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विरोध के लिए विरोध

प्रकाशित: 17-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
विरोध के लिए विरोध
सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण अधिनियम में संशोधन और परिसीमन से संबंधित तीन विधेयक बृहस्पतिवार को विपक्ष के कड़े विरोध के बावजूद पेश कर दिया। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान के 131वें संशोधन विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 पेश किया तो गृहमंत्री अमित शाह ने संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक 2026 पेश किया। संविधान (131वां) संशोधन विधेयक के पक्ष में 251 वोट पड़े जबकि विपक्ष में 185 वोट पड़े।
दरअसल विपक्ष ने इन तीनों विधेयकों का जबरदस्त विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह विधेयक ही संविधान विरोधी है। विपक्ष का मानना है कि जब राज्यों में चुनाव चल रहे हैं तो सरकार महिलाओं को आकर्षित करने के लिए इस तरह का विधेयक ला रही है। यही नहीं विपक्ष का आरोप इस बात को लेकर भी है कि इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद राज्य सरकारों पर बोझ बढ़ जाएंगे। इसका मतलब यह हुआ कि विपक्ष चाहता ही नहीं कि इन तीनों विधेयकों में से कोई एक भी पेश हो। लेकिन सवाल इस बात का है कि विधेयकों को पेश करने का समय कब आता जब इस देश में हमेशा चुनाव ही होते रहते हैं! बड़े हैरानी की बात है कि विपक्ष की कुछ पार्टियां संवैधानिक भावनाओं को अपना हथियार बनाकर मनमाने तरीके से सरकार के हर विधेयक का विरोध करती हैं। विपक्षी कभी भी नहीं चाहते कि सरकार द्वारा लाया गया कोई विधेयक संसद में पारित हो जाए। इसी वजह से अब विपक्ष की नीयत पर ही सवाल उठाए जाने लगे हैं। एक आदमी संशोधन विधेयक 2026 को नहीं समझता लेकिन जब वह इस बात को अपनी भाषा और भाव में समझता है तो उसे इस बात का एहसास हो जाता है कि विपक्ष किसी विधेयक का विरोध करता है तो वह इस बात का एहसास करता है कि विपक्ष आंख मूंद कर सरकार के हर विधेयक का विरोध करता है। विपक्ष को कभी-कभी जब इस बात का एहसास हो कि वह विधेयक जनाकांक्षाओं के अनुरूप हो तो उसका समर्थन भी करना चाहिए।
बहरहाल लोकतंत्र में जब किसी भी नीति का विपक्ष विरोध करता है तो वह अलोकतांत्रिक कृत्य नहीं माना जा सकता। किन्तु जब विपक्ष हर कानून का विरोध करता है तो इससे यह अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है कि विपक्ष के समझ का दायरा उसके राजनीतिक खूंटे से दूर नहीं जा सकता। यही कारण है कि कोई भी कानून आम सहमति से बन ही नहीं पाता। इसलिए मत विभाजन अनिवार्य हो जाता है। अच्छा होता है कि महिलाओं से संबंधित इस कानून को सर्व सम्मति से पारित किया जाता। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष विरोध के लिए विरोध की नीति को अपने अस्तित्व के लिए अनिवार्य समझता है।