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बिहार चुनाव में किसका पलड़ा भारी

प्रकाशित: 26-10-2025 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
बिहार चुनाव में किसका पलड़ा भारी
आदित्य नरेन्द्र
अगले महीने होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। यह चुनाव इस बात का संकेत देंगे कि देश की राजनीति में विपक्ष की क्या भूमिका होगी। उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की अंतिम तिथि निकल चुकी है और अभी तक बिहार के राजनीतिक मैदान में जो कुछ भी हुआ है उससे लगता है कि भाजपा की अगुवाई वाला राजग बेहतर स्थिति में है लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दोनों गठबंधनों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की है। वैसे तो दोनों गठबंधनों के बीच शह-मात का खेल कई महीने पहले ही शुरू हो गया था। इसकी झलक उस समय मिली जब दोनों पक्षों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए फ्रीबीज की घोषणा की। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को दस हजार रुपए, सभी पेंशनभोगियों के लिए पेंशन में वृद्धि (400 से 1100 रुपए) और श्रम कार्ड वाले श्रमिकों के लिए पांच हजार रुपए दने की घोषणा की। इसके जवाब में तेजस्वी ने माई-बहन योजना के तहत महिलाओ के ढाई हजार प्रतिमाह, प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और संविदा कर्मचारियों को स्थाई दर्जा देने का वादा किया है। यह वादे अपने पक्ष में हवा बनाने की एक शुरुआती कोशिश भर है। दरअसल बिहार के पिछले कई चुनावों में महिला वोटरों को निर्णायक भूमिका निभाते हुए देखा गया है। इसी वजह से दोनों पक्षों के बीच महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है। लेकिन सिर्फ महिला वोटरों के सहारे ही चुनावी जंग जीतना आसान नहीं हैं। इसके लिए गठबंधन में शामिल पार्टियों की एकजुटता, सीट बंटवारें पर सहमति और सही उम्मीदवारों के चयन के साथ-साथ उचित रणनीति भी बेहद जरूरी है। इस मामले में राजग बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। हालांकि राजग में हम के जीतनराम मांझी और रालोमों के उपेन्द्र कुशवाह जैसे छोटे सहयोगियों ने सीट बंटवारे पर शुरू में नाखुशी जताई थी लेकिन समझौते के बाद वह राजग के दूसरे घटकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रचार कर रहे हैं। इसके उलट विपक्षी महागठबंधन को आंतरिक मतभेदों को सुलझाने के लिए आपस में जूझना पड़ा जिससे कीमती समय बर्बाद हुआ। इसके बावजूद भी यदि 11 सीटों पर फ्रेंडली फाइट का गीत गाया जा रहा हो तो क्या कहा जाएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह फ्रेंडली फाइट एक ओर जहां गठबंधन के बीच की दरारों को उजागर करेगी तो वहीं दूसरी ओर महागठबंधन को बहुमत से दूर भी कर सकती है। इस तरह यदि देखा जाए तो एकजुटता और सीट बंटवारे पर सहमति के मामले में राजग बेहतर स्थिति में है। अब बात उचित रणनीति की करते हैं। इस बार राजग ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। भाजपा और जदयू ने अपने-अपने मतदाता आधार वाले उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं। भाजपा ने अपने कोटे से सवर्ण जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं तो वहीं जदयू ने ओबीसी, ईबीसी और एससी को 74 टिकट दिए हैं जिनमें से नीतीश के समर्थक माने जाने वाले लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) को 25 टिकट मिले हैं। राजग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का पूरा लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। पिछले चुनाव में जदयू का प्रदर्शन कमजोर रहा था। राजद के साथ उसका 71 सीटों पर आमने-सामने मुकाबला हुआ था। जिसमें जदयू महज 21 सीटें ही जीत सकी थी। इस बार राजद के खिलाफ 62 सीटों पर भाजपा और 56 सीटों पर जद यू चुनाव लड़ रही है। देखना होगा कि रणनीति में यह बदलाव क्या गुल खिलाता है। उधर राजद के अति पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ से जुड़े करीब 50 नेताओं के इस्तीफे और झारखंड मुक्ति मोर्चा की नाराजगी का क्या असर पड़ेगा। इसका पता चुनाव परिणाम आने के बाद ही मिलेगा। एक और दिलचस्प फैक्टर प्रशांत किशोर उर्फ पीके का है जिनकी पार्टी खुद तो शायद ही कोई सीट जीत पाएगी लेकिन उसके उम्मीदवार किसका नुकसान करेंगे इसका अंदाजा तो शायद अभी पीके को भी नहीं होगा। फिलहाल राजग आगे दिखाई देता है।