चीन के विस्तारवाद से दुनिया की शांति खतरे में
प्रकाशित: 07-12-2025 | लेखक: संपादकीय टीम
आदित्य नरेन्द्र
अभी रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त भी नहीं हुआ और चीन-ताइवान के बीच युद्ध के आसार दिखाई देने लगे हैं। चीन की विस्तारवाद की नीति से पहले भी दुनिया की शांति खतरे में दिखाई देती थी। अब एक बार और ऐसा ही दिखाई दे रहा है। इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर है। दरअसल चीन आर्थिक स्थिति की बदहाली से जूझ रहा है। ऐसे में यदि वह अपनी जनता का ध्यान बांटने करने के लिए ताइवान के साथ युद्ध छेड़ दे तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। उसकी इस मंशा को वह देश भी समझ रहे हैं जो यथास्थिति के समर्थक हैं और जो यह चाहते हैं कि चीन ताइवान से दूर रहे। इस मामले ने तूल तब पकड़ा जब अमेरिकी स्ट्रेटजिक फोर्सेज के कमांडर जनरल एंथनी कॉटन ने यूएस कांग्रेस को बताया कि चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने अपनी सेना को निर्देश दिया कि वह 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने के लिए तैयार रहे। ऐसी भी खबरें आई कि चीन अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए लगातार अपने परमाणु हथियारों का भंडार और क्षमता बढ़ा रहा है। यह हथियार जमीन, हवा और समुद्र से दागे जाने की क्षमता रखते हैं। चीन की कथनी और करनी में कितना फर्क है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि चीन एक तरफ तो यह दावा करता रहा है कि वह किसी गैर परमाणु देश के खिलाफ परमाणु हथियार नहीं तानेगा तो वहीं दूसरी ओर वह अपने परमाणु भंडार में तेजी से वृद्धि कर रहा है। परमाणु हथियारों के जखीरे में उसकी यह वृद्धि दूसरे परमाणु संपन्न देशों के मुकाबले कहीं अधिक तेज है। इससे उसकी नीयत पर शक होता है । इसने अमेरिका को चौकन्ना कर दिया है। इसी के चलते अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि चीन ने जबरदस्ती ताइवान पर कब्जा करने की कोशिश की तो इंडो-पैसेफिक क्षेत्र और पूरी दुनिया पर इसका असर बहुत बुरा होगा। हेगसेथ ने चीन पर साइबर हमलें, अपने पड़ोसियों को डराने और दक्षिण चीन सागर में अवैध कब्जा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि चीन लगातार ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास कर रहा है जो युद्ध की तैयारी लगती है। अमेरिकी रक्षामंत्री के रुख ने चीन की ताइवान और जापान के साथ चल रही जुबानी जंग को और तेज कर दिया है। ताइवान सरकार ने चीन के दावों को नकारते हुए कहा कि ताइवान के लोग ही यह तय करेंगे कि उनका भविष्य क्या होगा। ताइवानी राष्ट्रपति ने जब अगले आठ वर्षें में रक्षा क्षेत्र में अतिरिक्त 40 अरब डालर खर्च करने की योजना बनाई तो चीन ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह पैसा बर्बाद होगा और ताइवान को इससे नुकसान ही होगा। चीन के जवाब पर पलटवार करते हुए ताइवान ने कहा कि चीन का रक्षा बजट ताइवान से कई गुना ज्यादा है। यदि चीन शांति चाहता है तो वह इस पैसे का इस्तेमाल अपने नागरिकों की भलाई में करें। इस विवाद में उस समय जापान की एंट्री भी हो गई जब यह खबर आई कि जापान ताइवान से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर अपने एक द्वीप पर मिसाइलें तैनात करने की तैयारी कर रहा है। इस पर चीन ने जापान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जापान ताइवान के मामले में दखल देता है या लाइन क्रास करता है तो उसे बहुत दर्दनाक कीमत चुकानी पड़ेगी। गौरतलब है कि जापान और ताइवान की सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर है ऐसे में इन दोनों देशों के खिलाफ चीन की सैन्य कार्रवाई का अर्थ यह होगा कि अमेरिका और नाटो देश भी इस लड़ाई में कूदने के लिए बाध्य होंगे। दूसरी ओर चीन के साथ कुछ हद तक रूस दिखाई दे सकता है। जहां तक भारत का सवाल है तो भारत इस मामले में बेहद सावधानी के साथ कदम उठाएगा क्योंकि हमारी हजारों किलोमीटर की सीमा चीन से लगती है। अपने पड़ोसियों की जमीन का काफी हिस्सा उसने दबा रखा है। लेकिन चीन का ताइवान पर हाथ डालना इतना आसान नहीं है। यदि चीन ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दुनिया की शांति खतरे में पड़ जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो चीन को इसकी बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अभी रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त भी नहीं हुआ और चीन-ताइवान के बीच युद्ध के आसार दिखाई देने लगे हैं। चीन की विस्तारवाद की नीति से पहले भी दुनिया की शांति खतरे में दिखाई देती थी। अब एक बार और ऐसा ही दिखाई दे रहा है। इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर है। दरअसल चीन आर्थिक स्थिति की बदहाली से जूझ रहा है। ऐसे में यदि वह अपनी जनता का ध्यान बांटने करने के लिए ताइवान के साथ युद्ध छेड़ दे तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। उसकी इस मंशा को वह देश भी समझ रहे हैं जो यथास्थिति के समर्थक हैं और जो यह चाहते हैं कि चीन ताइवान से दूर रहे। इस मामले ने तूल तब पकड़ा जब अमेरिकी स्ट्रेटजिक फोर्सेज के कमांडर जनरल एंथनी कॉटन ने यूएस कांग्रेस को बताया कि चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने अपनी सेना को निर्देश दिया कि वह 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने के लिए तैयार रहे। ऐसी भी खबरें आई कि चीन अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए लगातार अपने परमाणु हथियारों का भंडार और क्षमता बढ़ा रहा है। यह हथियार जमीन, हवा और समुद्र से दागे जाने की क्षमता रखते हैं। चीन की कथनी और करनी में कितना फर्क है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि चीन एक तरफ तो यह दावा करता रहा है कि वह किसी गैर परमाणु देश के खिलाफ परमाणु हथियार नहीं तानेगा तो वहीं दूसरी ओर वह अपने परमाणु भंडार में तेजी से वृद्धि कर रहा है। परमाणु हथियारों के जखीरे में उसकी यह वृद्धि दूसरे परमाणु संपन्न देशों के मुकाबले कहीं अधिक तेज है। इससे उसकी नीयत पर शक होता है । इसने अमेरिका को चौकन्ना कर दिया है। इसी के चलते अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि चीन ने जबरदस्ती ताइवान पर कब्जा करने की कोशिश की तो इंडो-पैसेफिक क्षेत्र और पूरी दुनिया पर इसका असर बहुत बुरा होगा। हेगसेथ ने चीन पर साइबर हमलें, अपने पड़ोसियों को डराने और दक्षिण चीन सागर में अवैध कब्जा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि चीन लगातार ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास कर रहा है जो युद्ध की तैयारी लगती है। अमेरिकी रक्षामंत्री के रुख ने चीन की ताइवान और जापान के साथ चल रही जुबानी जंग को और तेज कर दिया है। ताइवान सरकार ने चीन के दावों को नकारते हुए कहा कि ताइवान के लोग ही यह तय करेंगे कि उनका भविष्य क्या होगा। ताइवानी राष्ट्रपति ने जब अगले आठ वर्षें में रक्षा क्षेत्र में अतिरिक्त 40 अरब डालर खर्च करने की योजना बनाई तो चीन ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह पैसा बर्बाद होगा और ताइवान को इससे नुकसान ही होगा। चीन के जवाब पर पलटवार करते हुए ताइवान ने कहा कि चीन का रक्षा बजट ताइवान से कई गुना ज्यादा है। यदि चीन शांति चाहता है तो वह इस पैसे का इस्तेमाल अपने नागरिकों की भलाई में करें। इस विवाद में उस समय जापान की एंट्री भी हो गई जब यह खबर आई कि जापान ताइवान से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर अपने एक द्वीप पर मिसाइलें तैनात करने की तैयारी कर रहा है। इस पर चीन ने जापान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जापान ताइवान के मामले में दखल देता है या लाइन क्रास करता है तो उसे बहुत दर्दनाक कीमत चुकानी पड़ेगी। गौरतलब है कि जापान और ताइवान की सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर है ऐसे में इन दोनों देशों के खिलाफ चीन की सैन्य कार्रवाई का अर्थ यह होगा कि अमेरिका और नाटो देश भी इस लड़ाई में कूदने के लिए बाध्य होंगे। दूसरी ओर चीन के साथ कुछ हद तक रूस दिखाई दे सकता है। जहां तक भारत का सवाल है तो भारत इस मामले में बेहद सावधानी के साथ कदम उठाएगा क्योंकि हमारी हजारों किलोमीटर की सीमा चीन से लगती है। अपने पड़ोसियों की जमीन का काफी हिस्सा उसने दबा रखा है। लेकिन चीन का ताइवान पर हाथ डालना इतना आसान नहीं है। यदि चीन ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दुनिया की शांति खतरे में पड़ जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो चीन को इसकी बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।