वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

बाल तस्करी पर कठोरतम कानून की आवश्यकता

प्रकाशित: 13-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार सामने आ रही बाल तस्करी की घटनाएँ समाज और व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चेतावनी बन चुकी हैं। हाल ही में पटना-पुणे एक्सप्रेस से बिहार के अररिया जिले के 163 बच्चों को महाराष्ट्र के लातूर ले जाए जाने के दौरान कटनी रेलवे स्टेशन पर उतारा जाना इसी चिंता का एक बड़ा उदाहरण है। इन बच्चों को लेकर जा रहे आठ लोगों के विरुद्ध मानव तस्करी का मामला दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की गई है। आरोपितों का दावा था कि वे बच्चों को उनके अभिभावकों की सहमति से मदरसों में शिक्षा के लिए ले जा रहे थे, किंतु जिस प्रकार इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को एक साथ दूरस्थ स्थानों पर ले जाया जा रहा था, उसने प्रशासन को संदेह करने के लिए विवश कर दिया। यह घटना केवल एक मामला नहीं है, बल्कि उस गहरी समस्या का संकेत है, जो देश के कई हिस्सों में वर्षों से पनप रही है। बाल तस्करी केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध घोर अन्याय है। इसमें मासूम बच्चों को उनके परिवारों से दूर ले जाकर उन्हें शिक्षा, रोजगार या बेहतर जीवन के नाम पर धोखे से फंसाया जाता है और फिर उन्हें शोषण, बंधुआ मजदूरी, यौन उत्पीड़न या अवैध गतिविधियों में धकेल दिया जाता है। यह समस्या विशेष रूप से गरीब और पिछड़े क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है, जहाँ आर्थिक तंगी और जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर तस्कर आसानी से अपने जाल में बच्चों को फंसा लेते हैं। पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। वर्ष 2021 में देशभर में बाल तस्करी के लगभग 2200 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर करीब 2500 के आसपास पहुँच गई। वर्ष 2023 में भी यह आंकड़ा लगभग 2400 मामलों के आसपास रहा, जबकि वर्ष 2024 में इसमें फिर वृद्धि दर्ज की गई और लगभग 2600 मामले सामने आए। वर्ष 2025 में यह संख्या 2800 के करीब पहुँच गई।
-बाल मुकुंद ओझा,
जयपुर, राजस्थान।