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वंचित समाज के राजनीतिक आरक्षण की सार्थकता

प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
4 जुलाई 2026 को मोदी सरकार में सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे दलित समाज के प्रमुख नेता के रूप में जाने जाए वाले जीतन राम मांझी ने 1 जनसभा में यह कहकर विवाद पैदा कर दिया कि अनुसूचित के लिए आरक्षित लोकसभा विधानसभा सीटों पर अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार सिर्फ अनुसूचित जाति की दलितों को ही होना चाहिए।
श्री जितना माझी लगभग 45 वर्षों से सक्रिय राजनीति में है और लंबे समय से विधायक बिहार में मंत्री मुख्यमंत्री पद का उत्तरदायित्व निभा चुके हैं और वर्तमान में केंद्र सरकार के प्रमुख विभाग एमएसएमई मंत्री के रूप में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं, इतनी लम्बी राजनीतिक पारी खेलने के बाद उन्हें ऐसा एहसास क्यों हुआ कि दलितों को जो राजनीतिक आरक्षण मिला हुआ है उससे उन उद्देश्यों के लिए की पूर्ति नहीं हो पा रही है जिसके लिए संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो (दलितों और आदिवासियों) के लिए राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
लंदन में 1930 के दशक में आयोजित पहली गोलमेज कांफ्रेंस में डॉक्टर अंबेडकर ने मांगकी थी कि डिप्रेस्ड क्लासेस (जिनको अब दलित कहते हैं) अपने नेता का चुनाव खुद कर सकेंगे, संभावित परिणाम दलित समाज और बाकी हिंदू समाज को लेकर देश का एक और विभाजन होता पर इस विभाजन को रोकने के लिए महात्मा गांधी और डॉ आंबेडकर के बीच 1932 में पूना पैकेट हुआ जिसे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण का प्रावधान किया गया,जिसका मुख्य उद्देश्य निम्न था -
ऐतिहासिक अन्याय का सुधार - भारत में सदियों से जाति व्यवस्था के कारण दलितों को शिक्षा और सत्ता से दूर रखा गया, राजनीतिक आरक्षण एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा गया। यह उन्हें लोकतंत्र की मुख्य धारा में लाने का प्रयास था और ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के अवसर के रूप में लागू किया गया।
नीति निर्माण में दलितों का योगदान - दलित और आदिवासिंयो को राजनीतिक आरक्षण देने का मुख्य उद्देश्य यह था कि आरक्षित सीटों से जो दलित आदिवासी प्रतिनिधि चुनकर आएंगे, वे अपने समुदाय की समस्याओं जैसे छुआछूत और सामाजिक अत्याचार पर सीधे कानून बना सकेंगे, इसके बिना संसद या विधानसभा में इस तरह के मुद्दों को उठाया नहीं जा सकता था। यह आरक्षण केवल एक राजनीतिक लाभ के वक्त नहीं है बल्कि एक देश में लोकतंत्र को मजबूत बनाने का आधार है क्योंकि यह हजारों वर्षों से दबे कुचले लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुख्य प्रश्न यह है कि राजनीतिक आरक्षण जिस उद्देश्य के लिए किया गया था क्या यह अपने उद्देश्य में पूरा हुआ है आरक्षित सीटों पर दलित प्रतिनिधियों के लिए दलितों के वोट डालने वाले की बात करने वाले जीत ना मांझी स्वयं जानते हैं कि वह अपने समान अधिकारयों के द्वारा घिरे होने का कारण अपने समुदाय मुसहरों के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं, एक मंत्री होने के नाते उन्हें किस व्यक्ति से कितनी देर मिलना है वह उनके सवर्ण निजी सचिव या सवर्ण समाज के अन्य अधिकारी तय करते हैं। उनके मुसहर समाज के लिए लिखित पुस्तक मुसहर समाज का इतिहास व योगदान के प्रकाशन के लिए उनकी अनुमति लेकर नई दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित किया गया और यह तय किया गया कि इस मंच से मुसहरों समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग की जायेगी पर मांझी जी इस कार्पाम में स्वयं न आकर अपने ब्राह्मण निजी सचिव को अपना संदेश पढ़ने के लिए भेज दिया और पुस्तक को मुसहर समाज में वितरणी के लिए उनके मंत्रालय से सी एस आर फंड से कुछ अनुदार मांगा गया पर वह भी नहीं हुआ, बल्कि मुफ्त वितरण के लिए 200-250 प्रतियां दी गई उसका भुगतान मैने किया। यहां तक की उनके व्यक्तिगत स्टाफ में एक भी मुसहर या दलित नहीं है।
कैसी विडम्बना है कि ब्राह्मण या सवर्ण जाति के मंत्रियों के यहां व्यक्तिगत स्टाफ घोषित रूप से उनके बिरादरी के लोग ही रखे जाते हैं। मेरे एक ब्राह्मण मित्र जो मेरा बहुत सम्मान करते थे और मोदी सरकार में मंत्री बने तो मैने कई लोगों को उनके व्यक्तिगत स्टाफ में समायोजन के लिए भेजा तो उनका स्पष्ट संदेश आ गया कि कृपया केवल ब्राह्मण ही भेजे।
दलित और आदिवासी मंत्रियों केव्यक्तिगत स्टाफ में अघोषित रूप में सवर्ण लोग ही रखे जाते हैं इसके लिए चाहे उनके ऊपर संगठन का दबाव हो या कुछ और फिरये मंत्री अपने वोट बैंक के लिए जाति के नाम पर भोले भाले लोगों का क्यों भड़कते है, आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में जितने भी दलित मंत्री हैं एकाध को छोड़कर सभी की पत्नियां और निजी सचिव ब्राह्मण या सवर्ण समाज के हैं। यह कैसे माना जा सकता कि ये नेता आरक्षित सीट से सांसद या मंत्री बने हैंये दलित समाज के गरीब लोगों को समाज के मुख्य धारा में कैसे ला पाएंगे। ये नेता मीटिंग में दलित कल्याण के नारे बेशक लगाए पर घर में दलितों के कल्याण के बारे में बात नहीं करते। क्योंकि उनके घर का वातावरण सवर्ण प्रिय होता है।
जहां तक अनुसूचित जातियों जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों से चुनकर आए जनप्रतिनिधियों का अपने सवर्ण मालियों के रबर स्टैम्प के रूप में काम करने की बात आती है तो मुझे उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद थे 1960 के दशक में लालगंज विधानसभा सीट की याद आती है यह सीट आरक्षित होने पर वहां के दबंग ठाकुर साहब ने अपने हरवाह झिलमिट राम को विधानसभा का टिकट दिलवा दिया, जिस दिन वोटो की गिनती चल रही थी तो झिलमित राम ठाकुर साहब के खेल में हल चला रहे थे, लोगों के पूछने पर की आप वोटो की गिनती के लिए क्यों नहीं गए तो झिलमिट राम ने कहा की ठाकुर साहब गए हैं वह देख लेंगे, वोटो की गिनती हुई और झिलमिट राम विधायक बन गए और सारे कार्यकाल में वे जब में मुहर रखकर घूमते रहे और ठाकुर साहब जहां कहते थे वहां हस्ताक्षर करके मुहर लगा देते,आज भी ग्राम सभा और ब्लॉक में चुनाव है दलित प्रतिनिधि जीतने के बाद भी अपने आकाओं की मजदूरी करते हैं और प्रधान और ब्लॉक प्रमुख का काम उनके मालिक करते हैं आज भी समाचार आते रहते हैं कि ये जनप्रतिनिधि भी अपने स्वर्ण आकाओं के सामने चारपाई पर नहीं बैठ सकते।
मैं उत्तर प्रदेश की मछली शहर सीट जहां का स्थाई निवासी हूं के बारे में बता दो कि पिछले 15 वर्षों में डॉ. विजय सोनकर शास्त्राr सहित अनेक आईएएस और वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न पार्टियों से टिकट मांगा लेकिन यहां पर से जिन लोगों को टिकट दिए गए वे सभी मात्र 12वीं तक पढ़े लिखे थे लेकिन उनकी एक मात्र क्वालिफिकेशन यह थी कि वे लोग वहां के सवर्ण क्षत्रपों की पसंद थे।
वर्ष 1991-92 में पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे और उनके मंत्रिमंडल में आगरा क्षेत्र के एक दलित नेता देश के उपग्रह मंत्री बनाए गए मैं भी उस समय नॉर्थ ब्लॉक में उप सचिव के रूप में नियुक्त था, एक दिन में मंत्री जी के पास शिष्टाचार मुलाकात करने चला गया और उत्सुकतावश पूछ लिया कि आपका को क्या-क्या उत्तरदायित्व मिला है, मेरा आशय उनको मिले विभागों के उत्तरदायित्व से था, पर मंत्री जी ने बताया कि मुझे रहने के लिए कोठी और आने जाने के लिए वातानुकुलित गाड़ी मिली हुई है अब आप समझ सकते हैं कि राजनीतिक आरक्षण के नाम पर आए ऐसे मंत्रियों का ऐसा दृष्टिकोण होगा तो दलित समाज को किस प्रकार से समाज की मुख्य धारा में लाया जा सकेगा।
मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कीभारत के लोकतांत्रिक इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर, बाबू जगजीवन राम, राम विलास पासवान डॉक्टर सत्यनारायण जटिया, सुशील कुमार शिंदे जैसे अपवादों को छोड़कर जो भी दलित नेता मंत्रिमंडल में आए हैं उनकी मांग बस गाड़ी और बंगले तक ही सीमित रह जाती है, जीतन राम मांझी ने यह प्रश्न उठाकर बड़े साहब का काम किया है ।
यह ठीक है कि जितना मर्जी की यह बात सुनने में बड़ी अटपटी सी लग रही है पर यह दम दलित और आदिवासियों को सही मायने में समाज के मुख्य धारा में लाना चाहते हैं तो वर्तमान पद्धति को बदलना होगा यहां तक की संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने पूना पैक को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल माना था क्योंकि वह जान गए थे कि आज के सिस्टम में जो दलित के आदिवासी नेता सांसद या मंत्री बन रहे हैं, वे समाज के लिए संघर्ष करने के बजाय अपनी पार्टियों के गुलाम बने हुए हैं और राजनीतिक दलों द्वारा शिक्षित और प्रतिभाशाली दलित नेताओं को आगे आने ही नहीं दिया जाता आरक्षित सीटों से उन लोगो को टिकट दिया जाता है जो अपने सवर्ण आकाओं की हां में हा मिलाते रहे।
सरकार को इस स्थिति की ओर ध्यान देना होगा और ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी जिससे सुरक्षित सीटों से लोग चुनकर आ सकें जो अपने समाज को मुक्त धारा में लाने की क्षमता व दृढ़ इच्छा रखते हो।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)