वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

बिहार में बड़ा राजनीतिक परिवर्तन होने वाला है

प्रकाशित: 16-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दो दशकों का ऐतिहासिक दौर राष्ट्रीय जनता दल से अपनी राजनीतिक पारी शुरुआत करने वाले भाजपा के सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनाए जाने के साथ ही इतिहास में दर्ज हो चुका है क्योंकि नीतीश कुमार ने अपने बीस वर्ष के शानदार शासनकाल में नौ बार बिहार के मुख्यमंत्री बनकर सुशासन बाबू के रूप में अपनी पहचान बनाई थी जहां उन्होंने विकास योजनाओं से लेकर कानून व्यवस्था सुधार तक कई उपलब्धियां हासिल कीं लेकिन अब सत्ता के इस परिवर्तन के साथ बिहार में भाजपा ने ऐतिहासिक छलांग लगाई है जो कभी सहयोगी मात्र थी और आज पूर्ण सत्ता में स्थापित हो चुकी है जिससे लगता है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही बिहार में बड़ा राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तन भी होने वाला है जहां जनता दल यूनाइटेड के बारे में अब लगातार चर्चा की जा रही है कि उसका ग्राफ तेजी से गिरेगा और नीतीश कुमार के राज्यसभा चले जाने के बाद उनकी जनता दल यूनाइटेड पर पकड़ भी कमजोर हो सकती है क्योंकि सम्राट चौधरी जैसे नेता जो मूल रूप से राष्ट्रीय जनता दल की पृष्ठभूमि से आकर भाजपा में शामिल हुए हैं वे अब बिहार की सत्ता संभालने जा रहे हैं और यह बदलाव बिहार की राजनीति को पूरी तरह नया आयाम देने वाला साबित हो सकता है जहां भाजपा दक्षिणपंथी पार्टी होने के नाते शासन में है इसलिए यह भी देखना बेहद रोचक होगा कि जनता दल के साथ जुड़ा हुआ सेकुलर वोट और सेकुलर राजनेता कब तक इनके साथ रहते हैं क्योंकि बिहार की राजनीति सदैव जातीय समीकरणों और गठबंधनों पर टिकी रही है और नीतीश कुमार के जाने के बाद जनता दल यूनाइटेड की एकजुटता टूटने की आशंका बढ़ गई है जिससे कई नेता या तो भाजपा में विलय कर सकते हैं या फिर विपक्षी दलों की ओर रुख कर सकते हैं जबकि भविष्य में बिहार की राजनीति में भाजपा की मजबूत पकड़ के चलते विकास कार्यों पर जोर बढ़ सकता है लेकिन साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी गहरा हो सकता है जिससे सेकुलर वोट बैंक का पलायन तेज हो सकता है और विपक्षी राजद जैसे दल इस मौके का फायदा उठाकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करेंगे हालांकि यदि भाजपा नीतीश कुमार की नीतियों को जारी रखते हुए विकास और सुशासन को प्राथमिकता देती है तो बिहार में स्थिरता बनी रह सकती है लेकिन यदि दक्षिणपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाया गया तो गठबंधन की दरारें बढ़ सकती हैं और जनता दल यूनाइटेड पूरी तरह हाशिये पर चला जा सकता है जिससे बिहार की राजनीति दो ध्रुवों में बंट सकती है एक तरफ भाजपा का प्रभुत्व और दूसरी तरफ विपक्षी एकता का प्रयास जहां युवा मतदाताओं और अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर नई पीढ़ी का रुझान तय करेगा कि क्या बिहार वाकई नई राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है या पुरानी जाति आधारित गठबंधनों का पा फिर घूमेगा और इस पूरे परिवर्तन में यह स्पष्ट हो जाएगा कि सत्ता का केंद्र भाजपा के पास कितने समय तक बना रहता है। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा बिहार को अपना गढ़ बना पाती है या फिर नीतीश युग की विरासत को संभालते हुए नई चुनौतियों का सामना करती है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।