नारी शक्ति वंदन विधेयक: आसान नहीं राह, संसद के आंकड़ों में उलझा बड़ा फैसला
प्रकाशित: 17-04-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
संसद के विशेष सत्र की शुरुआत के साथ ही महिला आरक्षण से जुड़ा नारी शक्ति वंदन विधेयक और परिसीमन का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसके प्रावधानों और समय को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है। ऐसे में यह विधेयक सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों की बड़ी परीक्षा बन गया है।
लोकसभा में इस विधेयक को संविधान संशोधन के रूप में पेश किया गया, जिस पर तीखी बहस भी हुई। विपक्ष ने मत विभाजन की मांग की, जिसके बाद 251 सांसदों ने इसके पक्ष में और 185 ने विरोध में वोट दिया। इसके साथ ही परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेश कानून में संशोधन से जुड़े अन्य विधेयक भी पेश किए गए।
चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत नहीं, बल्कि विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यानी सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन जरूरी है। यही शर्त इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है।
लोकसभा के मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रभावी सदस्य संख्या लगभग 540 मानी जा रही है, जिसमें दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 360 बैठता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास 293 सांसद हैं, जो बहुमत तो है, लेकिन विशेष बहुमत से कम है। विपक्ष के पास करीब 233 सांसद हैं, जबकि कुछ निर्दलीय और छोटे दलों के सांसद अभी स्पष्ट रुख में नहीं हैं।
ऐसी स्थिति में विधेयक के पारित होने के लिए सरकार को विपक्ष के कुछ दलों का समर्थन या उनकी अनुपस्थिति की जरूरत पड़ सकती है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक जैसे दल इस समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रेस के पास भी उल्लेखनीय संख्या में सांसद हैं, जिससे उसका रुख निर्णायक बनता है।
राज्यसभा की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। यहां एनडीए के पास बहुमत के करीब संख्या है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का सहयोग जरूरी होगा। बीआरएस, बीजद, वाईएसआरसीपी और बसपा जैसे दलों का रुख इस पूरे मामले में संतुलन बना सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है और इसका विरोध राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, नारी शक्ति वंदन विधेयक की राह केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पर नहीं, बल्कि संसद के जटिल संख्या गणित और दलों की रणनीति पर निर्भर करती है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह ऐतिहासिक पहल आसानी से पारित होती है या सियासी खींचतान में उलझ जाती है।
लोकसभा में इस विधेयक को संविधान संशोधन के रूप में पेश किया गया, जिस पर तीखी बहस भी हुई। विपक्ष ने मत विभाजन की मांग की, जिसके बाद 251 सांसदों ने इसके पक्ष में और 185 ने विरोध में वोट दिया। इसके साथ ही परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेश कानून में संशोधन से जुड़े अन्य विधेयक भी पेश किए गए।
चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत नहीं, बल्कि विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यानी सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन जरूरी है। यही शर्त इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है।
लोकसभा के मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रभावी सदस्य संख्या लगभग 540 मानी जा रही है, जिसमें दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 360 बैठता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास 293 सांसद हैं, जो बहुमत तो है, लेकिन विशेष बहुमत से कम है। विपक्ष के पास करीब 233 सांसद हैं, जबकि कुछ निर्दलीय और छोटे दलों के सांसद अभी स्पष्ट रुख में नहीं हैं।
ऐसी स्थिति में विधेयक के पारित होने के लिए सरकार को विपक्ष के कुछ दलों का समर्थन या उनकी अनुपस्थिति की जरूरत पड़ सकती है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक जैसे दल इस समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रेस के पास भी उल्लेखनीय संख्या में सांसद हैं, जिससे उसका रुख निर्णायक बनता है।
राज्यसभा की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। यहां एनडीए के पास बहुमत के करीब संख्या है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का सहयोग जरूरी होगा। बीआरएस, बीजद, वाईएसआरसीपी और बसपा जैसे दलों का रुख इस पूरे मामले में संतुलन बना सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है और इसका विरोध राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, नारी शक्ति वंदन विधेयक की राह केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पर नहीं, बल्कि संसद के जटिल संख्या गणित और दलों की रणनीति पर निर्भर करती है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह ऐतिहासिक पहल आसानी से पारित होती है या सियासी खींचतान में उलझ जाती है।