संविधान और सियासत के जीते-जागते ज्ञानकोश थे संसदविज्ञ मधु लिमये
प्रकाशित: 01-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
मधु लिमये का जन्म 1 मईं 1922 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था। भारत की राजनीति में मधु लिमये स्वच्छ, सादगी, ईंमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रबल पक्षधर के रूप में सर्व विख्यात रहे है। उन्होंने दो बार अपने विचारों और सिद्धांतों से समझौता किया जिसका पाताप ताजिदगी उन्हें खलता रहा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से अपने वैचारिक मतभेद वे कभी छिपाते नहीं थे। उनके नेता डॉ राम मनोहर लोहिया कांग्रेस को सत्ताच्युत करने के लिए शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार थे। लोहिया के प्रयासों से ही 1967 में अनेक प्रदेशों में गैर कांग्रेस संविद सरकार बनी। उस समय मधुजी ने संघ समर्थित जनसंघ से गठजोड़ का विरोध लोहियाजी के सामने किया था। लोहियाजी ने यह कहकर उनका मुंह बंद कर दिया था कि तुम्हारा नेता कौन है। मधुजी की लोहिया के प्रति अगाध श्रद्धा थी और इस कारण वे आगे वुछ भी नहीं बोल पाए। दूसरा मौका आपातकाल के बाद जनता पाटा के गठन का था। मधुजी चाहते थे कि जनसंघ विलय के बाद संघ से अपने किसी तरह का सम्बन्ध नहीं रखे। यह संभव नहीं था। मगर लोकनायक जय प्रकाश नारायण बिना शर्त एका चाहते थे, यहाँ भी उन्हें झुकना पड़ा। दोहरी सदस्यता का मामला भी पाटा में उन्होंने जोर शोर से उठाया। कईं लोग जनता पाटा को तोड़ने का आरोप मधु लिमये पर लगाते है जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया।
डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, आचार्यं नरेंद्र देव, एस एम् जोशी जैसे समाजवादी विचारकों के सान्निध्य में मधु लिमये भारत में समाजवादी आंदोलन के शख्सियत के रूप में अपनी अलग पहचान बनाईं। मधु लिमये समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया के अनुयायी और राज नारायण कर्पूरी ठावुर एवं जॉर्ज फर्नाडिस जैसे समाजवादियों के प्रखर सहयोगी थे। एक मईं मधु लिमये की जयंती है।
मधुजी कोईं साधारण इंसान नहीं थे। वे जाने माने संसदविद थे। उनके संसद में प्रवेश करते ही कईं कॉंग्रेसजनों की भृवुटि टेडी पड़ जाती और वे यह सोच में पड़ जाते कि आज वे क्या सवाल उठाएंगे। मधु लिमये किसी भी प्रकार के पाखंड से कोसों दूर थे। वे संसद में पैदल अथवा रिक्शे से आते थे। उनकी जेब खाली रहती थी। उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी अथवा सांसद होने की पेंशन नहीं ली। लिमये ने जनता सरकार में मंत्री पद नहीं लिया। उन्होंने जॉर्ज, दंडवते और पुरुसोत्तम कौशिक को समाजवादी धडे से मंत्री पद नवाजा। यह लिमये थे जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गाँधी द्वारा लोकसभा का कार्यंकाल बढ़ाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था। वे सबसे पहले 1964 में मुंगेर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। चार बार सांसद रहने के बाद उन्होंने 1982 में राजनीति से सन्यास ले लिया था। समाजवादी नेता और मधु जी के सहयोगी रहे प्रो राजवुमार जैन के मुताबिक, आजकल भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, आचार्यं नरेंद्र देव, एस एम् जोशी जैसे समाजवादी विचारकों के सान्निध्य में मधु लिमये भारत में समाजवादी आंदोलन के शख्सियत के रूप में अपनी अलग पहचान बनाईं। मधु लिमये समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया के अनुयायी और राज नारायण कर्पूरी ठावुर एवं जॉर्ज फर्नाडिस जैसे समाजवादियों के प्रखर सहयोगी थे। एक मईं मधु लिमये की जयंती है।
मधुजी कोईं साधारण इंसान नहीं थे। वे जाने माने संसदविद थे। उनके संसद में प्रवेश करते ही कईं कॉंग्रेसजनों की भृवुटि टेडी पड़ जाती और वे यह सोच में पड़ जाते कि आज वे क्या सवाल उठाएंगे। मधु लिमये किसी भी प्रकार के पाखंड से कोसों दूर थे। वे संसद में पैदल अथवा रिक्शे से आते थे। उनकी जेब खाली रहती थी। उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी अथवा सांसद होने की पेंशन नहीं ली। लिमये ने जनता सरकार में मंत्री पद नहीं लिया। उन्होंने जॉर्ज, दंडवते और पुरुसोत्तम कौशिक को समाजवादी धडे से मंत्री पद नवाजा। यह लिमये थे जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गाँधी द्वारा लोकसभा का कार्यंकाल बढ़ाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था। वे सबसे पहले 1964 में मुंगेर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। चार बार सांसद रहने के बाद उन्होंने 1982 में राजनीति से सन्यास ले लिया था। समाजवादी नेता और मधु जी के सहयोगी रहे प्रो राजवुमार जैन के मुताबिक, आजकल भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है।