आश्वासन
प्रकाशित: 22-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार को दार्जलिंग के लोगों को विश्वास दिलाया कि यदि उनकी पार्टी की सरकार पश्चिम बंगाल में बनी तो वह गोरखाओं की समस्या को हल करने के लिए इस पहाड़ी क्षेत्र का समाधान मात्र 6 महीने के अंदर ही कर देंगे।
दरअसल पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय क्षेत्र में ज्यादा नेपाली मूल के गोरखा रहते हैं और राज्य सरकारें उनके हितों के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी गोरखाओं की भावनाओं को महसूस किया था और उन्होंने पूरी कोशिश की थी कि दार्जलिंग को पश्चिम बंगाल सरकार स्वायत्त क्षेत्र घोषित करे। किन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने दो टूक कह दिया था कि उनकी सरकार ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे की पश्चिम बंगाल के विखण्डन का संदेश जाए। विवश होकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक स्वायत्त बोर्ड तो बना दिया किन्तु राज्य सरकारें चाहे वह वामपंथी रही हों या फिर ममता बनर्जी की तृणमूल दोनों ही गोरखा समस्या में केंद्र के दखल से भड़कते हैं। सच तो यह है कि केंद्र सरकार राज्य सरकार की इच्छाओं पर निर्भर नहीं है। वह चाहे तो खुद ही कुछ बड़ा फैसला कर सकती है। इसलिए केंद्र सरकार ने चुनाव के पहले ही तीन बार दार्जलिंग के गोरखा संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ताकार नियुक्त कर दिया था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा गोरखाओं के दार्जलिंग मुद्दे पर राजनीति जरूर करेगी इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा तीन बार बैठक बुलाने के बावजूद राज्य सरकार ने कोई सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। गृह मंत्रालय ने भी राज्य सरकार के टालू रवैए से परेशान होकर पश्चिम बंगाल के अधिकारियों तथा गोरखा संगठनों से बातचीत करके एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने वार्ता शुरू भी कर दी है।
सच तो यह है कि दार्जलिंग में लोग राज्य सरकार से ज्यादा केंद्र सरकार को अपना हितैषी मानती है। यही कारण है कि पहले वे लोग कांग्रेस को वोट देते थे और जब से भाजपा सत्तारूढ़ हुई है, वे इसके साथ गए हैं। यही कारण है कि पहले वामपंथी संगठन और राज्य सरकार गोरखा समुदाय को केंद्र और कांग्रेस का समर्थक मानकर उनकी उपेक्षा करती थी और आज भी टीएमसी संगठन और पश्चिम बंगाल सरकार इसलिए गोरखा समस्या का समाधान करने में रूचि नहीं लेती क्योंकि वह समझती है कि गोरखा भाजपा को ही वोट देंगे।
बहरहाल लोकतंत्र में इस तरह की समस्याओं का राष्ट्रीय अखण्डता को ध्यान में रखकर समाधान खोजने में केंद्र और राज्य दोनों को रूचि लेना चाहिए। वोटों के लालच में ही सही यदि भाजपा गोरखों के प्रति संवेदनशील होने का प्रदर्शन करती है तो ऐसा प्रदर्शन वोटों के लिए टीएमसी को भी करना चाहिए। दार्जलिंग की समस्या का समाधान समय रहते निकाल लेना ही समझदारी है। इसलिए जिस भी आशय से गृहमंत्री अमित शाह ने गोरखाओं को आश्वासन दिया, निश्चित तौर पर इसका आने वाले दिनों में असर दिखने लगेगा। इस तरह के आश्वासन ही लोकतंत्र में उम्मीद के आधार होते हैं इसलिए आंदोलित समुदाय को जब भी कहीं से कोई आश्वासन मिलता है तो वह उस समाज और राष्ट्र के लिए सुखद ही होता है।
दरअसल पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय क्षेत्र में ज्यादा नेपाली मूल के गोरखा रहते हैं और राज्य सरकारें उनके हितों के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी गोरखाओं की भावनाओं को महसूस किया था और उन्होंने पूरी कोशिश की थी कि दार्जलिंग को पश्चिम बंगाल सरकार स्वायत्त क्षेत्र घोषित करे। किन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने दो टूक कह दिया था कि उनकी सरकार ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे की पश्चिम बंगाल के विखण्डन का संदेश जाए। विवश होकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक स्वायत्त बोर्ड तो बना दिया किन्तु राज्य सरकारें चाहे वह वामपंथी रही हों या फिर ममता बनर्जी की तृणमूल दोनों ही गोरखा समस्या में केंद्र के दखल से भड़कते हैं। सच तो यह है कि केंद्र सरकार राज्य सरकार की इच्छाओं पर निर्भर नहीं है। वह चाहे तो खुद ही कुछ बड़ा फैसला कर सकती है। इसलिए केंद्र सरकार ने चुनाव के पहले ही तीन बार दार्जलिंग के गोरखा संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ताकार नियुक्त कर दिया था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा गोरखाओं के दार्जलिंग मुद्दे पर राजनीति जरूर करेगी इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा तीन बार बैठक बुलाने के बावजूद राज्य सरकार ने कोई सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। गृह मंत्रालय ने भी राज्य सरकार के टालू रवैए से परेशान होकर पश्चिम बंगाल के अधिकारियों तथा गोरखा संगठनों से बातचीत करके एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने वार्ता शुरू भी कर दी है।
सच तो यह है कि दार्जलिंग में लोग राज्य सरकार से ज्यादा केंद्र सरकार को अपना हितैषी मानती है। यही कारण है कि पहले वे लोग कांग्रेस को वोट देते थे और जब से भाजपा सत्तारूढ़ हुई है, वे इसके साथ गए हैं। यही कारण है कि पहले वामपंथी संगठन और राज्य सरकार गोरखा समुदाय को केंद्र और कांग्रेस का समर्थक मानकर उनकी उपेक्षा करती थी और आज भी टीएमसी संगठन और पश्चिम बंगाल सरकार इसलिए गोरखा समस्या का समाधान करने में रूचि नहीं लेती क्योंकि वह समझती है कि गोरखा भाजपा को ही वोट देंगे।
बहरहाल लोकतंत्र में इस तरह की समस्याओं का राष्ट्रीय अखण्डता को ध्यान में रखकर समाधान खोजने में केंद्र और राज्य दोनों को रूचि लेना चाहिए। वोटों के लालच में ही सही यदि भाजपा गोरखों के प्रति संवेदनशील होने का प्रदर्शन करती है तो ऐसा प्रदर्शन वोटों के लिए टीएमसी को भी करना चाहिए। दार्जलिंग की समस्या का समाधान समय रहते निकाल लेना ही समझदारी है। इसलिए जिस भी आशय से गृहमंत्री अमित शाह ने गोरखाओं को आश्वासन दिया, निश्चित तौर पर इसका आने वाले दिनों में असर दिखने लगेगा। इस तरह के आश्वासन ही लोकतंत्र में उम्मीद के आधार होते हैं इसलिए आंदोलित समुदाय को जब भी कहीं से कोई आश्वासन मिलता है तो वह उस समाज और राष्ट्र के लिए सुखद ही होता है।