अमेरिका युद्ध से निकलना चाहता है पर इजरायल नहीं
प्रकाशित: 11-04-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
पिछले कई सप्ताह से अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ चल रहा युद्ध अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में पहचाने जाने वाला अमेरिका अब इस युद्ध से बाहर निकलना चाहता है पर इस युद्ध में उसके साथ शामिल उसका दोस्त इजरायल अभी ईरान से युद्ध खत्म करने के लिए तैयार नहीं है। इसका इशारा पिछले दो-तीन दिनों की घटनाओं से स्पष्ट रूप से मिल जाता है। अमेरिका के इशारे पर उसके पिट्ठू पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच जो 14 दिन के सीजफायर की सहमति बनाई है उससे इजरायल संतुष्ट दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि सीजफायर पर अमेरिका-ईरान की सहमति के बावजूद उसने गुरुवार को ऐलान किया कि उसकी सेनाओं ने बेरूत में रातभर चले हमले में ईरान समर्थित लेबनानी समूह हिजबुल्लाह के प्रमुख नईम कासिम के भतीजे को मार गिराया है। यदि यह सच है तो यह हिजबुल्लाह के साथ-साथ ईरान के लिए भी बड़ा झटका है क्योंकि हिजबुल्लाह मध्य पूर्व में ईरान के प्रमुख सहयोगियों में से एक है। इतना ही नहीं, मीडिया रिपोर्टें में यह जानकारी भी सामने आ रही है कि इन हमलों में 254 लोगों की जान जा चुकी है और 1165 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि सीजफायर में लेबनान और हिजबुल्लाह शामिल नहीं हैं। इस हमले से नाराज ईरान के विदेशमंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि यदि लेबनान पर हमले नहीं रोके गए तो ईरान सीजफायर के समझौते को रद्द कर देगा। अराघची ने एक्स पर लिखा कि अमेरिका-ईरान सीजफायर की शर्तें बिल्कुल स्पष्ट है। अमेरिका को या तो सीजफायर को चुनना होगा या फिर इजरायल के माध्यम से युद्ध जारी रखना होगा। वह दोनों नहीं चुन सकता। अब सवाल उठता है कि सीजफायर पर बनी सहमति के बावजूद इस पर खतरे के बादल क्यों मंडराने लगे हैं। इसका जवाब जानने के लिए हमें यह देखना होगा कि जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो उनके लक्ष्य क्या थे और क्या वह पूरे हो गए हैं। पहले अमेरिका की बात करते हैं। इस युद्ध को शुरू करने के पीछे अमेरिका के दो उद्देश्य थे। पहला ईरान के शासन में बदलाव और दूसरा उसे यूरेनियम संवर्धन से रोकना ताकि वह एटम बम बनाकर दूसरे देशों को धमका न सके। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद जब ईरान ने होर्मूज ब्लाक कर दिया तो अमेरिका की समझ में आ गया कि इससे दुनिया में उथल-पुथल मच सकती है। उसने तुरंत अपनी रणनीति में बदलाव लाते हुए कहा कि ईरान होर्मूज ब्लाक को खोल दे नहीं तो हम उसे पाषाण युग में भेज देंगे। इससे साबित होता है कि अमेरिका का इसमें से शायद कोई भी उद्देश्य नहीं था। अमेरिका एक सीमा से ज्यादा युद्ध बढ़ाना नहीं चाहता था। वह जानता है कि यदि उसने युद्ध बढ़ाया तो उसे अपने सैनिक ईरान की जमीन पर उतारने होंगे। ऐसा करके अमेरिका वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में अपने हाथ पहले ही जला चुका है। अमेरिका हथियारों का सबसे बड़ा व्यापारी है। वह चाहता है कि युद्ध के खतरे से दूसरे देश डरें और उसके हथियार बिकते रहें। उसका यह उद्देश्य लगभग पूरा हो चुका है इसीलिए वह ईरान में युद्ध से बाहर निकलना चाहता है। जहां तक इजरायल का सवाल है तो इजरायल जानता है कि परमाणु शक्ति संपन्न ईरान उसके अस्तित्व के लिए खतरा है। इसीलिए ईरान को इतना कमजोर कर दिया जाना चाहिए कि वह आने वाले कई दशकों तक उसके लिए खतरा न बन सके। इसी उद्देश्य के चलते इजरायल हिजबुल्लाह पर हमले करते हुए यह कह रहा है कि सीजफायर के लिए बनी सहमति में लेबनान और हिजबुल्लाह शामिल नहीं हैं। अपने इसी उद्देश्य के चलते इजरायल अभी युद्ध समाप्त नहीं करना चाहता। उसका कहना है कि उसे 45 साल में यह मौका पहली बार मिला है। जाहिर है कि वह इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहेगा। देखा जाए तो अमेरिका और इजरायल अपने-अपने लक्ष्यों के काफी करीब पहुंच चुके हैं। बातचीत की टेबल पर इजरायल का यह व्यवहार ईरान पर दबाव बनाने के लिए भी हो सकता है। ईरान ने इस युद्ध में बहुत कुछ खोया है। इसे ईरानी नेतृत्व की नाकामी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।
पिछले कई सप्ताह से अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ चल रहा युद्ध अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में पहचाने जाने वाला अमेरिका अब इस युद्ध से बाहर निकलना चाहता है पर इस युद्ध में उसके साथ शामिल उसका दोस्त इजरायल अभी ईरान से युद्ध खत्म करने के लिए तैयार नहीं है। इसका इशारा पिछले दो-तीन दिनों की घटनाओं से स्पष्ट रूप से मिल जाता है। अमेरिका के इशारे पर उसके पिट्ठू पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच जो 14 दिन के सीजफायर की सहमति बनाई है उससे इजरायल संतुष्ट दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि सीजफायर पर अमेरिका-ईरान की सहमति के बावजूद उसने गुरुवार को ऐलान किया कि उसकी सेनाओं ने बेरूत में रातभर चले हमले में ईरान समर्थित लेबनानी समूह हिजबुल्लाह के प्रमुख नईम कासिम के भतीजे को मार गिराया है। यदि यह सच है तो यह हिजबुल्लाह के साथ-साथ ईरान के लिए भी बड़ा झटका है क्योंकि हिजबुल्लाह मध्य पूर्व में ईरान के प्रमुख सहयोगियों में से एक है। इतना ही नहीं, मीडिया रिपोर्टें में यह जानकारी भी सामने आ रही है कि इन हमलों में 254 लोगों की जान जा चुकी है और 1165 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि सीजफायर में लेबनान और हिजबुल्लाह शामिल नहीं हैं। इस हमले से नाराज ईरान के विदेशमंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि यदि लेबनान पर हमले नहीं रोके गए तो ईरान सीजफायर के समझौते को रद्द कर देगा। अराघची ने एक्स पर लिखा कि अमेरिका-ईरान सीजफायर की शर्तें बिल्कुल स्पष्ट है। अमेरिका को या तो सीजफायर को चुनना होगा या फिर इजरायल के माध्यम से युद्ध जारी रखना होगा। वह दोनों नहीं चुन सकता। अब सवाल उठता है कि सीजफायर पर बनी सहमति के बावजूद इस पर खतरे के बादल क्यों मंडराने लगे हैं। इसका जवाब जानने के लिए हमें यह देखना होगा कि जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो उनके लक्ष्य क्या थे और क्या वह पूरे हो गए हैं। पहले अमेरिका की बात करते हैं। इस युद्ध को शुरू करने के पीछे अमेरिका के दो उद्देश्य थे। पहला ईरान के शासन में बदलाव और दूसरा उसे यूरेनियम संवर्धन से रोकना ताकि वह एटम बम बनाकर दूसरे देशों को धमका न सके। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद जब ईरान ने होर्मूज ब्लाक कर दिया तो अमेरिका की समझ में आ गया कि इससे दुनिया में उथल-पुथल मच सकती है। उसने तुरंत अपनी रणनीति में बदलाव लाते हुए कहा कि ईरान होर्मूज ब्लाक को खोल दे नहीं तो हम उसे पाषाण युग में भेज देंगे। इससे साबित होता है कि अमेरिका का इसमें से शायद कोई भी उद्देश्य नहीं था। अमेरिका एक सीमा से ज्यादा युद्ध बढ़ाना नहीं चाहता था। वह जानता है कि यदि उसने युद्ध बढ़ाया तो उसे अपने सैनिक ईरान की जमीन पर उतारने होंगे। ऐसा करके अमेरिका वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में अपने हाथ पहले ही जला चुका है। अमेरिका हथियारों का सबसे बड़ा व्यापारी है। वह चाहता है कि युद्ध के खतरे से दूसरे देश डरें और उसके हथियार बिकते रहें। उसका यह उद्देश्य लगभग पूरा हो चुका है इसीलिए वह ईरान में युद्ध से बाहर निकलना चाहता है। जहां तक इजरायल का सवाल है तो इजरायल जानता है कि परमाणु शक्ति संपन्न ईरान उसके अस्तित्व के लिए खतरा है। इसीलिए ईरान को इतना कमजोर कर दिया जाना चाहिए कि वह आने वाले कई दशकों तक उसके लिए खतरा न बन सके। इसी उद्देश्य के चलते इजरायल हिजबुल्लाह पर हमले करते हुए यह कह रहा है कि सीजफायर के लिए बनी सहमति में लेबनान और हिजबुल्लाह शामिल नहीं हैं। अपने इसी उद्देश्य के चलते इजरायल अभी युद्ध समाप्त नहीं करना चाहता। उसका कहना है कि उसे 45 साल में यह मौका पहली बार मिला है। जाहिर है कि वह इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहेगा। देखा जाए तो अमेरिका और इजरायल अपने-अपने लक्ष्यों के काफी करीब पहुंच चुके हैं। बातचीत की टेबल पर इजरायल का यह व्यवहार ईरान पर दबाव बनाने के लिए भी हो सकता है। ईरान ने इस युद्ध में बहुत कुछ खोया है। इसे ईरानी नेतृत्व की नाकामी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।