जेडीयू की चुनौतियां और अवसर
प्रकाशित: 07-03-2026 | लेखक: कृष्ण देव पाठक
राज्यसभा जाने के फैसले के बाद जनता दल (यूनाइटेड) संसदीय दल की बैठक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना स्थित अपने सरकारी आवास पर बुलाई और पार्टी के सांसदों, विधायकों, एमएलसी और वरिष्ठ नेताओं से गहन विचार-विमर्श के बाद एक बात सामने जरूर आई कि जेडीयू नेतृत्व बिहार की राजनीति भारतीय जनता पार्टी के साथ ही करना चाहती है किन्तु इसके लिए वह पार्टी में किसी भी तरह का बिखराव नहीं होने देना चाहती। नीतीश सहित पार्टी के सभी बड़े नेता यह मानते हैं कि उनकी पार्टी में एकजुटता के लिए या तो नीतीश अगुवाई कायम रहे या उनके पुत्र निशांत राजनीति में प्रवेश करें और सािढय रूप से संगठन में फैसले लें। यही कारण है कि पावार को बैठक में यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया कि अब निशांत जेडीयू में शामिल किए जाएंगे और पूरे बिहार का दौरा करेंगे।
बैठक के पहले ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह यानि लल्लन सिंह ने बड़ी बात कह दी। उन्होंने कहा कि नीतीश ही अगले मुख्यमंत्री का चयन करेंगे चाहे वह जेडीयू का हो अथवा भाजपा का। लल्लन सिंह की बात भी सही है। भाजपा का नेतृत्व मुख्यमंत्री का चयन नीतीश की इच्छा के विरुद्ध करना भी नहीं चाहता। नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सबसे ज्यादा मुश्किल उनकी पार्टी में ही आनी थी। कारण कि उनकी पार्टी में कुर्मी, ब्राह्मण और भूमिहार प्रभावशाली हैं किन्तु ये तीनों नीतीश की बात तो मानते हैं किन्तु यदि किसी एक जाति का मुख्यमंत्री बना दिया गया तो शेष दो जातियां नाराज होकर पार्टी के हितों के खिलाफ सािढय हो जाएंगी। इसलिए जरूरी है कि नीतीश न सिर्फ अपने बेटे निशांत को राजनीति में सािढय करें बल्कि मुख्यमंत्री भाजपा का ही बनवाएं जो उनके साथ समन्वय बनाकर चल सके।
सच तो यही है कि भाजपा का संख्या बल चाहे जितना बड़ा होता, मुख्यमंत्री तो नीतीश ही बनते किन्तु जिस तरह उनका स्वास्थ्य खराब हुआ है और उन्होंने अण्ड-बण्ड बयानबाजी करना शुरू किया है, उससे राज्य सरकार की बदनामी हो रही थी। एक आम धारणा यह बन चुकी थी कि बिहार में सरकार अफसरशाही चला रही है। इसका नुकसान दोनों ही पार्टियों को होता। इसलिए नीतीश ने बिना किसी हिचक के राज्यसभा जाना स्वीकार कर लिया। यदि नीतीश का स्वास्थ्य अच्छा होता तो वे एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के सबसे उपयुक्त उम्मीदवार होते।
लब्बोलुआब यह है कि इस वक्त जेडीयू के लिए सबसे बड़ी चुनौती सही दिशा भी है। यदि पार्टी नेतृत्व ने समझदारी से कार्यकर्ताओं को वास्तविकता का एहसास नहीं कराया तो जेडीयू अवसाद की शिकार हो सकती है और स्थानीय स्तर पर भाजपा के साथ टकराव भी हो सकता है। इन सभी सच्चाइयों को नीतीश समझ रहे हैं इसलिए उन्होंने महसूस किया कि अब पार्टी को एकजुट रखना और पुत्र निशांत को राजनीति में सािढय करना ही उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। नीतीश और उनकी पार्टी के शीर्ष नेता यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल के 25 पर सिमटने के बाद निष्ठा में बदलाव का विकल्प बिल्कुल समाप्त हो चुका है, इसलिए राजनीति में सत्ता सुख चाहिए तो भाजपा के साथ बने रहना जरूरी है। नीतीश इस सच्चाई को भी अच्छी तरह जानते हैं कि आज भाजपा अटल-आडवाणी की नहीं है जो नीतीश के लिए अपनी पार्टी के हितों के साथ समझौता करने को गलत नहीं मानते थे। किन्तु आज पार्टी मोदी-अमित शाह की है जो खुद को पार्टी का ट्रस्टी मानते हैं और सौदेबाजी को ये दोनों नेता अपना कर्तव्य समझते हैं। पार्टी के हितों के प्रति समर्पित नेतृत्व एक सीमा से ज्यादा अपने सहयोगी पार्टी को छूट देने की स्थिति में नहीं होता। कुल मिलाकर नीतीश भले ही स्वास्थ्य की दृष्टि से फिट नहीं हैं किन्तु वह इतने भी बीमार नहीं हैं जिनका मस्तिष्क भाजपा, जेडीयू संबंधों की हकीकत न समझ सके। वह इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि यह पार्टी के लिए अवसर एवं चुनौती दोनों ही हैं।
बैठक के पहले ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह यानि लल्लन सिंह ने बड़ी बात कह दी। उन्होंने कहा कि नीतीश ही अगले मुख्यमंत्री का चयन करेंगे चाहे वह जेडीयू का हो अथवा भाजपा का। लल्लन सिंह की बात भी सही है। भाजपा का नेतृत्व मुख्यमंत्री का चयन नीतीश की इच्छा के विरुद्ध करना भी नहीं चाहता। नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सबसे ज्यादा मुश्किल उनकी पार्टी में ही आनी थी। कारण कि उनकी पार्टी में कुर्मी, ब्राह्मण और भूमिहार प्रभावशाली हैं किन्तु ये तीनों नीतीश की बात तो मानते हैं किन्तु यदि किसी एक जाति का मुख्यमंत्री बना दिया गया तो शेष दो जातियां नाराज होकर पार्टी के हितों के खिलाफ सािढय हो जाएंगी। इसलिए जरूरी है कि नीतीश न सिर्फ अपने बेटे निशांत को राजनीति में सािढय करें बल्कि मुख्यमंत्री भाजपा का ही बनवाएं जो उनके साथ समन्वय बनाकर चल सके।
सच तो यही है कि भाजपा का संख्या बल चाहे जितना बड़ा होता, मुख्यमंत्री तो नीतीश ही बनते किन्तु जिस तरह उनका स्वास्थ्य खराब हुआ है और उन्होंने अण्ड-बण्ड बयानबाजी करना शुरू किया है, उससे राज्य सरकार की बदनामी हो रही थी। एक आम धारणा यह बन चुकी थी कि बिहार में सरकार अफसरशाही चला रही है। इसका नुकसान दोनों ही पार्टियों को होता। इसलिए नीतीश ने बिना किसी हिचक के राज्यसभा जाना स्वीकार कर लिया। यदि नीतीश का स्वास्थ्य अच्छा होता तो वे एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के सबसे उपयुक्त उम्मीदवार होते।
लब्बोलुआब यह है कि इस वक्त जेडीयू के लिए सबसे बड़ी चुनौती सही दिशा भी है। यदि पार्टी नेतृत्व ने समझदारी से कार्यकर्ताओं को वास्तविकता का एहसास नहीं कराया तो जेडीयू अवसाद की शिकार हो सकती है और स्थानीय स्तर पर भाजपा के साथ टकराव भी हो सकता है। इन सभी सच्चाइयों को नीतीश समझ रहे हैं इसलिए उन्होंने महसूस किया कि अब पार्टी को एकजुट रखना और पुत्र निशांत को राजनीति में सािढय करना ही उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। नीतीश और उनकी पार्टी के शीर्ष नेता यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल के 25 पर सिमटने के बाद निष्ठा में बदलाव का विकल्प बिल्कुल समाप्त हो चुका है, इसलिए राजनीति में सत्ता सुख चाहिए तो भाजपा के साथ बने रहना जरूरी है। नीतीश इस सच्चाई को भी अच्छी तरह जानते हैं कि आज भाजपा अटल-आडवाणी की नहीं है जो नीतीश के लिए अपनी पार्टी के हितों के साथ समझौता करने को गलत नहीं मानते थे। किन्तु आज पार्टी मोदी-अमित शाह की है जो खुद को पार्टी का ट्रस्टी मानते हैं और सौदेबाजी को ये दोनों नेता अपना कर्तव्य समझते हैं। पार्टी के हितों के प्रति समर्पित नेतृत्व एक सीमा से ज्यादा अपने सहयोगी पार्टी को छूट देने की स्थिति में नहीं होता। कुल मिलाकर नीतीश भले ही स्वास्थ्य की दृष्टि से फिट नहीं हैं किन्तु वह इतने भी बीमार नहीं हैं जिनका मस्तिष्क भाजपा, जेडीयू संबंधों की हकीकत न समझ सके। वह इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि यह पार्टी के लिए अवसर एवं चुनौती दोनों ही हैं।