अब नहीं तो महिलाओं को कब मिलेगा 33 फीसदी आरक्षण, क्या 2034 से पहले संभव है?
प्रकाशित: 18-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली:
पहले ही बहुत देर हो चुकी थी अब और कितना इंतजार? 31वां संशोधन बिल लोकसभा से पास नहीं हो सका. घंटों लंबी बहस और मतभेदों के बीच शुक्रवार को यह बिल लोकसभा में गिर गया. सरकार को बिल को पास करवाने के लिए दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी. लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े. विरोध में 230 वोट पड़े, जो दो तिहाई से बहुत कम हैं. इस बिल को पास करवाने की मोदी सरकार की हर कोशिश नाकाम साबित हुआ. पीएम मोदी की अंतरआत्मा की आवााज सुनने वाली अपील भी कुछ खास असर नहीं दिखा पाई. अब सवाल यह है कि अब नहीं तो महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण कब मिलेगा. क्या महिलाओं के लिए कोटा 2034 से पहले संभव हो पाएगा. या फिर बीच की कोई और राह अभी भी निकल सकती है?
महिला आरक्षण बिल फिलहाल तो ठंडे बस्ते में चला गया है. ये कह पाना मुश्किल है कि बिल अब कब लागू पाएगा. मान लीजिए कि सरकार और विपक्ष के बीच आने वाले समय में बिल पर कोई सहमति बन जाती है फिर भी महिला आरक्षण 2034 के लोकसभा चुनाव के पहले लागू होना मुश्किल लगता है.
क्या अब 2034 के पहले महिला कोटा संभव होगा?
2023 के मूल कानून के हिसाब से संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी लागू होना था, जब अगली जनगणना पूरी हो जाए. मतलब यह कि यह 2034 से पहले लागू होना मुश्किल लगता है. वजह ये है कि अभी जनगणना चल रही है. इसे पूरा होने में वक्त लगेगा. इसके बाद सीटों का डिलिमिटेशन यानी कि नया बंटवारा भी होगा.जबकि नए बिलों के हिसाब से महिला आरक्षण को 2029 तक लागू होना था. इसके लिए सीटों का बंटवारा 2011 की जनगणना के आधार किया जाना था. लेकिन ये हो नहीं सका.
मोदी सरकार के सामने अब क्या विकल्प?
केंद्र सरकार 31वें संशोधन बिल में दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ाने जैसे कुछ बदलाव कर सकती है. मतलब यह कि 2011 के बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाया जाए. इसके बाद बिल को नए सिरे से पेश किया जाए. सहमति बनाने के लिए विपक्ष के सुझाव लिए जाएं.
ओबीसी कोटे से क्यों हिचक रही है बीजेपी?
कई विश्लेषणों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा. फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं.महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008–2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे. यही पुरानी खाई 2023–26 की बहस में भी दिखाई दी. बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है. विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाज़ा खोलती है तो सीट–शेयर, 50% कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है.
ओबीसी कोटे से क्यों हिचक रही है बीजेपी?
कई विश्लेषणों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा. फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं.महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008–2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे. यही पुरानी खाई 2023–26 की बहस में भी दिखाई दी. बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है. विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाज़ा खोलती है तो सीट–शेयर, 50% कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है.
विपक्ष लगातार ओबीसी महिलाओं के अलग कोटे की मांग कर रहा है. वह आरोप लगा रहा है कि बीजेपी महिला आरक्षण का क्रेडिट तो लेना चाहती है लेकिन ओबीसी महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी देने से बच रही है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसलों में कहा है कि कुल आरक्षण 50% से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता और ओबीसी कोटा के लिए “समकालीन, भरोसेमंद तथ्यात्मक डेटा” ज़रूरी है. यही तर्क राष्ट्रीय स्तर पर भी उठेगा.
क्या जातिगत जनगणना के बगैर संभव है ओबीसी कोटा?
संसद चाहे तो संविधान में संशोधन कर लोकसभा-विधानसभाओं में ओबीसी वर्ग के लिए राजनीतिक आरक्षण और उसमें से ओबीसी महिलाओं का उप-कोटा तय कर सकती है. भले ही नई जातिगत जनगणना पूरी नहीं हुई हो. संविधान किसी विशेष डेटा स्रोत को अनिवार्य नहीं ठहराता.लेकिन किस जाति समूह को कितना हिस्सा मिलेगा, इसका आधार तय करने के लिए ठोस, नए और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य जातिगत आंकड़े जरूरी होंगे. वरना अदालतों में इसे मनमाना मानकर चुनौती दी जा सकती है.
पहले ही बहुत देर हो चुकी थी अब और कितना इंतजार? 31वां संशोधन बिल लोकसभा से पास नहीं हो सका. घंटों लंबी बहस और मतभेदों के बीच शुक्रवार को यह बिल लोकसभा में गिर गया. सरकार को बिल को पास करवाने के लिए दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी. लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े. विरोध में 230 वोट पड़े, जो दो तिहाई से बहुत कम हैं. इस बिल को पास करवाने की मोदी सरकार की हर कोशिश नाकाम साबित हुआ. पीएम मोदी की अंतरआत्मा की आवााज सुनने वाली अपील भी कुछ खास असर नहीं दिखा पाई. अब सवाल यह है कि अब नहीं तो महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण कब मिलेगा. क्या महिलाओं के लिए कोटा 2034 से पहले संभव हो पाएगा. या फिर बीच की कोई और राह अभी भी निकल सकती है?
महिला आरक्षण बिल फिलहाल तो ठंडे बस्ते में चला गया है. ये कह पाना मुश्किल है कि बिल अब कब लागू पाएगा. मान लीजिए कि सरकार और विपक्ष के बीच आने वाले समय में बिल पर कोई सहमति बन जाती है फिर भी महिला आरक्षण 2034 के लोकसभा चुनाव के पहले लागू होना मुश्किल लगता है.
क्या अब 2034 के पहले महिला कोटा संभव होगा?
2023 के मूल कानून के हिसाब से संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी लागू होना था, जब अगली जनगणना पूरी हो जाए. मतलब यह कि यह 2034 से पहले लागू होना मुश्किल लगता है. वजह ये है कि अभी जनगणना चल रही है. इसे पूरा होने में वक्त लगेगा. इसके बाद सीटों का डिलिमिटेशन यानी कि नया बंटवारा भी होगा.जबकि नए बिलों के हिसाब से महिला आरक्षण को 2029 तक लागू होना था. इसके लिए सीटों का बंटवारा 2011 की जनगणना के आधार किया जाना था. लेकिन ये हो नहीं सका.
मोदी सरकार के सामने अब क्या विकल्प?
केंद्र सरकार 31वें संशोधन बिल में दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ाने जैसे कुछ बदलाव कर सकती है. मतलब यह कि 2011 के बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाया जाए. इसके बाद बिल को नए सिरे से पेश किया जाए. सहमति बनाने के लिए विपक्ष के सुझाव लिए जाएं.
ओबीसी कोटे से क्यों हिचक रही है बीजेपी?
कई विश्लेषणों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा. फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं.महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008–2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे. यही पुरानी खाई 2023–26 की बहस में भी दिखाई दी. बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है. विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाज़ा खोलती है तो सीट–शेयर, 50% कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है.
ओबीसी कोटे से क्यों हिचक रही है बीजेपी?
कई विश्लेषणों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा. फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं.महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008–2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे. यही पुरानी खाई 2023–26 की बहस में भी दिखाई दी. बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है. विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाज़ा खोलती है तो सीट–शेयर, 50% कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है.
विपक्ष लगातार ओबीसी महिलाओं के अलग कोटे की मांग कर रहा है. वह आरोप लगा रहा है कि बीजेपी महिला आरक्षण का क्रेडिट तो लेना चाहती है लेकिन ओबीसी महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी देने से बच रही है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसलों में कहा है कि कुल आरक्षण 50% से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता और ओबीसी कोटा के लिए “समकालीन, भरोसेमंद तथ्यात्मक डेटा” ज़रूरी है. यही तर्क राष्ट्रीय स्तर पर भी उठेगा.
क्या जातिगत जनगणना के बगैर संभव है ओबीसी कोटा?
संसद चाहे तो संविधान में संशोधन कर लोकसभा-विधानसभाओं में ओबीसी वर्ग के लिए राजनीतिक आरक्षण और उसमें से ओबीसी महिलाओं का उप-कोटा तय कर सकती है. भले ही नई जातिगत जनगणना पूरी नहीं हुई हो. संविधान किसी विशेष डेटा स्रोत को अनिवार्य नहीं ठहराता.लेकिन किस जाति समूह को कितना हिस्सा मिलेगा, इसका आधार तय करने के लिए ठोस, नए और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य जातिगत आंकड़े जरूरी होंगे. वरना अदालतों में इसे मनमाना मानकर चुनौती दी जा सकती है.