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अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने जैसा बोया वैसा काटा

प्रकाशित: 18-10-2025 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने जैसा बोया वैसा काटा
कहावत है कि जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान पर भी यह कहावत सौ फीसदी फिट बैठती है। कभी अफगानिस्तान को अपनी मुट्ठी में समझने वाला पाकिस्तान आज अगर किसी देश से सबसे ज्यादा परेशान है तो वह देश और कोई नहीं बल्कि अफगानिस्तान ही है। दोनों देश सुन्नी इस्लामिक हैं। ऐसे में पाकिस्तान का मुस्लिम उम्माह वाला कांसेप्ट अफगानिस्तान पर फिट बैठना चाहिए। लेकिन हो रहा है उससे बिल्कुल उल्टा। अफगानिस्तान भारत की बाहों में बाहें डालकर खड़ा है और पाकिस्तान ने उसे दंडित करने के लिए उस पर स्ट्राइक कर दी। अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल इस विवाद की जड़ें अंग्रेजों की देन हैं। भारत की सीमा अफगानिस्तान से लगती थी और अफगानिस्तान की सीमा रूस से मिलती थी। अंग्रेज सोचते थे कि यदि भविष्य में अफगानिस्तान को पार कर उनका कट्टर दुश्मन सोवियत संघ भारत से मिल गया तो न केवल उनकी परेशानी बढ़ेगी बल्कि पश्चिमी ताकतों का वैश्विक प्रभाव भी कम हो जाएगा। इसलिए उन्होंने रूस और भारत के बीच अफगानिस्तान के अलावा एक और देश पाकिस्तान बना दिया। अंग्रेजें ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा निर्धारण के लिए एक सीमा रेखा खींची जिसे डूरंड लाइन कहा गया। यह सीमा आज भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद का सबसे बड़ा विषय है क्योंकि यह सीमा रेखा उस क्षेत्र में रहने वाले पश्तूनों की आबादी के बीच में से बांटती है। इसका असर यह हुआ कि वहां रहने वाले लोग भी बंट गए। पश्तूनों की कुछ आबादी पाकिस्तान में और कुछ आबादी अफगानिस्तान में रह गई। पश्तून उसे फर्जी सीमा रेखा करार देते हैं। पाकिस्तान की सरकार और सेना से नाखुश पाकिस्तानी पश्तून भी इस सीमा रेखा के खिलाफ हैं। जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला कर उसे अपने कब्जे में लिया तो अमेरिका ने उसे वहां से निकालने के लिए पाकिस्तान की सहायता ली। इसका परिणाम यह हुआ कि सोवियत संघ को अफगानिस्तान छोड़कर वापस जाना पड़ा। मुजाहिदीन सोवियत समर्थित सरकार को हटाकर सत्ता पर काबिज होने में सफल हो गए। इस बीच वहां कई गुट बन गए थे। जिनमें आपस में गृहयुद्ध छिड़ गया। वर्ष 2001 में अमेरिकी आक्रमण के बाद उन्हें हटा दिया गया। वर्ष 2021 में एक बार फिर इतिहास ने खुद को दोहराया और तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। तालिबान शब्द तालिब से बना है जिसका अर्थ होता है विद्यार्थी। विद्यार्थियों के समूह को तालिबान कहा गया। अफगानिस्तान में तालिबान के पिछले चार साल के कार्यकाल को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह सरकार पिछली मुजाहिदीन सरकार के मुकाबले ज्यादा परिपक्व है। वह पाकिस्तान के झांसे में नहीं आ रही है। पाकिस्तान की चिंता का यही कारण है। पाकिस्तान सोचता था कि वह अफगान लड़ाकों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर उसे परेशान करेगा। इसके विपरीत तालिबान सरकार भारत से कैसा संबंध बनाना चाहती है इसका खुलासा अफगानिस्तान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा से मिल गया। पाकिस्तान की समझ में आ गया है कि अब उसे दो फ्रंट पर जूझना होगा। पूर्वी सीमा पर भारत से और पश्चिमी सीमा पर अफगानिस्तान से। आर्थिक रूप से लगभग कंगाल पाकिस्तान के लिए यह किसी बुरे सपने के सच होने जैसा है। हिलेरी क्लिंटन की वह बात पाकिस्तान को आज अवश्य याद आ रही होगी जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर आप अपने पिछवाड़े सांप पालोगे तो एक दिन वह आपको भी काटेंगे। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो नेता तो मुस्लिम देशों का बनना चाहता है लेकिन अपने फायदे के लिए मुस्लिम देशों को भी धोखा देने से नहीं चूकता। वह मुस्लिम कट्टरपंथ का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता है। एक राजनीतिक विश्लेषक उसे मुस्लिम कौम का दुश्मन बताते हुए कहते हैं कि यदि जल्द ही पाकिस्तान ने अपनी नीतियां नहीं बदली तो हम भविष्य में वहां कई नए देश देखेंगे।