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सरकार विपक्ष का विश्वास जीतने में सफल नहीं हो सकी

प्रकाशित: 19-04-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
संसद में महिला आरक्षण बिल से संबंधित व्यवस्था को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से आयोजित विशेष सत्र के अपेक्षित परिणाम न आने से देश की करोड़ों महिलाओं में स्वाभाविक रूप से निराशा का भाव उत्पन्न हुआ है। लगभग तीन दशकों के लंबे इंतजार के बाद वर्ष 2023 में यह ऐतिहासिक विधेयक संसद से पारित हुआ था और इसकी अधिसूचना जारी होने के साथ ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर एक नई आशा जगी थी, किंतु हालिया घटपाम ने उस आशा को असमंजस और अनिश्चितता में बदल दिया है। 16 अप्रैल से 18 अप्रैल तक चले संसद के विशेष सत्र का उद्देश्य महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़ी प्रािढयात्मक और व्यवस्थागत बाधाओं को दूर करना था, जिसमें परिसीमन और अन्य तकनीकी पहलू भी शामिल थे, परंतु आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का अभाव इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया। यह केवल संख्यात्मक विफलता नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवाद और समन्वय की कमी का भी संकेत है। सरकार विपक्ष का विश्वास जीतने में सफल नहीं हो सकी, वहीं विपक्षी दलों का रुख भी पूरी तरह रचनात्मक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन्होंने जातिगत जनगणना के बाद ही परिसीमन लागू करने की शर्त को प्रमुख मुद्दा बनाते हुए प्रािढया को आगे बढ़ाने में सहयोग नहीं दिया। इस पूरे विवाद में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा, जिसमें सरकार ने विपक्ष को महिला विरोधी बताने का प्रयास किया, जबकि विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। परिणामस्वरूप यह महत्वपूर्ण सामाजिक और लोकतांत्रिक सुधार का विषय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अविश्वास की भेंट चढ़ गया। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि इस टकराव का सीधा प्रभाव देश की महिलाओं पर पड़ा है, जिनकी राजनीतिक भागीदारी को सशक्त बनाने का एक बड़ा अवसर फिलहाल टलता नजर आ रहा है। लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब उसमें समाज के सभी वर्गों की समान और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो और महिलाओं को आरक्षण देना इसी दिशा में एक आवश्यक कदम है। इसलिए यह अपेक्षा की जाती है कि सभी राजनीतिक दल संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर इस विषय पर सार्थक संवाद स्थापित करें और एक ऐसी सहमति का निर्माण करें जो न केवल विधेयक को लागू करने का मार्ग प्रशस्त करे बल्कि देश की आधी आबादी को उनका उचित प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करे। मेरा मानना है कि विपक्ष और पक्ष दोनों को यह कोशिश करनी चाहिए कि जितना जल्दी हो सके महिला आरक्षण बिल को लागू किया जाए। वर्तमान लोकसभा और राज्यसभा के प्रतिनिधियों की संख्या के अनुरूप 33फीसदी आरक्षण दिया जाए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।