ममता बनर्जी बनाम चुनाव आयोग, गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में
प्रकाशित: 08-02-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
एसआईआर को लेकर जिस तरह एक राज्य सरकार और चुनाव आयोग आमने-सामने खड़े हैं वह आजाद भारत के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच का है। इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट को अपनी बात समझाने के लिए तीन जजों की बेंच के सामने खुद पेश हो गईं और सुप्रीम कोर्ट को अपनी दलीलों से आश्वस्त करने की भरपूर कोशिश की। ऐसा नहीं है कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखने के लिए बड़े वकील नहीं थे। उनके पास कपिल सिब्बल कल्याण बनर्जी और श्याम दीवान जैसे बड़े और वरिष्ठ वकील थे तो फिर ममता बनर्जी को मैदान में क्यों उतरना पड़ा यह राजनीतिक बहस का मुद्दा हो सकता है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि एक मौजूद मुख्यमंत्री का वकील की हैसियत से शीर्ष अदालत में दलीलें देना अनोखा है। अब सवाल पूछा जा सकता है कि क्या कोई भी व्यक्ति इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रख सकता है। इसका जवाब नहीं में हैं। ममता बनर्जी लॉ ग्रेजुएट हैं। उन्होंने एलएलबी की डिग्री ली हुई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए सिर्फ लॉ की डिग्री लेना काफी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकार्ड के जरिए ही याचिका दायर की जा सकती है। नियम के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास सिर्फ कानून की डिग्री है तो वह सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर नहीं कर सकता क्योंकि इसे दायर करने का हक सिर्फ एडवोकेट आन रिकार्ड को है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर पार्टी इन पर्सन बनकर बहस के दौरान अपनी बात रखी जा सकती है। इसी नियम पर चलते हुए ममता बनर्जी ने पार्टी इन पर्सन बनकर अपनी बात रखी जिसकी इजाजत वह पहले ही सुप्रीम कोर्ट से ले चुकी थीं। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस विपुल पंचोली और जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने उन्होंने चुनाव आयोग को घेरने का भरपूर प्रयास किया। उनके आरोपों का जवाब देने में चुनाव आयोग के वकील ने भी कोई कोताही नहीं बरती। जब ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों से माइाढाs ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं तो उनके आरोपों का जवाब देते हुए चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि राज्य सरकार से बार-बार कहने के बावजूद भी एसआईआर के काम के लिए समुचित ग्रुप बी के अधिकारी नहीं दिए गए। इसी के चलते हमें माइाढाs ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान राज्य सरकार के असहयोग को रेखांकित करते हुए कहा कि अन्य राज्यों में एसआईआर की प्रािढया बिना किसी बड़ी घटना या रूकावट के पूरी हो गई लेकिन पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है। वहां चुनाव अधिकारियों के खिलाफ हिंसा हो रही है। उन्हें धमकियां मिल रही हैं। ऐसे हालात बन गए हैं जिसमें चुनाव अधिकारी काम करने में असमर्थ हैं। इससे पूर्व गत सोमवार को ममता बनर्जी ने नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलकर एसआईआर पर आपत्तियां जताई थीं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह भाजपा के इशारे पर पश्चिम बंगाल को निशाना बना रहा है। ममता बनर्जी का यह व्यवहार समस्या के हल की बजाए सुर्खियां बटोरने पर ज्यादा केंद्रित थीं। शायद वह अंदरखाने जानती थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा राहत नहीं मिल पाएगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ममता बनर्जी फिर सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंची। इस पर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी आगामी चुनावों को देखते हुए माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने का भरपूर प्रयास कर रही हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने या चुनाव आयोग के हारने की उम्मीद शायद ही रही होगी। दरअसल ममता बनर्जी अपने राज्य के मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनका नाम वोटर लिस्ट में बनाए रखने के लिए वह केंद्र सरकार से लोहा ले रही हैं। इसलिए मतदाताओं को उनके पक्ष में खड़े होना चाहिए। राज्य में आगे बढ़ती भाजपा के खिलाफ मतदाताओं को लामबंद करने का उनके पास शायद और कोई बेहतर तरीका नहीं है। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है।
एसआईआर को लेकर जिस तरह एक राज्य सरकार और चुनाव आयोग आमने-सामने खड़े हैं वह आजाद भारत के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच का है। इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट को अपनी बात समझाने के लिए तीन जजों की बेंच के सामने खुद पेश हो गईं और सुप्रीम कोर्ट को अपनी दलीलों से आश्वस्त करने की भरपूर कोशिश की। ऐसा नहीं है कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखने के लिए बड़े वकील नहीं थे। उनके पास कपिल सिब्बल कल्याण बनर्जी और श्याम दीवान जैसे बड़े और वरिष्ठ वकील थे तो फिर ममता बनर्जी को मैदान में क्यों उतरना पड़ा यह राजनीतिक बहस का मुद्दा हो सकता है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि एक मौजूद मुख्यमंत्री का वकील की हैसियत से शीर्ष अदालत में दलीलें देना अनोखा है। अब सवाल पूछा जा सकता है कि क्या कोई भी व्यक्ति इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रख सकता है। इसका जवाब नहीं में हैं। ममता बनर्जी लॉ ग्रेजुएट हैं। उन्होंने एलएलबी की डिग्री ली हुई है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए सिर्फ लॉ की डिग्री लेना काफी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकार्ड के जरिए ही याचिका दायर की जा सकती है। नियम के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास सिर्फ कानून की डिग्री है तो वह सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर नहीं कर सकता क्योंकि इसे दायर करने का हक सिर्फ एडवोकेट आन रिकार्ड को है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर पार्टी इन पर्सन बनकर बहस के दौरान अपनी बात रखी जा सकती है। इसी नियम पर चलते हुए ममता बनर्जी ने पार्टी इन पर्सन बनकर अपनी बात रखी जिसकी इजाजत वह पहले ही सुप्रीम कोर्ट से ले चुकी थीं। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस विपुल पंचोली और जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने उन्होंने चुनाव आयोग को घेरने का भरपूर प्रयास किया। उनके आरोपों का जवाब देने में चुनाव आयोग के वकील ने भी कोई कोताही नहीं बरती। जब ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों से माइाढाs ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं तो उनके आरोपों का जवाब देते हुए चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि राज्य सरकार से बार-बार कहने के बावजूद भी एसआईआर के काम के लिए समुचित ग्रुप बी के अधिकारी नहीं दिए गए। इसी के चलते हमें माइाढाs ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान राज्य सरकार के असहयोग को रेखांकित करते हुए कहा कि अन्य राज्यों में एसआईआर की प्रािढया बिना किसी बड़ी घटना या रूकावट के पूरी हो गई लेकिन पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है। वहां चुनाव अधिकारियों के खिलाफ हिंसा हो रही है। उन्हें धमकियां मिल रही हैं। ऐसे हालात बन गए हैं जिसमें चुनाव अधिकारी काम करने में असमर्थ हैं। इससे पूर्व गत सोमवार को ममता बनर्जी ने नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलकर एसआईआर पर आपत्तियां जताई थीं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह भाजपा के इशारे पर पश्चिम बंगाल को निशाना बना रहा है। ममता बनर्जी का यह व्यवहार समस्या के हल की बजाए सुर्खियां बटोरने पर ज्यादा केंद्रित थीं। शायद वह अंदरखाने जानती थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा राहत नहीं मिल पाएगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ममता बनर्जी फिर सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंची। इस पर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी आगामी चुनावों को देखते हुए माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने का भरपूर प्रयास कर रही हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने या चुनाव आयोग के हारने की उम्मीद शायद ही रही होगी। दरअसल ममता बनर्जी अपने राज्य के मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनका नाम वोटर लिस्ट में बनाए रखने के लिए वह केंद्र सरकार से लोहा ले रही हैं। इसलिए मतदाताओं को उनके पक्ष में खड़े होना चाहिए। राज्य में आगे बढ़ती भाजपा के खिलाफ मतदाताओं को लामबंद करने का उनके पास शायद और कोई बेहतर तरीका नहीं है। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है।