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हार में जीत

प्रकाशित: 19-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
हार में जीत
लोकसभा में महिला विधेयक को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी किंतु सत्ता पक्ष को मात्र 298 वोट मिले जबकि विपक्ष ने एकजुट होकर 230 वोटों से इस विधेयक को पारित होने से रोक दिया। सीधे और सरल नजरिए से देखें तो यह सत्ता पक्ष की हार और विपक्ष की जीत है जबकि राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह मामला पेचीदा हो गया है। सत्ता पक्ष महिलाओं की सहानुभूति हासिल करने के लिए इस हार को हथियार बनाने में जुटा है।
जाहिर सी बात है कि विपक्ष उत्साहित और खुश हुआ। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने तो सरकार पर तंज भी कसा। प्रियंका ने जो बात लोकसभा में कही वही बात उन्होंने शनिवार को लोकसभा में चर्चा के दौरान भी दोहराई कि महिलाएं मूर्ख नहीं हैं। लेकिन मानना पड़ेगा कि प्रियंका को इस बात का एहसास हो गया था कि सरकार ने विपक्ष को फंसाने के लिए ही यह विधेयक पेश किया है। हारा तो हाय, हाय जीता तो जय-जय।
दरअसल मोदी सरकार की लोकसभा में 2 तिहाई बहुमत नहीं है फिर भी उन्होंने संविधान संशोधन विधेयक पेश किया तो जरूर इसका कोई न कोई कारण होगा। बस, यही बात तो विपक्ष की समझ में आ नहीं रही है। सत्ता पक्ष यह संदेश देना चाहता है कि विपक्ष महिला हितों के खिलाफ है। शनिवार को अपने राष्ट्र के नाम संदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन विधेयकों के पारित होने के बाद महिलाओं को होने वाले हितों की जो जानकारी दी और यह भी कहा कि यदि महिलाएं इन हितों से वंचित होती हैं तो इसके लिए सीधे जिम्मेदार कांग्रेस, डीएमके और टीएमसी होंगी। मजे की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में हो रहे चुनावों में भाजपा का इन्हीं पार्टियों से मुकाबला है। अब भाजपा के छोटे-बड़े नेता महिला विधेयक का नाम लेकर इन सभी पार्टियों पर निशाना साधेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहस के दौरान ही इस बात का संकेत दे दिया था कि यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो सभी को फायदा होगा किंतु यदि नहीं पारित हुआ तो उन पार्टियों को नुकसान होना तय है। अब भाजपा और उसके साथी दलों की कोशिश यही होगी कि वह एक ही बात दोहराएं कि यदि उन्हें दो तिहाई बहुमत मिला होता तो लोकसभा में यह विधेयक न गिरता।
सच तो यह है कि जब संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी तो सत्ता पक्ष के फ्लोर मैनेजरों की समझ में यह बात क्यों नहीं आई कि यदि विधेयक गिरा तो उनका उपहास होगा। इसका यही कारण है कि सरकार इस विधेयक को पेश करके विपक्ष के राजनीति का आकलन करने में लग गई। आज का विपक्ष यह नहीं समझता कि कभी-कभी उसे भी जनता में अपनी छवि को जन हितैषी साबित करने के लिए सरकार के साथ सहयोग करना भी जरूरी होता है। कई ऐसे अवसर भी आए हैं जब सत्ता और विपक्ष दोनों ने एकमत से बिल को पारित कर दिया। ऐसे मामलों में श्रेय सरकार एकतरफा नहीं ले पातीं। रही बात संविधान संशोधन को गरिमा से जोड़ना की तो यदि यह सही है तो ज्यादा से ज्यादा संविधान में संशोधन उस पार्टी ने किया जो लंबे समय से सत्ता में रह चुकी है और आज कल विपक्ष में है तो वह संविधान में संशोधन को संविधान की गरिमा का हनन बता रही है। यह एक मजाक से ज्यादा कुछ भी नहीं है। संविधान में पहला संशोधन तो 1956 में ही करके प्रेस पर आपत्तिजनक विषय वस्तु छापने पर पाबंदी लगा दी गई और 1975 में 42वें संशोधन ने तो संविधान की जान ही निकाल ली थी जिसे 1977 में फिर से कुछ अंशों का निरसन हुआ। वास्तविकता तो यह है कि संविधान में संशोधन जरूरत के मुताबिक होता है।
बहरहाल यदि सरकार चाहे कि यह विधेयक हर हाल में पारित होना ही चाहिए तो संविधान के अनुच्छेद 108 में इस बात का प्रावधान है कि सरकार संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाए और दो तिहाई बहुमत से इस महिला संबंधी विधेयक को पारित करके अपने संकल्प का प्रदर्शन कर सकती है। किंतु सरकार को तो इस हार को जीत में बदलना है, इसीलिए वह विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने के लिए हर कोशिश में व्यस्त है। कारण कि राजनीति विशुद्ध रूप से कला है जिसे कुछ सामान्य भाषा में तिगड़म भी कहा जाता है। इसलिए हार को जीत में बदलने का प्रयास और उसमें सफल होने वाला ही कुशल राजनेता माना जाता है।