वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बेहद गंभीर मसला है

प्रकाशित: 20-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
यह एक मनोवैज्ञानिक ही नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दा भी है। केरल में कन्नूर डेंटल कॉलेज में एक दलित युवक नितिन राज ने जातीय और नस्लीय हिंसा से तंग आकर आत्महत्या का मामला सामने आया है। छात्र को उसकी जाति रंग रूप और आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर लगातार अपमानित किया जाता था। ऑडियो क्लिप्स में भी शिक्षकों द्वारा गाली गलौज धमकियां और मानसिक उत्पीड़न का जिक्र है जिसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने दो प्रोफेसर्स को निलंबित कर पुलिस ने एससी एसटी एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में जांच शुरू की है। यह कड़वा सच है कि देश में दलित छात्रों के साथ अन्याय किया जाता है एवं साथ भेदभाव किया जाता है। पिछले पांच वर्षों में आईआईटी एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित छात्र छात्राओं द्वारा आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं जहां जातीय भेदभाव को मुख्य वजह बताया है । पिछले पांच वर्षों में आईआईटी कानपुर, दिल्ली एवं खड़गपुर एमएल समेत कई संस्थानों में दर्जनों ऐसे मामले दर्ज हुए हैं। दलित छात्रों ने पढ़ाई के दौरान जातीय उत्पीड़न की शिकायत की, लेकिन कार्रवाई न होने पर हताश होकर आत्महत्या कर ली थी 2023 में आईआईटी बॉम्बे में दर्शन सोलंकी नामक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली जिसमें परिवार ने दोस्तों द्वारा जाति के आधार पर बहिष्कार और अपमान का आरोप लगाया हालांकि संस्थान की जांच रिपोर्ट में जातीय भेदभाव से इनकार किया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2023 तक आईआईटी में कुल 33 छात्रों ने आत्महत्या की और इनमें अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या उल्लेखनीय रही है 2014 से 2021 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में 24 अनुसूचित जाति के थे। 2016 शोधार्थी छात्र रोहित वेमुला को मजबूरन आत्महत्या करनी पड़ी थी। इसी तरह पायल थोड़ी एमबीबीएस कर रही थी उसको भी प्रताड़ना के कारण आत्महत्या करनी पड़ी थी। शिक्षा क्षेत्र में समानता लाने के लिए निरंतर निगरानी समिति बनाई जाए जो हर साल इक्विटी ऑडिट करे और रिपोर्ट सार्वजनिक करे ताकि भेदभाव की घटनाएं कम हों ताकि दलित युवा न सिर्फ शिक्षा प्राप्त करें बल्कि देश की प्रगति में पूर्ण योगदान दें। यदि उपेक्षित वर्ग शिक्षित और सशक्त नहीं होगा तो राष्ट्र की प्रगति संभव नहीं है। इन सुझावों को अमल में लाने से कुन्नूर जैसे मामले और आईआईटी उच्च संस्थानों में दलित छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं कम हो सकेंगी और शिक्षा वास्तव में समावेशी बनेगी।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली ।