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बाल ठाकरे की विरासत को खत्म किया उद्धव ने

प्रकाशित: 21-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
बाल ठाकरे की विरासत को खत्म किया उद्धव ने
आदित्य नरेन्द्र
लगता है कि विचारधारा रहित या विचारधारा छोड़ चुकी राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे मुश्किल दौर आ चुका है। कुछ समय पहले हमने राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पाटी (आप) में बड़ी टूट को देखा था जिसमें आप के सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके कुछ समय बाद पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा। भाजपा की 207 सीटों के मुकाबले उसे सिर्फ 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इसके बाद वहां राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला। लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पाटी (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर एनडीए खेमे से जुड़ने की घोषणा कर दी है। विपक्ष अभी इन दो राजनीतिक धक्कों से उबर भी नहीं पाया था कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में टूट की खबरें आने लगी। मीडिया में आई रिपोर्टें में दावा किया गया कि शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों के एक समूह ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से अनौपचारिक मुलाकात कर कहा कि उनके गुट को 9 में से 6 सांसदों का समर्थन हासिल है। उल्लेखनीय है कि यह संख्या दल बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा है। हालात कितने गंभीर है इसका अंदाजा शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत की उस प्रेस कांफ्रेंस से लग जाता है जिसमें उन्होंने बागी सांसदों के खिलाफ बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया था। केंद्र सरकार द्वारा बागी सांसदों को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा देने के फैसले ने भी बता दिया कि उद्धव की पाटी में क्या चल रहा है। सांसदों से शुरू हुई यह बगावत आगे चलकर विधायकों और बीएमसी तक भी जा सकती है। आने वाले कुछ दिनों में पता चलेगा कि उद्धव ठाकरे अपने सांसदों पर कंट्रोल बनाए रखते हैं या नहीं। शिवसेना में पहले भी टूट हो चुकी है। वर्ष 2003 में उद्धव के शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद 2005 में नारायण राणे ने उन्हें पाटी का उत्तराधिकारी बनाए जाने का विरोध करते हुए शिवसेना छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद 2006 में उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर अपनी एक अलग पाटी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बना ली। उस समय बाल ठाकरे जीवित थे और शिवसेना हिंदुत्व की विचारधारा पर चल रही थी इसलिए वह झटका झेल गए। लेकिन बाद में शिवसेना अपनी राह से भटक गई। कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने के बाद उद्धव सेक्युलर हो गए। उन्होंने मातोश्री के बाहर हुनमान चालीसा का पाठ करने वाली अमरावती की सांसद नवनीत राणा को जेल की हवा खिलाने में कोताही नहीं की। यही वह दौर था जब उद्धव पर बिना किसी हिचकिचाहट के बाल ठाकरे की विरासत को खत्म करने के आरोप लग रहे थे। जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने बगावत की और उद्धव के हाथ से पाटी और सिंबल छीन लिए। आम आदमी पाटी और टीएमसी को तो विचारधारा रहित पाटी माना जाता है लेकिन बाल ठाकरे ने तो शिवसेना की स्थापना ही विचारधारा के साथ की थी। कांग्रेस से हाथ मिलाने की बात वह सपने में भी नहीं सोच सकते थे। ऐसे में इन पार्टियों में टूट तो देर-सवेर होनी ही थी। भाजपा से उनकी दुश्मनी ने भी आग में घी का काम किया है। उद्धव यह अंदाजा लगाने में चूक गए कि देशवासियों का मूड क्या है और लोग उनका कांग्रेस के साथ जाना पसंद भी करेंगे या नहीं। असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों ने बता दिया है कि उद्धव बहुत बड़ी राजनीतिक भूल कर बैठे हैं जिसके चलते उनकी हालत “माया मिली न राम'' जैसी हो गई है। उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए कि बाल ठाकरे की विरासत पर एकनाथ शिंदे अपना मजबूत दावा ठोंक चुके हैं।