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सीबीएसई का स्कूलों में संस्कृत पढ़ाना एक सकारात्मक पहल

प्रकाशित: 24-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में संस्कृत पढ़ाने को लेकर भारत सरकार का एक आदेश आया है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर आधारित है। इस आदेश के अनुसार सीबीएसई बोर्ड ने कक्षा 9 और 10 के लिए तीन भाषा नीति अनिवार्य कर दी है जिसके तहत कम से कम दो भारतीय भाषाएं हिंदी और संस्कृत पढ़ाना अनिवार्य है। संस्कृत भाषा का पाठ्यक्रम व्याकरण और साहित्य दो भाषा में विभाजित होगा, युवा छात्रों को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त संस्कृत पढ़ाने की पहल एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए, यहां पर यह बताना आवश्यक है कि संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर इस बात के पक्षधर थे कि संस्कृत को एक संपर्क भाषा के रूप में विकसित किया जाए, जिससे देश में भाषाई विवाद समाप्त हो जाए पर नेहरू सरकार द्वारा डॉक्टर अंबेडकर का सुझाव नहीं माना गया परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने डॉ आंबेडकर के उस सुझाव को ध्यान में रखते हुए एक सकारात्मक कदम उठाकर सराहनीय कार्य किया है।
इस विषय में विस्तार में जाने से पहले यह जानना आवश्यक है की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत छात्रों को संस्कृत पढ़ाने का उद्देश्य क्या है- 1-छात्रों में संस्कृत सुनने बोलने और लिखने के कौशल को विकसित करना। 2-भारत की प्राचीनसंवृद्ध संस्कृति नैतिक नैतिक मूल्यों तथा ज्ञान विज्ञान से छात्रों को अवगत कराना। 3- संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है, इससे व्याकरण और शब्दावली सीखने से हिंदी मराठी बंगाली और अन्य भाषाओं को समझने में मदद मिलेगी। 4-संस्कृत का व्याकरण अत्यंत वैज्ञानिक और नियम बद्ध है, जो छात्रों की एकाग्रता स्मृति और तार्किक क्षमता को बढ़ाता है। संपूर्ण भारत में संस्कृत भाषा देववाणी अमृत वाड़ी इत्यादि अनेक नाम से जानी जाती है, संपूर्ण विश्व की भाषा में सबसे प्राचीन भाषा के रूप में संस्कृत परिभाषित है इस देश की अधिकांश भाषाओं की मात्र भाषा संस्कृत ही है। संस्कृत भाषा का शब्द निर्माण एवं ध्वनि विज्ञान इतना समृद्ध और अद्भुत है कि आज के जो नवीनतम विश्व साहित्य की संरचना हो रही है उसके लिए परिभाषित तथा उत्कृष्ट प्रकार के शब्दों को संस्कृत भाषा से लिया गया है, इसी कारण आज के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विकास में संस्कृत का योग बढ़ जाता है जब आज की युवा पीढ़ी संस्कृत भाषा को समझने और बोलने में सक्षम हो जाएगी तो देश में उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम का जो भाषा विवाद है उसको समाप्त करने में बड़ी मदद मिलेगी क्योंकि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो भारत के सभी क्षेत्र व राज्यों में स्वीकार्य है जिस दिन देश की पूरी जनसंख्या संस्कृत भाषा को समझने लगेगी और बोलने लगेगी तो हमें अन्य क्षेत्र पर हिंदी भाषा को थोपने के विवाद से मुक्ति मिल जाएगी।
संस्कृत सिर्फ वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति के विकाश का माध्यम रही हैं और देश लगभग 1000 वर्ष तक इस्लाम और अंग्रेजी को मानने वाले लोगों की का गुलाम रहा है फिर भी संस्कृत भारत के समाज से विलुप्त नहीं हुई इसके विषय में भारत के पूर्व मानव संसाधन मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी का एक लेख बहुत समीचीन है, डॉ जोशी कहते है "डॉ आंबेडकर बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी थे विद्वान अर्थ शास्त्राr, समाज सुधारक राजनीति विद और संविधान के ज्ञाता थे, वे संस्कृत केबारे में क्या सोचते थे इसके विषय में चर्चा करना चाहूंगा जब मैं श्री अटल बिहारी वाजपेई के सरकार में मानव संसाधन मंत्री था तब विभिन्न स्तरों पर संस्कृत एवं वैदिक गणित आदि के मुद्दे उठाए जाते थे इस संबंध में डॉक्टर एल एम सिंघवी ने मुझे 1956- 57 में गठित संस्कृत आयोग की रिपोर्ट दिखाइ, उसे रिपोर्ट की मुख्य बातें इस प्रकार थी हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए पेश किए जाने के वाले बिल को संविधान सभा में आसानी से मंजूरी नहीं मिली इस मुद्दे पर चर्चा करने वाले अधिकांश लोगों की सोच तंग थी हालांकि कुछ लोगों ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का सुझाव दिया था और डॉ अंबेडकर ने भी उसका समर्थन किया था रिपोर्ट आगे कहती है कि नजीरूद्दीन अहमद ने संस्कृत को राजभाषा बनाने की प्रस्ताव सदन के पटल पर रखा उन्होंने कहा कि एक देश जहां ढेर सारी भाषाएं बोली जाती हैं और एक भाषा को पूरे देश की भाषा बनानी हो तो यह आवश्यक नहीं है कि वह निष्पक्ष हो,किसी क्षेत्र की भाषा नहो और सभी के लिए एक जैसी हो तभी उसे स्वीकारने से किसी क्षेत्र को लाभ न होगा और दूसराक्षेत्र स्वयं को पंगु न समझेगा और संस्कृत में ऐसी क्षमता है और लक्ष्मीकांत मैत्री ने भी संस्कृत को हिंदी के स्थान पर आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संशोधन प्रस्ताव पेश किया उन्होंने कहा कि संस्कृत को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया तो भाषा के नाम पर जो मनोवैज्ञानिक जटिलताएं पैदा की गई है वह मिट जाएगी। इस बारे में नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशनल रिसर्च और ट्रेनिंग द्वारा वर्ष 2001 में प्रकाशित संस्कृत पत्रिका में एक समाचार पत्र का उल्लेख करते हुए अंबेडकर ऑन ऑफिशल लैंग्वेज ऑ़फ इंडिया शीर्षक में रिपोर्ट में कहा गया भारत के कानून मंत्री डॉ आंबेडकर उन लोगों में शामिल थे जो संस्कृति को भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने कीबात की थी। इस पर सवाल उठाने वाले पीटीआई के संवाददाता से डॉक्टर अंबेडकर ने पूछा कि संस्कृत में गलत क्या है संस्कृत भाषा को भारत के अधिकारी भाषा का दर्जा देने के संबंध में संशोधित बिल पर संविधान सभा तब विचार करेगी जब सदन में भारत की आधिकारिक भाषा का प्रश्न आएगा संशोधन बिल कहता है कि भारत की आधिकारिक भाषा संस्कृत होनी चाहिए।
लक्ष्मीकांत मैत्रे द्वारा देश संशोधन बिल दुर्भाग्य से तीखी के बाद गिर गया और इस प्रकार भारत को भाषाई रूप में पिरोने का बाबा साहब का सपना अधूरा रह गया। डॉ. मुरली मनोहर जोशी के विचार में बाबा साहब संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर काफी गंभीर थे क्योंकि वह जान गए थे यदि एक बार इसकी स्वीकृत मिल गई तो संविधान सभा में आधिकारिक भाषा पर चर्चा के दौरान जो कड़वी बात होगी वह खत्म हो जाएगी और बाबा साहबदेश को भाषा ही लड़ाई से मुक्त कर देना चाहते थे, साथही वे इन प्राचीन भाषा में मौजूद ज्ञान के भंडार से आम भारतीय को जोड़े रखना चाहते थे डॉ अंबेडकर का संस्कृत से लगाव सिर्फ दिखावा नहीं था आर्य -गैर आर्यों, उच्च और निम्न जातियों के संबंध में यूरोप के सिद्धांतों की सच्चाई जानने की उत्कंठा ने उनमें संस्कृत में रुचि पैदा की थी डॉक्टर जैसी जोशी के खुलासे से पूर्व 11 सितंबर 1949 को नेशनल हेराल्ड में एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था संस्कृत के साथ अंबेडकर इस समाचार के अनुसार भारत के कानून मंत्री डॉ आंबेडकर उन लोगों में शामिल थे जो संस्कृति को भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा बनाने की पैरवी कर रहे थे बाबा साहब का मानना था कि संस्कृत पूरे देश को भाषाई एकता में एक सूत्र में बांधने वाली इकलौती भाषा हो सकती है उन्होंने इसे भारत के आधिकारिक भाषा बनाने का सुझाव दिया था संविधान सभा में भीमराव अंबेडकर ने राष्ट्रीय भाषा के रूप में संस्कृत का समर्थन किया था हालांकि उनका मानना था कि देश की आजादी के बाद अंग्रेजी को कम से कम 15 वर्ष तक देश के आधिकारिक भाषा बनाए रखा जा सकता है, जब तक संस्कृत पूरे देश से सक्रिय नहीं हो जाती अंबेडकर ने आजादी के बाद गठित राज्य भाषा व्यवस्था अधिनियम को संस्कृत को भारतीय संघ की राजभाषा बनाने का सुझाव दिया था वह इस बात से आशंकित थे कि आजाद हिंदुस्तान कहीं भाषा ही झगड़े की भेट जाए, देश में इस भाषा को लेकर कभी कोई विवाद ना रहे इसलिए जरूरी है की राजभाषा के रूप में ऐसी भाषा का चुनाव हो जिसका सभी भाषा भाषी आदर करते हो बाबा साहब के जानते थे कि यह प्रबल संभावना सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत में ही हो सकती है , उनको भरोसा था कि संस्कृत के नाम पर देश में कहीं भी कोई विवाद नहीं होगा इसलिए सभी भारतीय भाषाओं में से किसी एक को राजभाषा बनाए जाने पर जब बहस पूरी हो गई तो डॉ अंबेडकर ने संस्कृत को राजभाषा के रूप में रखने का प्रस्ताव रखा था।
इस प्रस्ताव में उनके साथ भारत के विदेश उप मंत्री बीवी केसकर, बंगाल से आने वाले सांसद नसरुद्दीन अहमद भी थे डॉ अंबेडकर ने कहा कि विधान परिषद राजभाषा पर विचार करते समय इस पर विचार करेगी। संस्कृत के पक्ष में राजभाषा संशोधन पर हस्ताक्षर करने वालों में डॉ. अंबेडकर के अलावा पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रे, टी टी कृष्णमाचारी समेत अन्य 15 लोग थे। डॉ. अंबेडकर ने इन सदस्यों के साथ प्रस्ताव पं. नेहरू को जो प्रस्ताव सौंपा, उसके तीन बिंदु थे। पहला-भारत संघ की भाषा संस्कृत बनाना। दूसरा-आजादी के 15 सालों तक अंग्रेजी आधिकारिक भाषा के तौर पर इस्तेमाल होगी। तीसरा बिंदु- यह था कि संसद अंग्रेजी को सिर्फ 15 वर्षों के लिए काम हेतु कानून बना देगी डॉक्टर अंबेडकर का या सुझाव उसे प्रस्ताव के संशोधन के लिए था जिसने राजभाषा परिषद अपने 3 अगस्त 1949 को सरकार को दे चअपने प्रस्ताव में कह दिया था कि अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी प्रतिष्ठित की जाए जिससे हमें अपनी आधिकारिक भाषा बनाने में 10 वर्ष से अधिक समय न लगे और भारतीय संघ की प्रांत अपनी अपनी भाषाओं का प्रयोग करने के लिय स्वतंत्रहोंगे पर शिक्षण पद्धति में दो भाषाओं का शिक्षण अवश्य होगा परिषद ने यह भी निश्चित किया कि आजादी वाक्य उपाधियां आदि तथा शोभा के संस्थानों में सत्संग में संस्कृत का प्रयोग करें जो आज भी हो रहा है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत स्कूलों में दो के बजाय तीन भाषाओं को पढ़ाने का फैसला जिसमें एक भाषा संस्कृत हो भारत की सभी भाषाओं की जाननी संस्कृत को प्रतिष्ठित करने का एक ओर प्रयाय है वहीं दूसरी ओर डॉ आंबेडकर के संस्कृत प्रेम को स्वीकार करने और उसे बढ़ावा देने का प्रयास है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)