पढ़ाई-लिखाई से कट्टरवाद का लेना-देना नहीं
प्रकाशित: 16-11-2025 | लेखक: संपादकीय टीम
आदित्य नरेन्द्र
पिछले दिनों लाल किले के समीप हुए विस्फोट मामले ने पूरे देश में एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि पढ़ाई-लिखाई से कट्टरवाद या आतंकवाद का कुछ लेना-देना नहीं है। दुनिया में हुए सबसे बड़े आतंकी हमले का सरगना ओसामा बिन लादेन और उसकी टीम के कई लोग अच्छे-खासे पढ़े लिखे थे। उसी तरह गत मंगलवार को लाल किले के समीप जो विस्फोट हुआ था उसमें मारा गया आतंकी और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपी भी उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। अभी तक जो लोग पकड़े गए हैं या जिनकी पहचान हुई है उनमें एक दो नहीं बल्कि 6 डाक्टर शामिल हैं। यह वहीं डाक्टर हैं जो करदाताओं के पैसे पर डाक्टर बने हैं और जिन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई के बाद मानवता की रक्षा करने और लोगों की जान बचाने की शपथ ली थी। इनमें से एक डाक्टर तो उसी कार में मौजूद था जिसमें यह धमाका हुआ है। इस धमाके में मारे गए आतंकी की पहचान पुलवामा के डाक्टर उमर नबी के रूप में हुई है। इस डाक्टर का संबंध फरीदाबाद स्थित आतंकी मॉड्यूल से था जिसका पर्दाफाश वहां से विस्फोटक बरामद होने के बाद हुआ था। दूसरे आरोपी डाक्टरों में शामिल है डॉ. मुज्जमिल, डॉ. सज्जाद अहमद, डॉ. शाहीन शाहिद, डॉ. आदिल मोहम्मद और डॉक्टर परवेज अंसारी। इनके पास से 2900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट नाम का विस्फोटक बरामद हुआ है। इस विस्फोटक की मात्रा से यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि उनकी प्लानिंग बहुत बड़ी थी जिसके लिए वह न जाने कितने समय से यह विस्फोटक एकत्रित कर रहे थे। सोचने की बात है कि यदि यह आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते तो क्या होता। देशवासियों को खुफिया और सुरक्षा एंजेसियों का पागुजार होना चाहिए जिनकी मुस्तेदी से इस बड़े संकट को टालने में मदद मिली। दरअसल इस मामले के खुलासे की शुरुआत उस समय हुई जब पुलवामा में दीवारों पर लगे कुछ पोस्टर दिखाई दिए। इन पोस्टरों में स्थानीय लोगों को कहा गया था कि वह भारतीय जांच एजेंसियों से दूर रहें। जब इन पोस्टरों को लगाने वालों की जांच हुई तो शोपियां का एक मौलवी पकड़ में आया। इरफान अहमद नाम के इस मोलवी ने डॉ. अहमद का नाम लिया। उससे पूछताछ के बाद इस साजिश की परतें खुलती चली गईं। पाकिस्तानी सरकार और सेना का सोचना था कि यदि इस साजिश में डाक्टरों जैसे उच्च पेशेवर लोग शामिल होंगे तो कोई उन पर शक नहीं करेगा। यदि कभी कोई आतंकी पकड़ा गया तो वह आराम से कह देंगे कि यह भारत सरकार और भारतीयों के बीच का मामला है। इसी बीच उन्हेंने इस्लामाबाद में हुए एक बम विस्फोट में भारत का हाथ बताकर खुद को भी आतंकवाद का पीड़ित बताने का ढोंग किया ताकि विश्व जनमत उनके खिलाफ न हो। लेकिन इसका भेद जल्द ही खुल गया। जिसके चलते अब पाकिस्तानी सरकार और सेना की पेशानी पर बल पड़ने शुरू हो गए हैं। वह जानते हैं कि भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित किया है, खत्म नहीं किया है। ऐसे में उन्हें अमेरिका पर भरोसा है कि वह उन्हें बचाने के लिए आगे आएगा। अमेरिका पाकिस्तान को बचाने के लिए आगे आता है या नहीं इस पर बात करना अभी बेमानी है। फिलहाल तो आतंकी विचारधारा के पनपने का संकट हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है। यदि साजिशकर्ता पढ़े-लिखे लोगों की ब्रेन वाशिंग कर उन्हें ट्रेनिंग देने में कामयाब हो जाएंगे तो सोचिए क्या होगा। धर्म के नाम पर आतंक फैलाना नामंजूर होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर का नारा दिया था। लगता है उसका कोई असर नहीं हुआ। इसका अंदाजा उसी समय लग जाना चाहिए था जब जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को कोई खास जनसमर्थन नहीं मिला था। तब घाटी में भाजपा को समर्थन न मिलने पर कह दिया गया था कि वहां भाजपा के पास संगठन नहीं था। इसलिए उसे कामयाबी नहीं मिली। देश को इस कट्टरपंथी विचारधारा का मुकाबला करना ही होगा। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। लीपापोती करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। जिस तरह गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद की कमर तोड़ी है, ठीक उसी तरह स्पष्ट नीति अपनाकर आतंकवाद की कमर भी तोड़नी होगी। इसके लिए जो लोग आतंकियों को कवर फायर देते हैं उनकी पहचान कर उन्हें दंडित करना होगा ताकि धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर वह आतंकियों को बचा न पाएं।
पिछले दिनों लाल किले के समीप हुए विस्फोट मामले ने पूरे देश में एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि पढ़ाई-लिखाई से कट्टरवाद या आतंकवाद का कुछ लेना-देना नहीं है। दुनिया में हुए सबसे बड़े आतंकी हमले का सरगना ओसामा बिन लादेन और उसकी टीम के कई लोग अच्छे-खासे पढ़े लिखे थे। उसी तरह गत मंगलवार को लाल किले के समीप जो विस्फोट हुआ था उसमें मारा गया आतंकी और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपी भी उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। अभी तक जो लोग पकड़े गए हैं या जिनकी पहचान हुई है उनमें एक दो नहीं बल्कि 6 डाक्टर शामिल हैं। यह वहीं डाक्टर हैं जो करदाताओं के पैसे पर डाक्टर बने हैं और जिन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई के बाद मानवता की रक्षा करने और लोगों की जान बचाने की शपथ ली थी। इनमें से एक डाक्टर तो उसी कार में मौजूद था जिसमें यह धमाका हुआ है। इस धमाके में मारे गए आतंकी की पहचान पुलवामा के डाक्टर उमर नबी के रूप में हुई है। इस डाक्टर का संबंध फरीदाबाद स्थित आतंकी मॉड्यूल से था जिसका पर्दाफाश वहां से विस्फोटक बरामद होने के बाद हुआ था। दूसरे आरोपी डाक्टरों में शामिल है डॉ. मुज्जमिल, डॉ. सज्जाद अहमद, डॉ. शाहीन शाहिद, डॉ. आदिल मोहम्मद और डॉक्टर परवेज अंसारी। इनके पास से 2900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट नाम का विस्फोटक बरामद हुआ है। इस विस्फोटक की मात्रा से यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि उनकी प्लानिंग बहुत बड़ी थी जिसके लिए वह न जाने कितने समय से यह विस्फोटक एकत्रित कर रहे थे। सोचने की बात है कि यदि यह आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते तो क्या होता। देशवासियों को खुफिया और सुरक्षा एंजेसियों का पागुजार होना चाहिए जिनकी मुस्तेदी से इस बड़े संकट को टालने में मदद मिली। दरअसल इस मामले के खुलासे की शुरुआत उस समय हुई जब पुलवामा में दीवारों पर लगे कुछ पोस्टर दिखाई दिए। इन पोस्टरों में स्थानीय लोगों को कहा गया था कि वह भारतीय जांच एजेंसियों से दूर रहें। जब इन पोस्टरों को लगाने वालों की जांच हुई तो शोपियां का एक मौलवी पकड़ में आया। इरफान अहमद नाम के इस मोलवी ने डॉ. अहमद का नाम लिया। उससे पूछताछ के बाद इस साजिश की परतें खुलती चली गईं। पाकिस्तानी सरकार और सेना का सोचना था कि यदि इस साजिश में डाक्टरों जैसे उच्च पेशेवर लोग शामिल होंगे तो कोई उन पर शक नहीं करेगा। यदि कभी कोई आतंकी पकड़ा गया तो वह आराम से कह देंगे कि यह भारत सरकार और भारतीयों के बीच का मामला है। इसी बीच उन्हेंने इस्लामाबाद में हुए एक बम विस्फोट में भारत का हाथ बताकर खुद को भी आतंकवाद का पीड़ित बताने का ढोंग किया ताकि विश्व जनमत उनके खिलाफ न हो। लेकिन इसका भेद जल्द ही खुल गया। जिसके चलते अब पाकिस्तानी सरकार और सेना की पेशानी पर बल पड़ने शुरू हो गए हैं। वह जानते हैं कि भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित किया है, खत्म नहीं किया है। ऐसे में उन्हें अमेरिका पर भरोसा है कि वह उन्हें बचाने के लिए आगे आएगा। अमेरिका पाकिस्तान को बचाने के लिए आगे आता है या नहीं इस पर बात करना अभी बेमानी है। फिलहाल तो आतंकी विचारधारा के पनपने का संकट हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है। यदि साजिशकर्ता पढ़े-लिखे लोगों की ब्रेन वाशिंग कर उन्हें ट्रेनिंग देने में कामयाब हो जाएंगे तो सोचिए क्या होगा। धर्म के नाम पर आतंक फैलाना नामंजूर होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर का नारा दिया था। लगता है उसका कोई असर नहीं हुआ। इसका अंदाजा उसी समय लग जाना चाहिए था जब जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को कोई खास जनसमर्थन नहीं मिला था। तब घाटी में भाजपा को समर्थन न मिलने पर कह दिया गया था कि वहां भाजपा के पास संगठन नहीं था। इसलिए उसे कामयाबी नहीं मिली। देश को इस कट्टरपंथी विचारधारा का मुकाबला करना ही होगा। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। लीपापोती करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। जिस तरह गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद की कमर तोड़ी है, ठीक उसी तरह स्पष्ट नीति अपनाकर आतंकवाद की कमर भी तोड़नी होगी। इसके लिए जो लोग आतंकियों को कवर फायर देते हैं उनकी पहचान कर उन्हें दंडित करना होगा ताकि धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर वह आतंकियों को बचा न पाएं।