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ढाक के तीन पात

प्रकाशित: 13-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
ढाक के तीन पात
इस्लामाबाद में आयोजित अमेरिका-ईरान के बीच पाकिस्तानी चौधराहट में शनिवार को शुरू हुई 21 घंटे की वार्ता के बिना कोई परिणाम निकले ही दुःखद अन्त होना इस बात का संकेत है कि दोनों पक्षों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। वार्ता में शामिल अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ऐलान कर दिया कि यह वार्ता विफल हो चुकी है जबकि ईरानी प्रतिनिधि मंडल ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह अनावश्यक शर्तें थोप रहे थे।
दरअसल वार्ता तो सफल होनी ही नहीं थी क्योंकि पाकिस्तान अपनी चौधराहट दिखाने के लिए ईरान को झांसा देकर वार्ता के टेबल पर लाने के प्रयास में लगा था। अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश होने के कारण अपनी जनता और लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति उत्तरदायी हैं। इसलिए वह अपनी जनता और दुनिया को झांसे में रखने के लिए इस तरह की वार्ताएं अपने दुश्मन मुल्कों से करने में संकोच नहीं करते। अमेरिकी हमेशा इस प्रवृत्ति के होते हैं कि “हम सही, सब गलत'' और इसलिए वे समझौते में अपनी तरफ से कम से कम छूट देते हैं। अमेरिकी हमेशा अपने निर्धारित लक्ष्य को केंद्रित करके ही सौदेबाजी करते हैं। यह प्रवृत्ति मात्र अमेरिकी जनमानस के वरिष्ठता बोध की ग्रंथि के कारण होता है। लेकिन ईरान संघर्षशील मानसिकता के हैं, वे कभी किसी का आदेश नहीं मानते। उन्होंने दृढ़ता पूर्वक अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए यदि संकल्प लिया है तो उसे पूरा करने में वह किसी भी तरह की ब्लैकमेलिंग स्वीकार नहीं करते। समझौता ईरानी तभी करते हैं, जब उन्हें तर्कसंगत लगता है। ईरानी मित्रता तो निभाते हैं, किन्तु दासता निभाने के आदी नहीं हैं।
असल में इस वार्ता के विफलता का प्रमुख कारण है इसमें इजरायल का शामिल न होना। यह बात तो समझ से परे हैं कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो भी जाए तो इजरायल अपनी कार्रवाईयों के लिए स्वतंत्र रहेगा। यह कैसा समझौता होता!
यह सच है कि अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु परीक्षण से दूर रहे और एनपीटी की संधि का हिस्सा बने जो उसने पहले ही हस्ताक्षर कर रखा है। लेकिन ईरान परमाणु शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए करने का अधिकार रखता है। अमेरिका से ईरान की सबसे बड़ी शिकायत है कि एक बार इस मुद्दे पर समझौता हो जाने पर राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में एकतरफा तोड़ दिया तथा उसके खिलाफ तमाम प्रतिबंध थोप दिए।
बहरहाल अमेरिका-ईरान के बीच के ये मुद्दे अपनी जगह पर है किन्तु इजरायल की ईरान को लेकर अलग ही समस्या है। ईरान के इकोसिस्टम में तो यह धारणा है कि यहूदियों को जीने का अधिकार ही नहीं है। ईरान के कट्टरपंथी मानते हैं कि इजरायल के अस्तित्व को समाप्त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य है। ईरान हमास और हिजबुल्लाह को इसलिए धन देता है कि दोनों इजरायल की यहूदी जनता को मारकर खत्म कर दे। यदि इजरायल और ईरान में इस तरह की दुश्मनी है तो क्या इजरायल को बाहर रखकर ईरान या अमेरिका शांति वार्ता में सफलता हासिल कर सकता है! कदापि नहीं। यह वार्ता मात्र फर्ज अदायगी थी। चीन की सलाह पर ईरान ने इसमें शामिल होकर मात्र औपचारिकता निभाई। ईरान प्रतिनिधिमंडल को इस्लामाबाद आने से पहले अपने इस्लामिक रिपब्लिकन गार्ड्स कार्प्स (आईआरजीसी) का तीव्र विरोध झेलना पड़ा। अमेरिका को इस वार्ता की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि वह अपने विरोधियों को यह बता सके कि ट्रंप प्रशासन तो ईरान के साथ समझौता चाहता था किन्तु वह खुद समझौते के लिए तैयार नहीं था। पाकिस्तान की हालत तो सबसे ज्यादा हास्यास्पद है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर बहुरुपिया की भूमिका निभा रहे थे। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की अगुवाई उन्होंने काला सूट पहन कर की मतलब कि वह अपने देश के प्रमुख कूटनीतिक हैं जबकि ईरान के प्रतिनिधिमंडल से फौजी वर्दी में। मतलब यह कि मुनीर सेना के सर्वोच्च नायक हैं। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान मात्र अमेरिका के इशारे पर तथा खाड़ी के देशों से अपनी भूमिका का एहसास कराना और ईरान को यह बताना कि पाकिस्तान तेहरान से दुश्मनी नहीं चाहता। इसलिए सभी ने अपनी फर्ज अदायगी की और परिणाम वही निकला जो निकलना था यानि ‘ढाक के तीन पात।'