मिडिल ईस्ट में जंग से भारत के पोर्ट पर भारी जाम, 4 लाख टन बासमती चावल, 5400 टन प्याज समेत करोड़ों का माल समुद्र में फंसा
प्रकाशित: 07-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
मुंबई:
मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक व्यापार मार्गों को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और पर्शियन गल्फ से गुजरने वाली सप्लाई चेन को. इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर अब भारत के पश्चिमी तटीय व्यापार गलियारों पर दिखने लगा है. जेएनपीटी (नवी मुंबई) और मुंद्रा पोर्ट (गुजरात) पर लॉजिस्टिक जाम गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है.
युद्ध के चलते प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने बुकिंग रोक दी है और जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रूट पर मोड़ दिया है.इसके कारण हजारों कंटेनर, जिनमें उच्च-मूल्य के कृषि और औद्योगिक उत्पाद भरे हैं, भारत के बंदरगाहों पर फंस गए हैं. इसका असर घरेलू बाजारों, खासकर वाशी APMC में 'रिवर्स-फ्लो क्राइसिस' के रूप में दिख रहा है, जहां निर्यात के लिए तैयार माल वापस बाजार में आ रहा है.
भारत से निर्यात का भारी बैकलॉग, कृषि उत्पाद सबसे ज्यादा प्रभावित
भारत से मिडिल ईस्ट जाने वाले माल की सबसे ज्यादा मार कृषि उत्पादों पर पड़ी है. वर्तमान में बंदरगाहों और ट्रांज़िट में फंसे निर्यात का अनुमान इस प्रकार है:
•
बासमती चावल: 4 लाख टन (2 लाख टन भारतीय बंदरगाहों पर, 2 लाख टन ट्रांज़िट में)
• ताजा अंगूर: 5,000–6,000 टन (300+ कंटेनर)
• प्याज: 5,400 टन (150–200 कंटेनर, मुख्यतः नासिक से)
• केला और अनार: 1,000+ रीफ़र यूनिट्स में सैकड़ों टन
• फ्रोजन बफेलो मीट: 300+ पेरिशेबल कंटेनर में बड़ी मात्रा
• कुल मिडिल ईस्ट-बाउंड कंटेनर: 23,000 यूनिट्स विभिन्न पश्चिमी बंदरगाहों पर फंसे
आयात में देरी और उद्योग पर संकट
• निर्यात के साथ-साथ, आयातित औद्योगिक और आवश्यक उत्पादों पर भी गंभीर असर पड़ा है.
• सल्फर और जिप्सम: 3 लाख टन शिपमेंट देरी में
• ड्राई फ्रूट्स और खजूर: 600-700 कंटेनर बंदर अब्बास जैसे हब पर अटके
• LPG: 5 बड़े कैरियर जहाज़ों को मोड़ा गया या पोस्टपोन किया गया
• ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: भारत के 85% LPG और 55% LNG आयात होर्मुज रूट पर निर्भर हैं
ऊर्जा आपूर्ति में यह व्यवधान घरेलू गैस कीमतों और उद्योगों की लागत बढ़ने का जोखिम पैदा कर रहा है.
वाशी APMC में दाम गिरे, जेएनपीटी पर 5,000 कंटेनर जमीन पर खड़े
मिडिल ईस्ट निर्यात बंद होने से किसानों और व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ी है. वाशी APMC में केला 25 रु./किलो से गिरकर 15 रु./किलो हो गया. निर्यात न जा पाने से थोक बाज़ार में अतिरिक्त स्टॉक पहुंचा. एक्सपोर्टर्स को जेएनपीटी पर प्रति कंटेनर 8,500 रुपये प्रतिदिन बिजली (plug-in) और स्टोरेज चार्ज के रूप में देना पड़ रहा है. जेएनपीटी पर 5,000 से अधिक कंटेनर ग्राउंडेड, पार्किंग प्लाज़ा और टर्मिनल भरे हुए हैं.
मिडिल ईस्ट के युद्ध ने भारत की सप्लाई चेन को गहरे संकट में डाल दिया है. यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा, तो कृषि निर्यात, उद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक व्यापार मार्गों को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और पर्शियन गल्फ से गुजरने वाली सप्लाई चेन को. इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर अब भारत के पश्चिमी तटीय व्यापार गलियारों पर दिखने लगा है. जेएनपीटी (नवी मुंबई) और मुंद्रा पोर्ट (गुजरात) पर लॉजिस्टिक जाम गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है.
युद्ध के चलते प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने बुकिंग रोक दी है और जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रूट पर मोड़ दिया है.इसके कारण हजारों कंटेनर, जिनमें उच्च-मूल्य के कृषि और औद्योगिक उत्पाद भरे हैं, भारत के बंदरगाहों पर फंस गए हैं. इसका असर घरेलू बाजारों, खासकर वाशी APMC में 'रिवर्स-फ्लो क्राइसिस' के रूप में दिख रहा है, जहां निर्यात के लिए तैयार माल वापस बाजार में आ रहा है.
भारत से निर्यात का भारी बैकलॉग, कृषि उत्पाद सबसे ज्यादा प्रभावित
भारत से मिडिल ईस्ट जाने वाले माल की सबसे ज्यादा मार कृषि उत्पादों पर पड़ी है. वर्तमान में बंदरगाहों और ट्रांज़िट में फंसे निर्यात का अनुमान इस प्रकार है:
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बासमती चावल: 4 लाख टन (2 लाख टन भारतीय बंदरगाहों पर, 2 लाख टन ट्रांज़िट में)
• ताजा अंगूर: 5,000–6,000 टन (300+ कंटेनर)
• प्याज: 5,400 टन (150–200 कंटेनर, मुख्यतः नासिक से)
• केला और अनार: 1,000+ रीफ़र यूनिट्स में सैकड़ों टन
• फ्रोजन बफेलो मीट: 300+ पेरिशेबल कंटेनर में बड़ी मात्रा
• कुल मिडिल ईस्ट-बाउंड कंटेनर: 23,000 यूनिट्स विभिन्न पश्चिमी बंदरगाहों पर फंसे
आयात में देरी और उद्योग पर संकट
• निर्यात के साथ-साथ, आयातित औद्योगिक और आवश्यक उत्पादों पर भी गंभीर असर पड़ा है.
• सल्फर और जिप्सम: 3 लाख टन शिपमेंट देरी में
• ड्राई फ्रूट्स और खजूर: 600-700 कंटेनर बंदर अब्बास जैसे हब पर अटके
• LPG: 5 बड़े कैरियर जहाज़ों को मोड़ा गया या पोस्टपोन किया गया
• ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: भारत के 85% LPG और 55% LNG आयात होर्मुज रूट पर निर्भर हैं
ऊर्जा आपूर्ति में यह व्यवधान घरेलू गैस कीमतों और उद्योगों की लागत बढ़ने का जोखिम पैदा कर रहा है.
वाशी APMC में दाम गिरे, जेएनपीटी पर 5,000 कंटेनर जमीन पर खड़े
मिडिल ईस्ट निर्यात बंद होने से किसानों और व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ी है. वाशी APMC में केला 25 रु./किलो से गिरकर 15 रु./किलो हो गया. निर्यात न जा पाने से थोक बाज़ार में अतिरिक्त स्टॉक पहुंचा. एक्सपोर्टर्स को जेएनपीटी पर प्रति कंटेनर 8,500 रुपये प्रतिदिन बिजली (plug-in) और स्टोरेज चार्ज के रूप में देना पड़ रहा है. जेएनपीटी पर 5,000 से अधिक कंटेनर ग्राउंडेड, पार्किंग प्लाज़ा और टर्मिनल भरे हुए हैं.
मिडिल ईस्ट के युद्ध ने भारत की सप्लाई चेन को गहरे संकट में डाल दिया है. यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा, तो कृषि निर्यात, उद्योगिक उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है.