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शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है, सार्थक संवाद से ही लोकतंत्र सशक्त होता है ः विजेन्द्र गुप्ता

प्रकाशित: 21-06-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वीर अर्जुन संवाददाता
नई दिल्ली। जब बहस गरिमा, तर्क और तथ्यों पर आधारित होती है तो लोकतंत्र सशक्त होता है; शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है यह विचार दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने आज 'वर्तमान समय में शास्त्रार्थ' विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। यह संगोष्ठी भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर) तथा भारत बोध केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित की गई है। अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारत की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा का पुनर्जीवन केवल एक दार्शनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि वर्तमान समय में सामाजिक और लोकतांत्रिक आवश्यकता भी है।
विद्वानों, शिक्षाविदों तथा उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों को संबोधित करते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है। उन्होंने उपनिषदों के संवादों तथा आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य हुए ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता ने सदैव तर्कपूर्ण संवाद, बौद्धिक चिंतन और सत्य की खोज को सर्वोच्च स्थान दिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में सत्य को कभी आरोपित नहीं किया गया, बल्कि उसे तर्क और विचार-विमर्श की कसौटी पर परखा गया। इसी परंपरा से वादे-वादे जायते तत्त्वबोध का सिद्धांत विकसित हुआ, जिसका अर्थ है कि संवाद और विचार-विमर्श के माध्यम से ही सत्य का बोध होता है। वर्तमान संवाद संस्कृति पर चिंता व्यक्त करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि यद्यपि आज का युग सूचना-समृद्ध है, किन्तु धैर्य, सुनने की क्षमता और सार्थक संवाद की प्रवृत्ति में कमी दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच प्रदान किया है, लेकिन समाज को भिन्न विचारों को सुनने और समझने की संस्कृति भी विकसित करनी होगी। उन्होंने बल देते हुए कहा कि रचनात्मक संवाद ही स्वस्थ लोकतंत्र और समरस समाज की आधारशिला है। श्री गुप्ता ने शास्त्रार्थ और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच समानता स्थापित करते हुए कहा कि विधानमंडलों में होने वाली बहसें प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा का आधुनिक स्वरूप हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल बहुमत के आधार पर सरकार गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक सार्थकता तब पूर्ण होती है जब विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को सदन में अभिव्यक्ति और विमर्श का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि सार्थक चर्चा और विचार-विमर्श से उत्पन्न बौद्धिक मंथन बेहतर शासन और विवेकपूर्ण निर्णयों का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री विजेन्द्र गुप्ता ने शास्त्रार्थ और सामान्य विवाद के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि शास्त्रार्थ का उद्देश्य सत्य की खोज है, न कि किसी प्रतियोगी को पराजित या अपमानित करना। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता की मूल भावना उदारता, निष्पक्षता और खुले विचारों पर आधारित रही है। इस संदर्भ में उन्होंने मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की पत्नी भारती द्वारा निभाई गई निर्णायक की निष्पक्ष भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने आगे कहा कि आत्मसंयम, त्याग, करुणा और संवाद जैसे मूल्य भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं और आज भी समकालीन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं।
संगोष्ठी के आयोजन के लिए भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद तथा भारत बोध केंद्र को बधाई देते हुए श्री गुप्ता ने विश्वास व्यक्त किया कि दो दिवसीय विचार-मंथन से आधुनिक संदर्भों में शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रभावी मार्ग सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों को सुदृढ़ करना तथा उसकी बौद्धिक विरासत से प्रेरणा लेना एक आत्मविश्वासी और मूल्यनिष्ठ समाज के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने पुन दोहराया कि प्रत्येक समस्या का समाधान रचनात्मक संवाद में निहित है और विद्वानों, युवाओं तथा नागरिकों से आह्वान किया कि वे ऐसी संवाद संस्कृति को बढ़ावा दें, जिसमें मतभेद मनभेद में परिवर्तित न हों तथा सत्य की खोज सम्मानजनक और सार्थक विमर्श के माध्यम से की जाए।