तमिलनाडु पर चढ़ने लगा भगवा रंग
प्रकाशित: 14-12-2025 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
देर से ही सही पर अब तमिलनाडु के हिंदू भी अपने धार्मिक अधिकारों को लेकर जागरुक हो रहे हैं और डीएमके सरकार पर दबाव बनाने के लिए इकट्ठा होने लगे हैं जोकि कुछ साल पहले तक असंभव लगता था। वैसे तो वहां के हिंदू समाज में यह बदलाव धीरे-धीरे आ रहा था लेकिन पिछले दिनों इसने उस समय तेजी पकड़ ली जब मदुरै जिले के प्रसिद्ध अरुलामिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर के पास तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी के कार्तिगई दीपम विवाद को लेकर हलचल तेज हो गई। यह पूरा मामला वहां की एक पहाड़ी पर स्थित देव स्थान पर दीप जलाने को लेकर है। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार इस पहाड़ी के ऊपर पत्थर के एक खम्बे पर दीये को जलाने की एक प्रथा थी लेकिन दशकों से इस परंपरा को निभाया नहीं गया था। हाल ही में भक्तों ने इस परंपरा को शुरू करते हुए प्राचीन दीपथून स्तंभ पर ही दीप जलाने की पेशकश की लेकिन मंदिर स्तंभ के पास दरगाह होने से विवाद बढ़ गया। मामले को एकल न्यायाधीश के सामने ले जाया गया जहां न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि कीर्तिगई दीपम इस बार से अपने मूल स्थान पर ही जलेगा। इसके लिए उन्होंने पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था देखने का भी निर्देश दिया लेकिन स्पष्ट आदेश दिए जाने के बाद भी उसका पालन नहीं किया गया। कुछ हिन्दू संगठनों के लोगों ने जब पहाड़ी पर चढ़कर दीप जलाने की कोशिश की तो पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई जिसमें कुछ लोग घायल हो गए। इस मामले को लेकर एक ओर जहां तमिलनाडु की स्टालिन सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है तो वहीं दूसरी ओर हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ विपक्ष के नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने महाभियोग प्रस्ताव भी रखा है। उल्लेखनीय है कि तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी भगवान मुरुगन के छह पवित्र आश्रयों अरुपदई वीडु में से एक है। इस पहाड़ी पर चट्टान काटकर गुफानुमा मंदिर बनाया गया है। यह तमिलनाडु भर के श्रद्धालुओं के लिए लम्बे समय से एक तीर्थस्थल रहा है। इसके समीप एक दरगाह है। हिन्दू और मुस्लिम समुदायों में इस पहाड़ी पर अधिकार को लेकर तनाव होता रहा है। मंदिर और दरगाह ने 1920 में पहली बार पहाड़ी पर कानूनी अधिकार को लेकर चुनौती दी थी। एक सिविल कोर्ट ने पहले फैसला दिया था कि दरगाह से जुड़े कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यह पहाड़ी सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की है। इस फैसले से पहाड़ी के स्वामित्व का निपटारा तो हो गया लेकिन इसमें रीति-रिवाजों, परंपराओं का उल्लेख नहीं किया गया। इसी के चलते इस विवाद ने जोर पकड़ा। हाईकोर्ट की मदुरै बैंच के फैसले के समर्थकों का मानना है कि यह घटना डीएमके की लम्बे समय से चली आ रही हिंदू विरोधी सोच का परिणाम है जो सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर हिंदू परंपराओं को दबाने की कोशिश करती है। चूंकि द्रविड आंदोलन ब्राह्मण विरोध और हिंदू परंपराओं के खिलाफ रहा है ऐसे में डीएमके ने हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति की है। इस स्थिति को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान भी बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि मैं समझता हूं कि तमिलनाडु में हिन्दुओं का जागना ही मनचाहे परिणाम के लिए काफी है। लेकिन यदि फिर भी इसकी आवश्यकता पड़ी तो तमिलनाडु में हिंदू संगठन काम कर रहे हैं, वह हमें बताएंगे। फिर हम इस बारे में सोचेंगे। इस समय मुझे लगता है कि तमिलनाडु में हिंदुओं के सामर्थ्य के आधार पर ही इस मुद्दे का हल निकल सकता है। लेकिन एक बात पक्की है कि यह मामला हिन्दुओं के पक्ष में ही सुलझेगा। इस मामले में संघ प्रमुख का बयान लगता है कि अब तमिलनाडु पर भी भगवा रंग चढ़ने लगा है। वहां हिंदू विरोधी ताकतें अपना प्रभाव खोती जा रही हैं जबकि हिन्दुओं में अपने धार्मिक अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। फिलहाल तो हमें इस प्रािढया के पूरा होने का इंतजार करना होगा।
देर से ही सही पर अब तमिलनाडु के हिंदू भी अपने धार्मिक अधिकारों को लेकर जागरुक हो रहे हैं और डीएमके सरकार पर दबाव बनाने के लिए इकट्ठा होने लगे हैं जोकि कुछ साल पहले तक असंभव लगता था। वैसे तो वहां के हिंदू समाज में यह बदलाव धीरे-धीरे आ रहा था लेकिन पिछले दिनों इसने उस समय तेजी पकड़ ली जब मदुरै जिले के प्रसिद्ध अरुलामिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर के पास तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी के कार्तिगई दीपम विवाद को लेकर हलचल तेज हो गई। यह पूरा मामला वहां की एक पहाड़ी पर स्थित देव स्थान पर दीप जलाने को लेकर है। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार इस पहाड़ी के ऊपर पत्थर के एक खम्बे पर दीये को जलाने की एक प्रथा थी लेकिन दशकों से इस परंपरा को निभाया नहीं गया था। हाल ही में भक्तों ने इस परंपरा को शुरू करते हुए प्राचीन दीपथून स्तंभ पर ही दीप जलाने की पेशकश की लेकिन मंदिर स्तंभ के पास दरगाह होने से विवाद बढ़ गया। मामले को एकल न्यायाधीश के सामने ले जाया गया जहां न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि कीर्तिगई दीपम इस बार से अपने मूल स्थान पर ही जलेगा। इसके लिए उन्होंने पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था देखने का भी निर्देश दिया लेकिन स्पष्ट आदेश दिए जाने के बाद भी उसका पालन नहीं किया गया। कुछ हिन्दू संगठनों के लोगों ने जब पहाड़ी पर चढ़कर दीप जलाने की कोशिश की तो पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई जिसमें कुछ लोग घायल हो गए। इस मामले को लेकर एक ओर जहां तमिलनाडु की स्टालिन सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है तो वहीं दूसरी ओर हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ विपक्ष के नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने महाभियोग प्रस्ताव भी रखा है। उल्लेखनीय है कि तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी भगवान मुरुगन के छह पवित्र आश्रयों अरुपदई वीडु में से एक है। इस पहाड़ी पर चट्टान काटकर गुफानुमा मंदिर बनाया गया है। यह तमिलनाडु भर के श्रद्धालुओं के लिए लम्बे समय से एक तीर्थस्थल रहा है। इसके समीप एक दरगाह है। हिन्दू और मुस्लिम समुदायों में इस पहाड़ी पर अधिकार को लेकर तनाव होता रहा है। मंदिर और दरगाह ने 1920 में पहली बार पहाड़ी पर कानूनी अधिकार को लेकर चुनौती दी थी। एक सिविल कोर्ट ने पहले फैसला दिया था कि दरगाह से जुड़े कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यह पहाड़ी सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की है। इस फैसले से पहाड़ी के स्वामित्व का निपटारा तो हो गया लेकिन इसमें रीति-रिवाजों, परंपराओं का उल्लेख नहीं किया गया। इसी के चलते इस विवाद ने जोर पकड़ा। हाईकोर्ट की मदुरै बैंच के फैसले के समर्थकों का मानना है कि यह घटना डीएमके की लम्बे समय से चली आ रही हिंदू विरोधी सोच का परिणाम है जो सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर हिंदू परंपराओं को दबाने की कोशिश करती है। चूंकि द्रविड आंदोलन ब्राह्मण विरोध और हिंदू परंपराओं के खिलाफ रहा है ऐसे में डीएमके ने हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति की है। इस स्थिति को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान भी बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि मैं समझता हूं कि तमिलनाडु में हिन्दुओं का जागना ही मनचाहे परिणाम के लिए काफी है। लेकिन यदि फिर भी इसकी आवश्यकता पड़ी तो तमिलनाडु में हिंदू संगठन काम कर रहे हैं, वह हमें बताएंगे। फिर हम इस बारे में सोचेंगे। इस समय मुझे लगता है कि तमिलनाडु में हिंदुओं के सामर्थ्य के आधार पर ही इस मुद्दे का हल निकल सकता है। लेकिन एक बात पक्की है कि यह मामला हिन्दुओं के पक्ष में ही सुलझेगा। इस मामले में संघ प्रमुख का बयान लगता है कि अब तमिलनाडु पर भी भगवा रंग चढ़ने लगा है। वहां हिंदू विरोधी ताकतें अपना प्रभाव खोती जा रही हैं जबकि हिन्दुओं में अपने धार्मिक अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। फिलहाल तो हमें इस प्रािढया के पूरा होने का इंतजार करना होगा।