युवाओं में मोबाइल की लत एक सामाजिक संकट
प्रकाशित: 13-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
विश्व स्तर पर मोबाइल फोन का उपयोग जिस तीव्र गति से बढ़ रहा है, वह आधुनिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही इसके प्रतिकूल प्रभाव भी स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं, आज लगभग हर व्यक्ति दिन में 3 घंटे से लेकर 10-15 घंटे तक मोबाइल का उपयोग कर रहा है, जिससे मानव जीवन की प्राकृतिक लय और संतुलन प्रभावित हो रहा है, स्वास्थ्य की दृष्टि से मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग आंखों की कमजोरी, सिरदर्द, नींद में कमी, मानसिक तनाव, अवसाद और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में गिरावट जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है, विशेष रूप से बच्चों और छात्रों पर इसका प्रभाव अधिक खतरनाक है क्योंकि उनका मन पढ़ाई से हटकर सोशल मीडिया, गेम्स और अन्य डिजिटल गतिविधियों में उलझ जाता है जिससे उनकी शिक्षा, स्मरण शक्ति और रचनात्मकता प्रभावित होती है। युवाओं में मोबाइल की लत एक सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है जहां वे वास्तविक जीवन के लक्ष्यों से दूर होकर आभासी दुनिया में अधिक समय बिताते हैं जिससे आत्मविश्वास में कमी और समय की बर्बादी होती है, पारिवारिक जीवन भी इससे अछूता नहीं है क्योंकि अब घर के प्रत्येक सदस्य के पास अलग-अलग मोबाइल होने से आपसी संवाद कम हो गया है और परिवार के लोग साथ होते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं जिससे संबंधों में खटास और कई बार विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है, इन सभी समस्याओं को देखते हुए यह आवश्यक हो विश्व स्तर पर मोबाइल फोन का उपयोग जिस तीव्र गति से बढ़ रहा है, वह आधुनिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही इसके प्रतिकूल प्रभाव भी स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। आज लगभग हर व्यक्ति दिन में 3 घंटे से लेकर 10-15 घंटे तक मोबाइल का उपयोग कर रहा है, जिससे मानव जीवन की प्राकृतिक लय और संतुलन प्रभावित हो रहा है, स्वास्थ्य की दृष्टि से मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग आंखों की कमजोरी, सिरदर्द, नींद में कमी, मानसिक तनाव, अवसाद और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में गिरावट जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे रहा है, विशेष रूप से बच्चों और छात्रों पर इसका प्रभाव अधिक खतरनाक है क्योंकि उनका मन पढ़ाई से हटकर सोशल मीडिया, गेम्स और अन्य डिजिटल गतिविधियों में उलझ जाता है जिससे उनकी शिक्षा, स्मरण शक्ति और रचनात्मकता प्रभावित होती है, युवाओं में मोबाइल की लत एक सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है जहां वे वास्तविक जीवन के लक्ष्यों से दूर होकर आभासी दुनिया में अधिक समय बिताते हैं जिससे आत्मविश्वास में कमी और समय की बर्बादी होती है।
भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष एक साक्ष्य-आधारित विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहिए जिसमें मोबाइल के दुष्परिणामों, स्वास्थ्य पर प्रभाव और सामाजिक बदलाव के आंकड़े शामिल हों ताकि इस विषय को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिल सके, संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि वह विश्व मोबाइल मुक्त दिवस घोषित करके पूरी दुनिया में जागरूकता फैला सकता है, विभिन्न देशों को इस दिशा में नीतियां बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष एक साक्ष्य-आधारित विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत करना चाहिए जिसमें मोबाइल के दुष्परिणामों, स्वास्थ्य पर प्रभाव और सामाजिक बदलाव के आंकड़े शामिल हों ताकि इस विषय को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिल सके, संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि वह विश्व मोबाइल मुक्त दिवस घोषित करके पूरी दुनिया में जागरूकता फैला सकता है, विभिन्न देशों को इस दिशा में नीतियां बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।