सफलता संदिग्ध पर संतुष्ट सब
प्रकाशित: 11-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
समझौते के टेबल पर दोनों पक्ष तभी आते हैं जब वे किसी न किसी कमजोरी से ग्रस्त हों। ईरान और अमेरिका दोनों ही इस युद्ध का परिणाम जानते हैं। अमेरिका अपने जन-धन और बारूदी संसाधनों की क्षति से डरा हुआ है तो ईरान इस जिद पर अड़ा है कि वह तुम्हें हमले के दुष्परिणाम का एहसास करा देगा, भले ही वह तबाह हो जाए। इसीलिए इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच हो रही वार्ता बहुत महत्वपूर्ण है। इस वार्ता का महत्व इस बात के लिए नहीं है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधर जाएंगे बल्कि महत्वपूर्ण इसलिए है कि अमेरिका वार्ता के लिए तैयार हो गया। इस तरह की वार्ताएं एक दिन या दो दिन में सफल नहीं होती! इस तरह की वार्ताओं में दोनों पक्ष अपने हित-अहित का आकलन करने में समय लेते हैं। पिछले दिनों जब पाकिस्तान के विदेशमंत्री इशाक डार ने ईरान में जाकर वार्ता के लिए अनुरोध किया तो तेहरान ने उन्हें टका सा जबाव देते हुए कहा था कि आपके ऊपर विश्वास करके वह अमेरिका के झांसे में नहीं आएगा। अन्यथा उसके बचे खुचे नेता, कमांडर और वैज्ञानिक फिर मारे जाएंगे। ईरान ने साफ शब्दों में कहा कि यदि चीन शांति वार्ता में शामिल हो, तब तो वह इसमें शामिल होने के लिए विचार कर सकता है। इसके तुरंत बाद इशाक डार ने चीन का दौरा किया और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अनुरोध किया कि वह जल्दी से जल्दी ईरान को वार्ता के लिए सहमत करें। चीन ने वार्ता के लिए ईरान को सहमत कर लिया। कदाचित इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को वार्ता के लिए सहमत करने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी का धन्यवाद भी किया। लेकिन पाकिस्तान ने इस वार्ता के लिए जितनी दौड़-धूप की वह भी सराहनीय है। पाकिस्तान इस बात को अच्छी तरह जान रहा है कि ईरान को नजरंदाज कर पाना उसके लिए कितना मुश्किल है।
इस वार्ता की सबसे कमजोर कड़ी यह साबित होने वाली है कि लेबनान को ईरान इस वार्ता सहमति का हिस्सा मानता है जबकि अमेरिका और इजरायल मानते हैं कि ईरान वार्ता के लिए लेबनान का कोई संबंध नहीं है। ईरान ने पाकिस्तान से पूछा कि लेबनान इस वार्ता का हिस्सा होगा, फिर अमेरिका और इजरायल मुकर रहे हैं, इसका जबाव इस्लामाबाद के पास नहीं रहा।
असल में इजरायल समझता है कि इन दिनों हमास तो पस्त है किंतु हूती और हिजबुल्ला आतंकियों को फिर शिया संकट का भय दिखाकर सक्रिय कर दिया गया है। इसीलिए इजरायल लेबनान पर धुआंधार बमबारी कर रहा है। अमेरिका भी इजरायल को इसीलिए कुछ नहीं बोल पा रहा है क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अमेरिका ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए पहल करे। मतलब यह कि ईरान को पूरी तरह तबाह करने के बाद ही उससे वार्ता के लिए तैयार होने की बात कर रहा है इजरायल। इस्लामाबाद में आयोजित वार्ता में भी इजरायल का कोई भी प्रतिनिधि शामिल नहीं हो रहा है। इजरायल ने ईरान पर अमेरिका के दबाव में भले ही हमला बंद कर दिया किंतु वह युद्ध तो अभी जारी रखे हुए है। इस्लामाबाद वार्ता के दौरान ईरान बेरूत पर इजरायली हमले को मुद्दा बना सकता है। लेकिन सवाल है कि तमाम विरोधाभासी आश्वासनों के बावजूद भी ईरान राष्ट्रपति शी की बात मानकर वार्ता के लिए तैयार कैसे हो गया? इसका जवाब यह है कि चीन अब ईरान को विमान भेदी मिसाइलों की आपूर्ति करने लगा है। अमेरिका के एफ-15 को चीन द्वारा उपलब्ध कराई गई विमान भेदी मिसाइल से ही ईरान ने मार गिराया था। चीन बड़ी चालाकी से अब ईरान की मदद कर रहा है। वह अपने रक्षा उपकरण किसी तीसरे देश के माध्यम से भेज रहा है। एफ-15 के मार गिराए जाने पर अमेरिकी विशेषज्ञों ने जो रिपोर्ट भेजी उससे राष्ट्रपति ट्रंप का पारा हाई होना स्वाभाविक है। ईरान को वार्ता के लिए सहमत करने हेतु चीन की तारीफ के दो दिन बाद यानि शनिवार को ही वह चीन की भूमिका को लेकर बहुत गंभीर हो गए हैं और जांच करा रहे हैं।
बहरहाल वार्ता होना अच्छी बात है, इसमें शामिल होने वालों और समर्थन करने वाले सभी जानते हैं कि कई कारणों से इसकी सफलता संदिग्ध है फिर भी संतुष्ट सभी हैं।
इस वार्ता की सबसे कमजोर कड़ी यह साबित होने वाली है कि लेबनान को ईरान इस वार्ता सहमति का हिस्सा मानता है जबकि अमेरिका और इजरायल मानते हैं कि ईरान वार्ता के लिए लेबनान का कोई संबंध नहीं है। ईरान ने पाकिस्तान से पूछा कि लेबनान इस वार्ता का हिस्सा होगा, फिर अमेरिका और इजरायल मुकर रहे हैं, इसका जबाव इस्लामाबाद के पास नहीं रहा।
असल में इजरायल समझता है कि इन दिनों हमास तो पस्त है किंतु हूती और हिजबुल्ला आतंकियों को फिर शिया संकट का भय दिखाकर सक्रिय कर दिया गया है। इसीलिए इजरायल लेबनान पर धुआंधार बमबारी कर रहा है। अमेरिका भी इजरायल को इसीलिए कुछ नहीं बोल पा रहा है क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अमेरिका ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए पहल करे। मतलब यह कि ईरान को पूरी तरह तबाह करने के बाद ही उससे वार्ता के लिए तैयार होने की बात कर रहा है इजरायल। इस्लामाबाद में आयोजित वार्ता में भी इजरायल का कोई भी प्रतिनिधि शामिल नहीं हो रहा है। इजरायल ने ईरान पर अमेरिका के दबाव में भले ही हमला बंद कर दिया किंतु वह युद्ध तो अभी जारी रखे हुए है। इस्लामाबाद वार्ता के दौरान ईरान बेरूत पर इजरायली हमले को मुद्दा बना सकता है। लेकिन सवाल है कि तमाम विरोधाभासी आश्वासनों के बावजूद भी ईरान राष्ट्रपति शी की बात मानकर वार्ता के लिए तैयार कैसे हो गया? इसका जवाब यह है कि चीन अब ईरान को विमान भेदी मिसाइलों की आपूर्ति करने लगा है। अमेरिका के एफ-15 को चीन द्वारा उपलब्ध कराई गई विमान भेदी मिसाइल से ही ईरान ने मार गिराया था। चीन बड़ी चालाकी से अब ईरान की मदद कर रहा है। वह अपने रक्षा उपकरण किसी तीसरे देश के माध्यम से भेज रहा है। एफ-15 के मार गिराए जाने पर अमेरिकी विशेषज्ञों ने जो रिपोर्ट भेजी उससे राष्ट्रपति ट्रंप का पारा हाई होना स्वाभाविक है। ईरान को वार्ता के लिए सहमत करने हेतु चीन की तारीफ के दो दिन बाद यानि शनिवार को ही वह चीन की भूमिका को लेकर बहुत गंभीर हो गए हैं और जांच करा रहे हैं।
बहरहाल वार्ता होना अच्छी बात है, इसमें शामिल होने वालों और समर्थन करने वाले सभी जानते हैं कि कई कारणों से इसकी सफलता संदिग्ध है फिर भी संतुष्ट सभी हैं।