बहनें भी आ गई हैं। हर परिवार को सालाना पांच लाख रुपये तक का इलाज मुफ्त मिलेगा, और इसका पूरा प्रीमियम खुद सरकार भरेगी। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि लंबे समय से शिक्षक संगठन स्वास्थ्य सुरक्षा की मांग उठाते रहे हैं, खासकर कोविड के बाद जब अचानक इलाज का खर्च आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगा था। इसी कड़ी में सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के साथ मिलकर एक बड़ा दुर्घटना बीमा कवर भी शुरू किया है। नियमित शिक्षकों के परिवार को अब किसी हादसे की सूरत में एक करोड़ रुपये तक मिल सकते हैं, जबकि संविदा पर काम कर रहे अनुदेशकों और शिक्षामित्रों को तीस से अस्सी लाख रुपये तक का कवर दिया गया है। यह उन तबकों के लिए बड़ी राहत है, जो अब तक किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित थे।अनुदेशकों की बात करें तो उनकी कहानी थोड़ी अलग है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके बेहद कम मानदेय पर नाराजगी जताई थी, जिसके बाद मई में सरकार हरकत में आई और मासिक मानदेय नौ हजार से बढ़ाकर सीधे सत्रह हजार रुपये कर दिया।