भारी पड़ी चौधराहट
प्रकाशित: 15-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
पाकिस्तान ने अपने फाइटर जेट्स ऐर जेट्स सउदी अरब के किंग अब्दुल अजीज एयरबेस पर मंगलवार को उतारकर इस बात का संकेत दिया कि उस पर सउदी अरब और अमेरिका की तरफ से इतना दबाव बढ़ रहा है कि उसको भी जंग में शामिल होना पड़ सकता है।
पाकिस्तान अभी तक यूं ही नहीं ऊपरी तौर पर चौधराहट और आंतरिक रूप से युद्ध में शामिल होने से बचने के लिए तरकीब लगा रहा था।
दरअसल इस्लामाबाद वार्ता टूटने के बाद जैसे ही राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मूज समुद्री मार्ग में अपने फाइटर्स तैनात करने की घोषणा की इसके बाद ही सउदी अरब ने पाकिस्तान को दो टूक कहा कि अब वह समझौते के अनुसार ईरान के खिलाफ युद्ध में सक्रियता पूर्वक भाग ले। सच तो यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ सउदी अरब से समझौता कर रखा है। यही नहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की सांस ही सउदी अरब और यूएई द्वारा दिए अरबों डालर के कारण चल रही है।
पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से ईरान के प्रति हमददी दिखाते हुए उसे वार्ता के लिए तैयार करने की कोशिश की थी किंतु ईरान को पता था कि पाकिस्तानी सेना और सरकार दोनों ही उसके साथ विश्वासघात कर रहे हैं। ईरान को यह भी पता था कि पाकिस्तान अमेरिका के गुप्त प्रतिनिधि के तौर पर वार्ता की मेजबानी कर रहा है। इसीलिए उन्होंने चीन से सलाह मांगी और चीन ने जब कहा तब उन्होंने वार्ता में शामिल होने की सहमति दी। पाकिस्तान जो चीन से भी तमाम तरह की आर्थिक सहायता और कर्ज ले चुका है, अब उसे उसका भी कोपभाजन बनना पड़ सकता है। पाकिस्तान ने खुद की गर्दन बचाने के लिए इतना प्रयास किया किंतु इस जंग में उलझन इतनी ज्यादा है कि अब उसे अपने असली स्वरूप में आने के लिए विवश होना पड़ा।
यह हैरानी की बात नहीं है कि कोलकाता में चीन के वाणिज्य महादूत जू वेई ने सोमवार को जब कहा कि भारत तेजी से उभरती आर्थिक महाशक्ति है और चीन पहले से ही आर्थिक महाशक्ति है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि भारत और चीन दोनों मिलकर काम करें तो उन्हें कोई भी देश परेशान नहीं कर सकता। इसका मतलब है कि जिस तरह चीन वर्षें से चली आ रही अपनी दुश्मनी को भूल कर वह रूस के साथ सहयोग कर सकता है, उसी तरह वह भारत के साथ भी रहने की रणनीति अपना सकता है। पहले तो रूस से चीन की सीमा संबंधी झगड़े होते ही रहते थे किंतु अमेरिका की वजह से चीन ने रूस के साथ आर्थिक सहयोग शुरू किया और आज की तारीख में दोनों को दोस्त तक माना जाता है। इसी तरह का यदि अपनी बाजारवादी आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए चीन सीमा संबंधी विवादों के बावजूद भारत से रिश्ते रणनीतिक दृष्टि से सामान्य कर ले तो इससे बड़ी राहत भारत के लिए और इससे बड़ा झटका पाकिस्तान के लिए कुछ भी नहीं हो सकता।
बहरहाल तेजी से बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य का पाकिस्तान ने धूर्ततापूर्वक लाभ उठाने की कोशिश की लेकिन वह इस दलाली के दल-दल में ऐसा फंसता जा रहा है कि लगता है कि उसे खाड़ी अथवा ईरान तथा अमेरिका अथवा चीन में से किसी को चुनने के लिए विवश होना पड़ेगा। इसी को कहते हैं चौबे चले थे छब्बे बनने दूबे बनकर लौटे।
पाकिस्तान अभी तक यूं ही नहीं ऊपरी तौर पर चौधराहट और आंतरिक रूप से युद्ध में शामिल होने से बचने के लिए तरकीब लगा रहा था।
दरअसल इस्लामाबाद वार्ता टूटने के बाद जैसे ही राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मूज समुद्री मार्ग में अपने फाइटर्स तैनात करने की घोषणा की इसके बाद ही सउदी अरब ने पाकिस्तान को दो टूक कहा कि अब वह समझौते के अनुसार ईरान के खिलाफ युद्ध में सक्रियता पूर्वक भाग ले। सच तो यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ सउदी अरब से समझौता कर रखा है। यही नहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की सांस ही सउदी अरब और यूएई द्वारा दिए अरबों डालर के कारण चल रही है।
पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से ईरान के प्रति हमददी दिखाते हुए उसे वार्ता के लिए तैयार करने की कोशिश की थी किंतु ईरान को पता था कि पाकिस्तानी सेना और सरकार दोनों ही उसके साथ विश्वासघात कर रहे हैं। ईरान को यह भी पता था कि पाकिस्तान अमेरिका के गुप्त प्रतिनिधि के तौर पर वार्ता की मेजबानी कर रहा है। इसीलिए उन्होंने चीन से सलाह मांगी और चीन ने जब कहा तब उन्होंने वार्ता में शामिल होने की सहमति दी। पाकिस्तान जो चीन से भी तमाम तरह की आर्थिक सहायता और कर्ज ले चुका है, अब उसे उसका भी कोपभाजन बनना पड़ सकता है। पाकिस्तान ने खुद की गर्दन बचाने के लिए इतना प्रयास किया किंतु इस जंग में उलझन इतनी ज्यादा है कि अब उसे अपने असली स्वरूप में आने के लिए विवश होना पड़ा।
यह हैरानी की बात नहीं है कि कोलकाता में चीन के वाणिज्य महादूत जू वेई ने सोमवार को जब कहा कि भारत तेजी से उभरती आर्थिक महाशक्ति है और चीन पहले से ही आर्थिक महाशक्ति है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि भारत और चीन दोनों मिलकर काम करें तो उन्हें कोई भी देश परेशान नहीं कर सकता। इसका मतलब है कि जिस तरह चीन वर्षें से चली आ रही अपनी दुश्मनी को भूल कर वह रूस के साथ सहयोग कर सकता है, उसी तरह वह भारत के साथ भी रहने की रणनीति अपना सकता है। पहले तो रूस से चीन की सीमा संबंधी झगड़े होते ही रहते थे किंतु अमेरिका की वजह से चीन ने रूस के साथ आर्थिक सहयोग शुरू किया और आज की तारीख में दोनों को दोस्त तक माना जाता है। इसी तरह का यदि अपनी बाजारवादी आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए चीन सीमा संबंधी विवादों के बावजूद भारत से रिश्ते रणनीतिक दृष्टि से सामान्य कर ले तो इससे बड़ी राहत भारत के लिए और इससे बड़ा झटका पाकिस्तान के लिए कुछ भी नहीं हो सकता।
बहरहाल तेजी से बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य का पाकिस्तान ने धूर्ततापूर्वक लाभ उठाने की कोशिश की लेकिन वह इस दलाली के दल-दल में ऐसा फंसता जा रहा है कि लगता है कि उसे खाड़ी अथवा ईरान तथा अमेरिका अथवा चीन में से किसी को चुनने के लिए विवश होना पड़ेगा। इसी को कहते हैं चौबे चले थे छब्बे बनने दूबे बनकर लौटे।