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मजबूरी का समझौता

प्रकाशित: 10-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
मजबूरी का समझौता
ईरान और अमेरिका के बीच जो युद्ध विराम का समझौता हुआ था वह मजबूरी का सौदा साबित होने वाला है। युद्ध विराम की सहमति के एक दिन बाद ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर बंद करने का ऐलान करते हुए इसके लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहाराया। ईरान का मानना है कि जब अस्थाई युद्ध विराम पर सहमति बन गई थी तो इजरायल लेबनान पर हमले करके हिजबुल्लाह को निशाना क्यों बना रहा है! ईरान का कहना है कि सहमति के बाद युद्ध विराम से पीछे इजरायल हटा है। इसलिए तेहरान भी अब होर्मुज जलडमरूमध्य को मुक्त करने के फैसले से पीछे हट रहा है।
दरअसल ईरान तो अमेरिका से न सिर्फ बात करने से इंकार कर रहा था बल्कि पाकिस्तान की मध्यस्थता को गंभीरता से ले ही नहीं रहा था। मंगलवार को जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नेताओं को गाली देते हुए चेतावनी दी कि यदि बुधवार के सुबह तक होर्मुज जलडमरूमध्य को नहीं खोला तो उसके सड़क, पुल ऊर्जा स्थलों को तबाह कर दिया जाएगा। अमेरिका की इस धमकी के तुरन्त बाद चीन ने ईरान के नेताओं को समझाया और उन्हें इस बात के लिए सहमत किया कि वे अपनी शर्तों को अमेरिका के सामने रखें। यदि अमेरिका उन शर्तों को मान लेता है तो ईरान को शांति का विकल्प चुनने में किसी तरह का घाटा नहीं है। ईरान अमेरिका पर भरोसा नहीं करता किन्तु वह चीन की बात मानता है। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि अमेरिका के सामने ईरान ने जिन शर्तों को रखा उन सभी को राष्ट्रपति ट्रंप ने मान लिया। इसलिए कूटनीति की समझ रखने वाले अब स्पष्ट रूप से मानते हैं कि दोनों देशों के बीच बनी सहमति मजबूरी की देन है। इसलिए इस सहमति के फलस्वरूप यदि कोई समझौता होता भी है तो उसका निभ पाना मुश्किल है। ऐसे कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुमान को नकारा भी नहीं जा सकता। अमेरिका ईरान के लिए खाड़ी देशों को छोड़ने वाले नहीं हैं। इसलिए लगता है कि इस समझौते के स्थायित्व का कोई आधार नहीं है।
वास्तविकता तो यह है कि एक तरफ जहां ईरान लगातार किसी भी समझौते से इंकार कर रहा था, वहीं पाकिस्तान की मुश्किल यह है कि एक तरफ चीन के कारण वह ईरान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सका जबकि दूसरी तरफ सऊदी अरब के साथ समझौता किए बैठा है कि दोनों देशों में से किसी एक पर भी हमला होता है तो दूसरा इसे अपने ऊपर हमला मानेगा। लेकिन इस समझौते पर अमल इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि सऊदी अरब पर ईरान द्वारा हमले के बाद पाकिस्तान ईरान पर हमले की सोच भी नहीं सकता था क्योंकि चीन ने भी पाकिस्तान को कर्ज दे रखा है। मतलब यह कि पाकिस्तान ने एक तरफ जहां सऊदी अरब से धन लेकर उसकी रक्षा की जिम्मेदारी ले रखी है, वहीं चीन से धन लेकर अमेरिका विरोधी गुट को भी संतुष्ट रखने की कोशिश कर रहा है।
बहरहाल इस बात के लिए पाकिस्तान की तारीफ तो की ही जानी चाहिए कि उसने अपने स्वार्थ के लिए ही सही युद्ध विराम के लिए हरसंभव कोशिश की। अब यह युद्धबंदी संबंधी सहमति कब तक बनी रहेगी इसका अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल हैं क्योंकि इजरायल हिजबुल्लाह, हूती और हमास के खिलाफ अपने हमले जारी रखेगा। इजरायली हमलों की जिम्मेदारी अमेरिका भी नहीं लेगा इसलिए ईरान की मजबूरी में ही सही इस समझौते को मानने में ही भलाई है।