अमेरिका-ईरान युद्ध से चीन-रूस के आगे उपजी चुनौतियां
प्रकाशित: 08-03-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
जैसे-जैसे अमेरिका और इजराइल का ईरान के साथ युद्ध बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे पूरी दुनिया के सामने इसके दुष्परिणाम आने शुरू हो गए हैं। एक ओर जहां आने वाले समय में इस युद्ध के चलते दुनियाभर में आर्थिक संकट के गहराने की आशंका तेज हो गई है तो वहीं दूसरी ओर दूसरे और तीसरे नंबर की सैन्य विश्व शक्तियों रूस व चीन के समक्ष कई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। यदि जल्दी ही इस समस्या का कोई हल नहीं निकला तो आने वाले समय में विश्व युद्ध की आशंका स्वभाविक है। ईरान ने इसकी शुरुआत खाड़ी के कई देशों पर हमला करने के बाद होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को बाधित करके कर दी है। सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि मध्य-पूर्व में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो इसका असर उन दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा जो चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं। आमतौर पर चीन दूसरे देशों के संघर्ष में नहीं पड़ता। उसकी नीति अघोषित रूप से ऐसे संघर्षों से दूरी बनाए रखने की रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चीन मध्य-पूर्व की घटनाओं से ज्यादा चिंतित नहीं है। चीन ने इस पर अपेक्षाकृत हल्की प्रतिािढया दी और युद्धविराम की अपील की। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमले को मंजूर नहीं किया जा सकता। किसी संप्रभु देश के नेता की हत्या कर शासन परिवर्तन की कोशिश करना तो बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। दरअसल वेनेजुएला और ईरान की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि चीन बड़े स्तर की आर्थिक ताकत तो जरूर है लेकिन अमेरिका के स्तर की सैन्य सुपर पावर नहीं है। इसी के चलते चीन दोनों मामलों में महज मूकदर्शक बनकर रह गया और अपने सहयोगियों की उम्मीद के मुताबिक उनकी मदद नहीं कर सका। ईरान के बहाने अमेरिका चीन को उसकी हैसियत याद दिला रहा है। उल्लेखनीय है कि चीन वेनेजुएला, ईरान और रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता ाtढड ऑयल खरीदता था। अमेरिका उसकी इस सप्लाई लाइन को काटकर चीन पर आर्थिक चोट करने की कोशिश कर रहा है। इस बात को चीन भी बखूबी जानता है। यही कारण है कि वह पहले न तो वेनेजुएला और अब न ही ईरान के मामले में खुलकर सामने आया है। चीन इस बात का इंतजार कर रहा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी नाटो देश ईरान में लम्बे सैन्य संघर्ष में फंस जाएं। इससे अमेरिका का ध्यान चीन से हट जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो उसे ताइवान के मसले पर भी कुछ बढ़त मिल सकती है। यही हाल रूस का भी है। यदि अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी ईरान में उलझे तो वह पोन की पैसे और हथियारों से ज्यादा मदद नहीं कर पाएंगे। इससे पोन में रूस की राह कुछ आसान हो सकती है। रूस भी अपनी छवि को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास कर रहा है। अमेरिका ने ईरान से पहले सीरिया और वेनेजुएला में रूस समर्थित सरकारों की सत्ता पलट दी और रूस कुछ नहीं कर पाया। यदि रूस अपने दोस्त देशों को अमेरिका से बचा नहीं पाएगा तो कौन सा देश उसके पीछे खड़े होने का जोखिम मोल लेगा। रूस के सामने दुनिया में अपना वही स्थान प्राप्त करने की चुनौती है जो कभी सोवियत संघ के जमाने में था। अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से उसकी अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई आसान नहीं है। अमेरिका ने बता दिया है कि दुनिया का सुपर बॉस वही है। देखते है कि रूस-चीन अमेरिका द्वारा दी गई चुनौतियों से कैसे निपट पाते हैं या निपट भी पाते हैं या नहीं।
जैसे-जैसे अमेरिका और इजराइल का ईरान के साथ युद्ध बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे पूरी दुनिया के सामने इसके दुष्परिणाम आने शुरू हो गए हैं। एक ओर जहां आने वाले समय में इस युद्ध के चलते दुनियाभर में आर्थिक संकट के गहराने की आशंका तेज हो गई है तो वहीं दूसरी ओर दूसरे और तीसरे नंबर की सैन्य विश्व शक्तियों रूस व चीन के समक्ष कई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। यदि जल्दी ही इस समस्या का कोई हल नहीं निकला तो आने वाले समय में विश्व युद्ध की आशंका स्वभाविक है। ईरान ने इसकी शुरुआत खाड़ी के कई देशों पर हमला करने के बाद होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को बाधित करके कर दी है। सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि मध्य-पूर्व में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो इसका असर उन दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा जो चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं। आमतौर पर चीन दूसरे देशों के संघर्ष में नहीं पड़ता। उसकी नीति अघोषित रूप से ऐसे संघर्षों से दूरी बनाए रखने की रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चीन मध्य-पूर्व की घटनाओं से ज्यादा चिंतित नहीं है। चीन ने इस पर अपेक्षाकृत हल्की प्रतिािढया दी और युद्धविराम की अपील की। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमले को मंजूर नहीं किया जा सकता। किसी संप्रभु देश के नेता की हत्या कर शासन परिवर्तन की कोशिश करना तो बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। दरअसल वेनेजुएला और ईरान की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि चीन बड़े स्तर की आर्थिक ताकत तो जरूर है लेकिन अमेरिका के स्तर की सैन्य सुपर पावर नहीं है। इसी के चलते चीन दोनों मामलों में महज मूकदर्शक बनकर रह गया और अपने सहयोगियों की उम्मीद के मुताबिक उनकी मदद नहीं कर सका। ईरान के बहाने अमेरिका चीन को उसकी हैसियत याद दिला रहा है। उल्लेखनीय है कि चीन वेनेजुएला, ईरान और रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता ाtढड ऑयल खरीदता था। अमेरिका उसकी इस सप्लाई लाइन को काटकर चीन पर आर्थिक चोट करने की कोशिश कर रहा है। इस बात को चीन भी बखूबी जानता है। यही कारण है कि वह पहले न तो वेनेजुएला और अब न ही ईरान के मामले में खुलकर सामने आया है। चीन इस बात का इंतजार कर रहा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी नाटो देश ईरान में लम्बे सैन्य संघर्ष में फंस जाएं। इससे अमेरिका का ध्यान चीन से हट जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो उसे ताइवान के मसले पर भी कुछ बढ़त मिल सकती है। यही हाल रूस का भी है। यदि अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी ईरान में उलझे तो वह पोन की पैसे और हथियारों से ज्यादा मदद नहीं कर पाएंगे। इससे पोन में रूस की राह कुछ आसान हो सकती है। रूस भी अपनी छवि को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास कर रहा है। अमेरिका ने ईरान से पहले सीरिया और वेनेजुएला में रूस समर्थित सरकारों की सत्ता पलट दी और रूस कुछ नहीं कर पाया। यदि रूस अपने दोस्त देशों को अमेरिका से बचा नहीं पाएगा तो कौन सा देश उसके पीछे खड़े होने का जोखिम मोल लेगा। रूस के सामने दुनिया में अपना वही स्थान प्राप्त करने की चुनौती है जो कभी सोवियत संघ के जमाने में था। अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से उसकी अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई आसान नहीं है। अमेरिका ने बता दिया है कि दुनिया का सुपर बॉस वही है। देखते है कि रूस-चीन अमेरिका द्वारा दी गई चुनौतियों से कैसे निपट पाते हैं या निपट भी पाते हैं या नहीं।