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सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशित: 07-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय
बाल मुकुंद ओझा
हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित साहित्यकारों में शुमार अज्ञेय का आज जन्मदिन है। राष्ट्रभाषा हिंदी को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जन तक पहुँचाने वाले वाले लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय की 7 मार्च को जयंती है। उन्होंने कवि, कथाकार, लेखक और पत्रकार के रूप में देश और दुनिया में अपनी पहचान कायम की थी। इनका जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ। उनका बचपन लखनऊ में बीता और घर पर ही संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी की शिक्षा हुई। पिता ने हिंदी सिखाई। पिता पुरातत्व विभाग में थे। उन्होंने साहित्य को अपने संपादन में तारसप्तक, दूसरा सप्तक, जैसे ग्रंथ दिए, जिसने आने वाले वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण कवियों का परिचय साहित्य की दुनिया से करवाया। उन्होंने अपनी रचनाओं में भाषा सम्बन्धी विभिन्न प्रयोग किए हैं। प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य संसार में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं अज्ञेय । संस्कृतनिष्ठ भाषा से लेकर बोलचाल की भाषा में भी इन्होंने साहित्यिक रचनाएँ की हैं। उन्होंने नाटक, निबन्ध, यात्रावृत, संस्मरण सभी विधाओं में गद्य-रचना करके हिन्दी-साहित्य को समृध्द किया है। तुलनात्मक साहित्य के सृजन एवं भाषा अनुशीलन की इनमें अद्भुत एवं अलौकिक सामर्थ्य थी। हिन्दी के आधुनिक साहित्य की नई धारणा के लेखकों, कवियों को एक नया सशक्त मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता का नया इतिहास रचा। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को अज्ञेय नाम मुंशी प्रेमचंद से मिला। इसका पा स्वयं अज्ञेय जी ने अपने एक साक्षात्कार में किया था। इनका बचपन अपने विद्वान् पिता के साथ कश्मीर, बिहार और मद्रास (चेन्नई) में व्यतीत हुआ था। इन्होंने मद्रास और लाहौर में शिक्षा प्राप्त की। बी. एस. सी. करने के बाद एम्. ए. (अंग्रेजी) की पढ़ाई के समय ाढांतिकारी आन्दोलन में सहयोगी होने के कारण ये फरार हो गये और फिर 1930 ई. में गिरफ्तार कर लिए गये। अज्ञेय जी चार वर्ष जेल में और दो वर्ष नजरबंद रहे। उन्होंने सैनिक, विशाल भारत, प्रतीक और अंग्रेजी त्रैमासिक वाक् का सम्पादन किया। सप्ताहिक दिनमान के संपादक के रूप में उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में नयी मिसाल कायम की। दिनमान ने जल्द ही हिंदी पत्रकारिता में कीर्तिमान स्थापित किया। वे कुछ वर्ष आकाशवाणी में और सन् 1943 ई. से सन् 1946 ई. तक सेना में भी रहे। घुमक्कड़ प्रकृति के वशीभूत होकर इन्होंने अनेक बार विदेश यात्राएं भी की। अज्ञेयजी ने सन् 1943 ई. में ‘तारसप्तक नामक कविता-संग्रह का प्रकाशन करके हिंदी-कविता के क्षेत्र में एक नवीन आन्दोलन की घोषणा की इसी आन्दोलन को भविष्य में प्रयोगवाद का नाम दिया गया। अज्ञेय जी की रचनाएँ एवं कृतियाँ इस प्रकार हैं - काव्य रचनाएँ अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, बावरा अहेरी , कितनी नावों में कितनी बार, हरी घास पर क्षणभर, इत्यलम, इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, चिंता, पूर्वा, सुनहले शैवाल, भग्नदूत आदि। प्रिजन डेज एंड अदर पोयम्स नाम से अज्ञेय की अंग्रेजी भाषा में रचित एक अन्य काव्य-कृति भी प्रकाशित हुई हैं। कहानी-संग्रह विपथगा, परम्परा, कोठरी की बात,शरणार्थी एवं जयदोल । भ्रमण वृत्तांत अरे, यायावर रहेगा याद ।
इनके अतिरिक्त अनेक ग्रंथो का सम्पादन भी किया। इनके द्वारा सम्पादित दिए गये ग्रन्थ है आधुनिक हिंदी साहित्य (निबन्ध संग्रह), तारसप्तक (कविता संग्रह), एवं नए एकांकी आदि।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)