समझौते की उम्मीद नहीं
प्रकाशित: 20-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
एक तरफ ईरान अड़ा हुआ है कि वह होर्मुज समुद्री मार्ग तब तक नहीं खोलेगा जब तक कि अमेरिका उसके बंदरगाहों पर लगाई गई नाकेबंदी को नहीं हटाता जबकि दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए दो टूक कहा है कि यदि उनकी शर्तें ईरान नहीं मानता तो अमेरिका ईरान के हर पुल और बिजली संयंत्र को उड़ा देगा। ट्रंप ने कहा कि अच्छा दिखाने और नरमी बरतने का दौर खत्म हो गया।
दरअसल होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की पलटी को अमेरिका युद्ध विराम का उल्लंघन मानता है और जब भी उसे अपने विरोधी के खिलाफ हमला तेज करना होता है तो वह पहला काम यही करता है कि उस पर गंभीर आरोप लगाता है। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए आरोप इतने गंभीर हैं कि बातचीत का माहौल ही बदल सकते। सोमवार को अमेरिका और ईरान के बीच दूसरी बार इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता का मुख्य केंद्र होर्मुज स्ट्रेट ही रहने वाला है। ईरान कोशिश करेगा कि वह अपने बंदरगाहों पर लगे अमेरिकी नाकेबंदी को समाप्त कराने के लिए अमेरिका को सहमत करे किंतु लगता है कि बात फिर होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के अड़ियल रुख के कारण टूट जाए। असल में समझौता तभी हो सकता है जब सौदेबाजी सफल हो जाए। यहां तो दोनों की शर्तें प्रतिष्ठा का मानक बनी हुई हैं।
सच तो यह है कि समझौता तभी होता है जब दोनों पक्ष पीछे हटने की कोशिश करें। यहां तो अमेरिका पहले ही अपना लक्ष्य शर्तें के माध्यम से स्पष्ट कर देता है और पीछे हटने के बजाए पीछे धकेलने की कोशिश करता है। ठीक उसी की तरह ईरान है। इस वक्त ईरान में कोई राजनीतिक सरकार सक्रिय है ही नहीं। जो भी फैसला होता है, उसे इस्लामिक रिपब्लिकन गार्ड्स ले रहे हैं। यही कारण है कि ईरान भय वश वार्ता के लिए इस्लामाबाद तो आ जाता है किंतु वह आज भी समझौते के मनस्थिति में नहीं है।
ईरान को गलतफहमी है कि वह होर्मुज समुद्री मार्ग को हथियार के तौर पर सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर लेगा किंतु अमेरिका को लगता है कि यदि उसने ईरान को ज्यादा समय दिया तो स्थिति और बिगड़ सकती है। ईरान की समझ में एक बात अभी तक नहीं आई कि इस युद्ध में वह अकेले अमेरिका से ही नहीं लड़ रहा है। उसका एक दुश्मन इजरायल भी है। इजरायल अभी तक ईरान पर हमले इसलिए नहीं कर रहा है कि अमेरिका ने वार्ता को तोड़ने का अधिकृत घोषणा नहीं की है किंतु इजरायल ईरान के घोषित आतंकी संगठनों हिजबुल्लाह, हमास और हूती को आज भी मार रहा है। यदि ईरान इतना ही युद्धबंदी के अनिच्छुक है तो उसे वार्ता के टेबल पर तब तक नहीं आना चाहिए था, जब तक कि इजरायल का प्रतिनिधि मंडल शामिल न होता। कहने का मतलब यह है कि एक तरफ तो उन्हें डर भी लग रहा है कि यदि वार्ता में हिस्सा लेने से मना किया तो राष्ट्रपति, संसद के स्पीकर और विदेश मंत्री को अमेरिका तुरंत उड़ा देगा। अमेरिका ने तुकी, यूएई और पाकिस्तान के अनुरोध पर ईरान के इन तीन नेताओं को छोड़ रखा है ताकि वार्ताएं चलती रहें। दूसरी तरफ ईरान के अंदर अकड़ इतनी है कि उन देशों के प्रति भी नरमी नहीं बरतता जो सीधे उसके खिलाफ किसी भी कार्रवाई के हिस्सा नहीं हैं। भारत के जहाजों को रोककर उसने इस बात का एहसास दिला दिया कि ईरान पर पूरी तरह भरोसा करना नासमझी होगी।
बहरहाल लगता तो यही है कि या तो ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर झुकेगा अन्यथा तीसरी वार्ता के पहले ईरान में कुछ बड़ा होगा। कारण कि अब ट्रंप ने अमेरिकी जनता और दुनिया को यह संदेश सफलतापूर्वक दे दिया है कि उसने तो बहुत कोशिश कर ली किंतु जिद्दी ईरान मानता ही नहीं। इसलिए वह अब ईरान को सबक सिखाने के लिए जो कार्रवाई करेगा उससे वह मुल्क तबाह हो जाएगा। अमेरिका की विवशता यह है कि यदि वह ईरान के सामने झुक गया तो उसकी बादशाहत को कौन पूछेगा!
दरअसल होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की पलटी को अमेरिका युद्ध विराम का उल्लंघन मानता है और जब भी उसे अपने विरोधी के खिलाफ हमला तेज करना होता है तो वह पहला काम यही करता है कि उस पर गंभीर आरोप लगाता है। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए आरोप इतने गंभीर हैं कि बातचीत का माहौल ही बदल सकते। सोमवार को अमेरिका और ईरान के बीच दूसरी बार इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता का मुख्य केंद्र होर्मुज स्ट्रेट ही रहने वाला है। ईरान कोशिश करेगा कि वह अपने बंदरगाहों पर लगे अमेरिकी नाकेबंदी को समाप्त कराने के लिए अमेरिका को सहमत करे किंतु लगता है कि बात फिर होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के अड़ियल रुख के कारण टूट जाए। असल में समझौता तभी हो सकता है जब सौदेबाजी सफल हो जाए। यहां तो दोनों की शर्तें प्रतिष्ठा का मानक बनी हुई हैं।
सच तो यह है कि समझौता तभी होता है जब दोनों पक्ष पीछे हटने की कोशिश करें। यहां तो अमेरिका पहले ही अपना लक्ष्य शर्तें के माध्यम से स्पष्ट कर देता है और पीछे हटने के बजाए पीछे धकेलने की कोशिश करता है। ठीक उसी की तरह ईरान है। इस वक्त ईरान में कोई राजनीतिक सरकार सक्रिय है ही नहीं। जो भी फैसला होता है, उसे इस्लामिक रिपब्लिकन गार्ड्स ले रहे हैं। यही कारण है कि ईरान भय वश वार्ता के लिए इस्लामाबाद तो आ जाता है किंतु वह आज भी समझौते के मनस्थिति में नहीं है।
ईरान को गलतफहमी है कि वह होर्मुज समुद्री मार्ग को हथियार के तौर पर सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर लेगा किंतु अमेरिका को लगता है कि यदि उसने ईरान को ज्यादा समय दिया तो स्थिति और बिगड़ सकती है। ईरान की समझ में एक बात अभी तक नहीं आई कि इस युद्ध में वह अकेले अमेरिका से ही नहीं लड़ रहा है। उसका एक दुश्मन इजरायल भी है। इजरायल अभी तक ईरान पर हमले इसलिए नहीं कर रहा है कि अमेरिका ने वार्ता को तोड़ने का अधिकृत घोषणा नहीं की है किंतु इजरायल ईरान के घोषित आतंकी संगठनों हिजबुल्लाह, हमास और हूती को आज भी मार रहा है। यदि ईरान इतना ही युद्धबंदी के अनिच्छुक है तो उसे वार्ता के टेबल पर तब तक नहीं आना चाहिए था, जब तक कि इजरायल का प्रतिनिधि मंडल शामिल न होता। कहने का मतलब यह है कि एक तरफ तो उन्हें डर भी लग रहा है कि यदि वार्ता में हिस्सा लेने से मना किया तो राष्ट्रपति, संसद के स्पीकर और विदेश मंत्री को अमेरिका तुरंत उड़ा देगा। अमेरिका ने तुकी, यूएई और पाकिस्तान के अनुरोध पर ईरान के इन तीन नेताओं को छोड़ रखा है ताकि वार्ताएं चलती रहें। दूसरी तरफ ईरान के अंदर अकड़ इतनी है कि उन देशों के प्रति भी नरमी नहीं बरतता जो सीधे उसके खिलाफ किसी भी कार्रवाई के हिस्सा नहीं हैं। भारत के जहाजों को रोककर उसने इस बात का एहसास दिला दिया कि ईरान पर पूरी तरह भरोसा करना नासमझी होगी।
बहरहाल लगता तो यही है कि या तो ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर झुकेगा अन्यथा तीसरी वार्ता के पहले ईरान में कुछ बड़ा होगा। कारण कि अब ट्रंप ने अमेरिकी जनता और दुनिया को यह संदेश सफलतापूर्वक दे दिया है कि उसने तो बहुत कोशिश कर ली किंतु जिद्दी ईरान मानता ही नहीं। इसलिए वह अब ईरान को सबक सिखाने के लिए जो कार्रवाई करेगा उससे वह मुल्क तबाह हो जाएगा। अमेरिका की विवशता यह है कि यदि वह ईरान के सामने झुक गया तो उसकी बादशाहत को कौन पूछेगा!