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ऊंट व्यापारी कश्मीर पहुंचे, बकरीद की नई परंपरा पर लोगों का ध्यान

प्रकाशित: 24-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
सुरेश एस डुग्गर
जम्मू, 23 मई। कश्मीर में कभी लगभग अनजान रही एक प्रथा अब धीरे-धीरे ईद-उल-अजहा की तैयारियों में अपनी जगह बना रही है। ऊंट व्यापारी घाटी में पहुंच रहे हैं और लोगों को त्योहार से पहले ऊंट की कुर्बानी देने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
कश्मीर के कई हिस्सों में पशु बाजारों में अब ऊंट भी दिखने लगे हैं, जिससे खरीदारों में उत्सुकता बढ़ रही है और यह पारंपरिक ईद व्यापार को एक नया आयाम दे रहा है, जिस पर अब तक भेड़, बकरियों और मवेशियों का ही दबदबा था। ऊंटों का व्यापार करने वाले व्यापारियों ने बताया कि हाल के वर्षों में इस प्रथा में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। खासकर उन समूहों में जो कुर्बानी के लिए एक साझा और अपेक्षाकृत किफायती विकल्प की तलाश में हैं। इस्लामी परंपरा के अनुसार, ईद-उल-अजहा के दौरान कुर्बानी के लिए सबसे अधिक मान्य जानवरों में ऊंट भी शामिल है। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, ऊंट की कुर्बानी में सात लोग तक हिस्सेदारी कर सकते हैं। इससे यह अलग- अलग कुर्बानी के जानवर खरीदने की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक किफायती और आसान हो जाता है। हालांकि यह प्रथा ऐतिहासिक रूप से रेगिस्तानी इलाकों में अधिक आम रही है, लेकिन कश्मीर में यह अपेक्षाकृत कम प्रचलित थी, जहां पारंपरिक रूप से भेड़ और बकरियां ही ईद की कुर्बानी का मुख्य हिस्सा रही हैं। व्यापारियों का कहना है कि अब यह चलन धीरे-धीरे बदल रहा है। ईद से पहले कश्मीर पहुंचे ऊंट पोताओं ने बताया कि ऊंट की कुर्बानी की इस्लामी वैधता और इसमें साझा हिस्सेदारी की प्रकृति के बारे में जागरूकता बढ़ने से जनता के कुछ वर्गों में इसके प्रति रुचि जागी है।
एक स्थानीय पशु बाजार में मौजूद एक व्यापारी के बकौल, लोग सवाल पूछ रहे हैं और उत्सुकता दिखा रहे हैं। कई लोग इसे कई परिवारों या दोस्तों के समूह के लिए एक व्यावहारिक और किफायती विकल्प के रूप में देख रहे हैं। बाजारों में ऊंटों की बढ़ती मौजूदगी ने उन्हें आकर्षण का केंद्र भी बना दिया है। लोग ऊंटों को देखने और उनकी जांच-परख करने के लिए उन्हें लाने वाले वाहनों और अस्थायी बाड़ों के आसपास जमा हो रहे हैं। कश्मीरियों का कहना था कि कश्मीर के बाजारों में ऊंट व्यापार का उभरना उपभोक्ताओं की बदलती पसंद और मुस्लिम दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रचलित प्रथाओं के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है।