श्रम का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी
प्रकाशित: 01-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अवनीश वुमार गुप्ता
भारत यदि वास्तव में समृद्ध, न्यायपूर्ण और शत्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है तो उसे अपने श्रमिकों के हाथ मजबूत करने होंगे।
क्योंकि पसीने की अनदेखी पर खड़ी समृद्धि कभी स्थायी नहीं होती और श्रम का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
हर वर्ष 1 मईं को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि उस वर्ग के सम्मान का दिवस है जिसकी मेहनत पर संसार की अर्थव्यवस्था, उदृाोग, परिवहन, वृषि और सेवा व्यवस्था टिकी हुईं है। आधुनिक समाज की जितनी भी उपलब्धियां दिखाईं देती हैं, उनके पीछे किसी न किसी श्रमिक का श्रम, समय, कौशल और त्याग जुड़ा होता है।
फिर भी यह कटु सत्य है कि विकास की सबसे ऊंची इमारत खड़ी करने वाला व्यत्ति अक्सर स्वयं असुरक्षित जीवन जीता है।
यही विरोधाभास आज के समय का सबसे गंभीर प्रश्न है।
वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन लगातार यह संकेत देता रहा है कि रोजगार के अवसरों और रोजगार की गुणवत्ता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। वर्ष 2024 में विश्व बेरो़जगारी दर लगभग 5 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही, कितु युवाओं में बेरो़जगारी 12 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गईं। इसका अर्थ है कि दुनिया में काम तो उपलब्ध है, पर स्थायी, सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार अब भी सीमित है।
आर्थिक मंदी, युद्ध, जलवायु संकट, तकनीकी परिवर्तन और उत्पादन ढांचे में बदलाव ने श्रम बाजार को अस्थिर बनाया है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाती है, तो उसका पहला प्रभाव श्रमिक वर्ग पर पड़ता है।
भारत की स्थिति इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि देश दुनिया की सबसे बड़ी श्रमशत्ति वाले देशों में शामिल है।
यहां करोड़ों युवा हर वर्ष रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। एक ओर भारत त़ेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, दूसरी ओर रोजगार की गुणवत्ता, आय असमानता और श्रमिक सुरक्षा जैसे प्रश्न लगातार सामने आते रहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज पिछले दशक में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है और करोड़ों लोगों तक विभिन्न योजनाओं का दायरा पहुंचा है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, परंतु वास्तविक चुनौती यह है कि काग़जी कवरेज और जमीन पर मिलने वाले लाभ में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
देश में निर्माण क्षेत्र, परिवहन, छोटे उदृाोग, वृषि, घरेलू कार्यं, खुदरा बाजार, वस्त्र उदृाोग, होटल, खानपान सेवा और डिजिटल मंचों पर आधारित कार्यो में बड़ी संख्या में लोग लगे हुए हैं। इनमें से अधिकांश असंगठित क्षेत्र में कार्यंरत हैं। इनके पास न नियमित अनुबंध होता है, न भविष्य निधि, न स्वास्थ्य बीमा, न पेंशन की स्पष्ट व्यवस्था। यह वर्ग रो़ज कमाता है और रो़ज खर्च करता है। बीमारी, दुर्घटना, काम रुकने या आर्थिक संकट की स्थिति में इनके सामने जीवन संकट खड़ा हो जाता है।
जिस अर्थव्यवस्था की रीढ़ इतना बड़ा वर्ग हो, वहां उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
वुछ लोग तर्व देते हैं कि आज पहले से अधिक अवसर उपलब्ध हैं। डिजिटल मंचों ने युवाओं को नईं संभावनाएं दी हैं।
छोटे नगरों और कस्बों के युवा अब तकनीक के माध्यम से आय र्अजित कर रहे हैं। यह बात सही है कि काम के स्वरूप में परिवर्तन आया है। स्वरोजगार, सेवा आधारित कार्यं और मंच आधारित रोजगार बढ़े हैं। लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या इन अवसरों के साथ सामाजिक सुरक्षा, निाित आय और श्रमिक अधिकार भी जुड़े हैं। यदि उत्तर नहीं है, तो यह अवसर अधूरा है।
आज बड़ी संख्या में युवा वितरण सेवा, परिवहन सेवा, स्वतंत्र कार्यं और अस्थायी अनुबंध आधारित कार्यो में लगे हैं। उन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था का चेहरा कहा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि इनकी आय मांग पर निर्भर करती है। कार्यं घंटे लंबे होते हैं, प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है और सुरक्षा सीमित होती है। मशीनों और वृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार भविष्य में अनेक पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित कर सकता है। यदि समय रहते कौशल उन्नयन नहीं किया गया, तो रोजगार संकट और गहरा सकता है। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को सशत्त बनाना होना चाहिए, विस्थापित करना नहीं।
महिला श्रमिकों की स्थिति पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। वृषि, घरेलू कार्यं, वस्त्र उदृाोग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा सहायता और छोटे उत्पादन क्षेत्रों में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। फिर भी उन्हें समान वेतन, सुरक्षित कार्यंस्थल, मातृत्व सुविधा और सामाजिक सम्मान जैसी मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अनेक महिलाएं घर और कार्यंस्थल दोनों का दायित्व निभाती हैं, फिर भी उनकी मेहनत को अक्सर औपचारिक मान्यता नहीं मिलती। किसी भी समाज की प्रगति का सही पैमाना यह है कि वह अपनी महिला श्रमशत्ति के साथ वैसा व्यवहार करता है।
ग्रामीण भारत में श्रम और वृषि का संबंध बहुत गहरा है। सीमांत किसान परिवार वर्ष के कईं महीनों में मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। जब खेती से पर्यांप्त आय नहीं होती, तब परिवार का एक हिस्सा शहरों की ओर पलायन करता है। इससे गांवों की सामाजिक संरचना बदलती है, परिवार बिखरते हैं और बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। इसलिए श्रम नीति केवल उदृाोग नीति नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास नीति भी है।
यदि गांव में रोजगार, कौशल और स्थानीय उदृाोग बढ़ेंगे, तो अनियंत्रित पलायन कम होगा।
भारत में औसत कार्यं घंटे कईं विकसित देशों की तुलना में अधिक बताए जाते हैं। अधिक समय काम करना हमेशा अधिक उत्पादकता का संकेत नहीं होता।
कईं बार यह कम मजदूरी, कमजोर श्रम संरक्षण और सीमित संसाधनों का परिणाम होता है। यदि श्रमिक को पर्यांप्त विश्राम, स्वास्थ्य देखभाल और पारिवारिक जीवन का समय न मिले, तो उसका प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ता है। थका हुआ श्रमिक उत्पादन तो कर सकता है, पर दीर्घकालीन विकास नहीं।
नीतिगत स्तर पर अब समय आ गया है कि श्रम सुधारों को केवल उदृाोग सुविधा के दृष्टिकोण से न देखा जाए, बल्कि श्रमिक कल्याण के संतुलन के साथ लागू किया जाए। असंगठित क्षेत्र के प्रत्येक श्रमिक का सरल पंजीकरण हो। न्यूनतम वेतन का कठोर पालन सुनिाित किया जाए। स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना सहायता और वृद्धावस्था सुरक्षा को सार्वभौमिक स्वरूप दिया जाए। महिला श्रमिकों के लिए सुरक्षित वातावरण और समान अवसर सुनिाित किए जाएं।
तकनीकी परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए बड़े पैमाने पर कौशल प्रशिक्षण अभियान चलाया जाए।
स्थानीय स्तर पर छोटे उदृाोग, हस्तशिल्प, खादृा प्रसंस्करण और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन किया जाए।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। हम श्रम का उपयोग तो करते हैं, पर श्रमिक का सम्मान हर बार नहीं करते। सफाईंकमा, घरेलू सहायक, निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर और सेवा प्रदाता हमारी दैनिक जीवन व्यवस्था का हिस्सा हैं, पर सामाजिक व्यवहार में उन्हें बराबरी का स्थान नहीं मिलता। जब तक श्रम को गरिमा नहीं मिलेगी, तब तक कानूनों का प्रभाव सीमित रहेगा। सयता का असली परिचय इस बात से मिलता है कि वह अपने सबसे मेहनती नागरिकों के साथ वैसा व्यवहार करती है।
उदृाोग जगत को भी यह समझना होगा कि श्रमिक केवल लागत नहीं, बल्कि उत्पादन का मूल आधार है। सुरक्षित, प्रशिक्षित और संतुष्ट श्रमिक ही स्थायी लाभ और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन दे सकता है। अल्पकालिक लाभ के लिए श्रमिक हितों की अनदेखी अंतत: आर्थिक ढांचे को कमजोर करती है। लाभ और मानवता का संतुलन ही स्वस्थ औदृाोगिक संस्वृति का आधार है।
राजनीति में भी श्रमिक केवल भाषण का विषय नहीं होना चाहिए।
चुनावी वादों से आगे बढ़कर श्रम नीति पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है। जिस देश की विशाल आबादी श्रम पर निर्भर हो, वहां यह विषय शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जितना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए।
अंतत: किसी राष्ट्र की ऊंचाईं उसके पुलों, इमारतों और आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापी जाती, बल्कि उन लोगों की स्थिति से मापी जाती है जिन्होंने उन्हें बनाया है। यदि श्रमिक असुरक्षित है, तो विकास अधूरा है। यदि श्रमिक सम्मानित है, तो भविष्य सुरक्षित है। भारत यदि वास्तव में समृद्ध, न्यायपूर्ण और शत्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे अपने श्रमिकों के हाथ मजबूत करने होंगे। क्योंकि पसीने की अनदेखी पर खड़ी समृद्धि कभी स्थायी नहीं होती, और श्रम का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)
भारत यदि वास्तव में समृद्ध, न्यायपूर्ण और शत्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है तो उसे अपने श्रमिकों के हाथ मजबूत करने होंगे।
क्योंकि पसीने की अनदेखी पर खड़ी समृद्धि कभी स्थायी नहीं होती और श्रम का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
हर वर्ष 1 मईं को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि उस वर्ग के सम्मान का दिवस है जिसकी मेहनत पर संसार की अर्थव्यवस्था, उदृाोग, परिवहन, वृषि और सेवा व्यवस्था टिकी हुईं है। आधुनिक समाज की जितनी भी उपलब्धियां दिखाईं देती हैं, उनके पीछे किसी न किसी श्रमिक का श्रम, समय, कौशल और त्याग जुड़ा होता है।
फिर भी यह कटु सत्य है कि विकास की सबसे ऊंची इमारत खड़ी करने वाला व्यत्ति अक्सर स्वयं असुरक्षित जीवन जीता है।
यही विरोधाभास आज के समय का सबसे गंभीर प्रश्न है।
वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन लगातार यह संकेत देता रहा है कि रोजगार के अवसरों और रोजगार की गुणवत्ता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। वर्ष 2024 में विश्व बेरो़जगारी दर लगभग 5 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही, कितु युवाओं में बेरो़जगारी 12 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गईं। इसका अर्थ है कि दुनिया में काम तो उपलब्ध है, पर स्थायी, सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार अब भी सीमित है।
आर्थिक मंदी, युद्ध, जलवायु संकट, तकनीकी परिवर्तन और उत्पादन ढांचे में बदलाव ने श्रम बाजार को अस्थिर बनाया है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाती है, तो उसका पहला प्रभाव श्रमिक वर्ग पर पड़ता है।
भारत की स्थिति इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि देश दुनिया की सबसे बड़ी श्रमशत्ति वाले देशों में शामिल है।
यहां करोड़ों युवा हर वर्ष रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। एक ओर भारत त़ेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, दूसरी ओर रोजगार की गुणवत्ता, आय असमानता और श्रमिक सुरक्षा जैसे प्रश्न लगातार सामने आते रहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज पिछले दशक में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है और करोड़ों लोगों तक विभिन्न योजनाओं का दायरा पहुंचा है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, परंतु वास्तविक चुनौती यह है कि काग़जी कवरेज और जमीन पर मिलने वाले लाभ में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
देश में निर्माण क्षेत्र, परिवहन, छोटे उदृाोग, वृषि, घरेलू कार्यं, खुदरा बाजार, वस्त्र उदृाोग, होटल, खानपान सेवा और डिजिटल मंचों पर आधारित कार्यो में बड़ी संख्या में लोग लगे हुए हैं। इनमें से अधिकांश असंगठित क्षेत्र में कार्यंरत हैं। इनके पास न नियमित अनुबंध होता है, न भविष्य निधि, न स्वास्थ्य बीमा, न पेंशन की स्पष्ट व्यवस्था। यह वर्ग रो़ज कमाता है और रो़ज खर्च करता है। बीमारी, दुर्घटना, काम रुकने या आर्थिक संकट की स्थिति में इनके सामने जीवन संकट खड़ा हो जाता है।
जिस अर्थव्यवस्था की रीढ़ इतना बड़ा वर्ग हो, वहां उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
वुछ लोग तर्व देते हैं कि आज पहले से अधिक अवसर उपलब्ध हैं। डिजिटल मंचों ने युवाओं को नईं संभावनाएं दी हैं।
छोटे नगरों और कस्बों के युवा अब तकनीक के माध्यम से आय र्अजित कर रहे हैं। यह बात सही है कि काम के स्वरूप में परिवर्तन आया है। स्वरोजगार, सेवा आधारित कार्यं और मंच आधारित रोजगार बढ़े हैं। लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या इन अवसरों के साथ सामाजिक सुरक्षा, निाित आय और श्रमिक अधिकार भी जुड़े हैं। यदि उत्तर नहीं है, तो यह अवसर अधूरा है।
आज बड़ी संख्या में युवा वितरण सेवा, परिवहन सेवा, स्वतंत्र कार्यं और अस्थायी अनुबंध आधारित कार्यो में लगे हैं। उन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था का चेहरा कहा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि इनकी आय मांग पर निर्भर करती है। कार्यं घंटे लंबे होते हैं, प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है और सुरक्षा सीमित होती है। मशीनों और वृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार भविष्य में अनेक पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित कर सकता है। यदि समय रहते कौशल उन्नयन नहीं किया गया, तो रोजगार संकट और गहरा सकता है। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को सशत्त बनाना होना चाहिए, विस्थापित करना नहीं।
महिला श्रमिकों की स्थिति पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। वृषि, घरेलू कार्यं, वस्त्र उदृाोग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा सहायता और छोटे उत्पादन क्षेत्रों में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। फिर भी उन्हें समान वेतन, सुरक्षित कार्यंस्थल, मातृत्व सुविधा और सामाजिक सम्मान जैसी मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अनेक महिलाएं घर और कार्यंस्थल दोनों का दायित्व निभाती हैं, फिर भी उनकी मेहनत को अक्सर औपचारिक मान्यता नहीं मिलती। किसी भी समाज की प्रगति का सही पैमाना यह है कि वह अपनी महिला श्रमशत्ति के साथ वैसा व्यवहार करता है।
ग्रामीण भारत में श्रम और वृषि का संबंध बहुत गहरा है। सीमांत किसान परिवार वर्ष के कईं महीनों में मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। जब खेती से पर्यांप्त आय नहीं होती, तब परिवार का एक हिस्सा शहरों की ओर पलायन करता है। इससे गांवों की सामाजिक संरचना बदलती है, परिवार बिखरते हैं और बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। इसलिए श्रम नीति केवल उदृाोग नीति नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास नीति भी है।
यदि गांव में रोजगार, कौशल और स्थानीय उदृाोग बढ़ेंगे, तो अनियंत्रित पलायन कम होगा।
भारत में औसत कार्यं घंटे कईं विकसित देशों की तुलना में अधिक बताए जाते हैं। अधिक समय काम करना हमेशा अधिक उत्पादकता का संकेत नहीं होता।
कईं बार यह कम मजदूरी, कमजोर श्रम संरक्षण और सीमित संसाधनों का परिणाम होता है। यदि श्रमिक को पर्यांप्त विश्राम, स्वास्थ्य देखभाल और पारिवारिक जीवन का समय न मिले, तो उसका प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ता है। थका हुआ श्रमिक उत्पादन तो कर सकता है, पर दीर्घकालीन विकास नहीं।
नीतिगत स्तर पर अब समय आ गया है कि श्रम सुधारों को केवल उदृाोग सुविधा के दृष्टिकोण से न देखा जाए, बल्कि श्रमिक कल्याण के संतुलन के साथ लागू किया जाए। असंगठित क्षेत्र के प्रत्येक श्रमिक का सरल पंजीकरण हो। न्यूनतम वेतन का कठोर पालन सुनिाित किया जाए। स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना सहायता और वृद्धावस्था सुरक्षा को सार्वभौमिक स्वरूप दिया जाए। महिला श्रमिकों के लिए सुरक्षित वातावरण और समान अवसर सुनिाित किए जाएं।
तकनीकी परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए बड़े पैमाने पर कौशल प्रशिक्षण अभियान चलाया जाए।
स्थानीय स्तर पर छोटे उदृाोग, हस्तशिल्प, खादृा प्रसंस्करण और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन किया जाए।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। हम श्रम का उपयोग तो करते हैं, पर श्रमिक का सम्मान हर बार नहीं करते। सफाईंकमा, घरेलू सहायक, निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर और सेवा प्रदाता हमारी दैनिक जीवन व्यवस्था का हिस्सा हैं, पर सामाजिक व्यवहार में उन्हें बराबरी का स्थान नहीं मिलता। जब तक श्रम को गरिमा नहीं मिलेगी, तब तक कानूनों का प्रभाव सीमित रहेगा। सयता का असली परिचय इस बात से मिलता है कि वह अपने सबसे मेहनती नागरिकों के साथ वैसा व्यवहार करती है।
उदृाोग जगत को भी यह समझना होगा कि श्रमिक केवल लागत नहीं, बल्कि उत्पादन का मूल आधार है। सुरक्षित, प्रशिक्षित और संतुष्ट श्रमिक ही स्थायी लाभ और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन दे सकता है। अल्पकालिक लाभ के लिए श्रमिक हितों की अनदेखी अंतत: आर्थिक ढांचे को कमजोर करती है। लाभ और मानवता का संतुलन ही स्वस्थ औदृाोगिक संस्वृति का आधार है।
राजनीति में भी श्रमिक केवल भाषण का विषय नहीं होना चाहिए।
चुनावी वादों से आगे बढ़कर श्रम नीति पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है। जिस देश की विशाल आबादी श्रम पर निर्भर हो, वहां यह विषय शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जितना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए।
अंतत: किसी राष्ट्र की ऊंचाईं उसके पुलों, इमारतों और आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापी जाती, बल्कि उन लोगों की स्थिति से मापी जाती है जिन्होंने उन्हें बनाया है। यदि श्रमिक असुरक्षित है, तो विकास अधूरा है। यदि श्रमिक सम्मानित है, तो भविष्य सुरक्षित है। भारत यदि वास्तव में समृद्ध, न्यायपूर्ण और शत्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे अपने श्रमिकों के हाथ मजबूत करने होंगे। क्योंकि पसीने की अनदेखी पर खड़ी समृद्धि कभी स्थायी नहीं होती, और श्रम का सम्मान ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)