पिछले 1 वर्षों में भीषण अग्निकांड और उनसे न सीख पाने की त्रासदी
प्रकाशित: 24-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग एवं एनीमेशन सेंटर में 22 जून 2026 को हुई भीषण आग की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें अधिकांश युवा छात्र थे। किकई छात्र धुएं में फंस गए, कुछ ने खिड़कियों से छलांग लगाकर जान बचाने की कोशिश की और कई दम घुटने से काल के गाल में समा गए। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि भवन में आपातकालीन निकास की व्यवस्था नहीं थी और अग्नि सुरक्षा मानकों का गंभीर उल्लंघन किया गया था। इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बार-बार होने वाले अग्निकांडों से देश कब सबक लेगा। पिछले बारह महीनों पर नजर डालें तो देश के विभिन्न हिस्सों में कई बड़े अग्निकांड हुए हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों परिवार प्रभावित हुए। इनमें अस्पताल, होटल, कोचिंग सेंटर, औद्योगिक इकाइयां, व्यापारिक प्रतिष्ठान और आवासीय भवन शामिल रहे। लगभग हर घटना के बाद जांच बैठी, मुआवजे की घोषणा हुई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बात कही गई, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो गया और सुरक्षा संबंधी कमियां जस की तस बनी रहीं। जून 2026 में दिल्ली के मालवीय नगर क्षेत्र के एक होटल में लगी भीषण आग ने 20 से अधिक लोगों की जान ले ली। इस घटना ने राजधानी में होटल सुरक्षा मानकों की पोल खोल दी। जांच में सामने आया कि कई होटलों में अग्निशमन उपकरण या तो खराब थे या उनका रखरखाव नहीं किया गया था। होटल कर्मचारियों को आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने का प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं था। यही कारण रहा कि आग लगने के बाद अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग बाहर नहीं निकल सके। इसके पहले विभिन्न राज्यों में औद्योगिक इकाइयों में भी कई बड़े अग्निकांड सामने आए। रासायनिक कारखानों, प्लास्टिक उद्योगों और गोदामों में लगी आग ने भारी जनहानि और आर्थिक नुकसान पहुंचाया। अधिकांश मामलों में पाया गया कि सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच नहीं की गई थी। कई इकाइयों में ज्वलनशील पदार्थों का भंडारण नियमों के अनुरूप नहीं था। कर्मचारियों को अग्नि सुरक्षा प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। परिणामस्वरूप छोटी सी चूक बड़े हादसे में बदल गई। अस्पतालों में लगी आग की घटनाएं भी चिंता का विषय बनी रहीं। पिछले वर्षों में कई अस्पतालों में आग लगने से मरीजों की मौत हुई थी, लेकिन इसके बावजूद अनेक अस्पतालों में फायर सेफ्टी ऑडिट समय पर नहीं हो रहे हैं। कई भवनों में निकासी मार्ग बाधित रहते हैं और बिजली व्यवस्था भी मानकों के अनुरूप नहीं होती। अस्पतालों जैसे संवेदनशील संस्थानों में ऐसी लापरवाही सीधे मानव जीवन को खतरे में डालती है। शैक्षणिक संस्थानों और कोचिंग सेंटरों में अग्नि सुरक्षा की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। वर्ष 2023 में दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित कोचिंग सेंटर में आग लगने के बाद केंद्र सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें फायर एनओसी, पर्याप्त वेंटिलेशन, आपातकालीन निकास और नियमित सुरक्षा निरीक्षण को अनिवार्य बनाया गया था। लेकिन लखनऊ की हालिया घटना ने दिखा दिया कि इन नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पाया। जिस भवन में आग लगी, वहां फायर एनओसी और सुरक्षित निकास मार्ग जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं का अभाव बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में अग्निकांडों की सबसे बड़ी वजह नियमों का कमजोर पालन है। भवन निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज किया जाता है। कई व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना आवश्यक अनुमति के संचालित होते रहते हैं। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की नियमित निगरानी नहीं होने से ऐसे संस्थान वर्षों तक चलते रहते हैं। जब कोई बड़ा हादसा होता है, तब जाकर उनकी कमियां सामने आती हैं। एक अन्य गंभीर समस्या अनधिकृत निर्माण और भवनों का गलत उपयोग है। कई आवासीय भवनों को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। संकरी गलियां, सीमित प्रवेश द्वार और बिजली के अव्यवस्थित कनेक्शन आग लगने पर खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं। लखनऊ की घटना में भी भवन की संरचना और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं। अग्निकांडों के बढ़ते मामलों में विद्युत शॉर्ट सर्किट भी प्रमुख कारण बनकर सामने आता है। अत्यधिक भार, पुराने तार, खराब उपकरण और नियमित रखरखाव की कमी से आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। गर्मी के मौसम में एयर कंडीशनर और अन्य विद्युत उपकरणों का उपयोग बढ़ने से जोखिम और अधिक हो जाता है। कई मामलों में प्रारंभिक जांच में विद्युत खराबी को आग का कारण बताया गया है। इन घटनाओं का सामाजिक प्रभाव भी गहरा होता है। किसी परिवार का युवा सदस्य, कमाने वाला व्यक्ति या पढ़ाई कर रहा छात्र जब ऐसे हादसे में जान गंवाता है तो केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के सपने टूट जाते हैं। लखनऊ में भी अधिकांश मृतक युवा छात्र थे, जो अपने भविष्य को संवारने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उनके परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। सरकारों द्वारा समय-समय पर नियम बनाए जाते हैं, लेकिन उनकी प्रभावी निगरानी और ािढयान्वयन सबसे बड़ी चुनौती है। केवल कागजों पर मौजूद सुरक्षा प्रमाणपत्र किसी हादसे को नहीं रोक सकते। नियमित निरीक्षण, जवाबदेही तय करना, दोषियों पर कठोर कार्रवाई और जनता में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। भवन मालिकों, संस्थान संचालकों और प्रशासन को समान रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी। लखनऊ का अग्निकांड केवल एक शहर या एक संस्थान की त्रासदी नहीं है। यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। पिछले बारह महीनों में हुए भीषण अग्निकांडों ने स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी का परिणाम कितना भयावह हो सकता है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।