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मुइवाह ः 6 दशकों के बाद घर वापसी

प्रकाशित: 02-11-2025 | लेखक: संपादकीय टीम
मुइवाह ः 6 दशकों के बाद घर वापसी
आदित्य नरेन्द्र
पिछले दिनों उत्तर पूर्वी भारत में एक ऐतिहासिक घटना घटित हुई जब एनएससीएन (आईएम) गुट के सह संस्थापक टी मुइवाह 6 दशक से अधिक समय तक दक्षिण एशिया में चल रहे सबसे लम्बे सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व करने के बाद अपने लोगों के पास एक बुजुर्ग संरक्षक और प्रमुख शांति वार्ताकार नेता के रूप में लौटे। लम्बे समय से नाराज संघर्ष का चेहरा रहे मुइवाह के लिए 1964 के बाद यह पहला अवसर था जब वह अपनी जन्मभूमि सोमदल को देखने के लिए वापस आए थे। लगभग 6 दशक पहले उन्होंने नागालैंड की स्वतंत्रता के मुद्दे पर अपना गांव छोड़ दिया था। मुइवाह का जन्म 1933 में म्यांमार से सटे उखरुल जिले के सोमदल गांव में हुआ था। शिलांग के एक कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 1964 में नागा नेशनल काउंसिल में शामिल हो गए। अगले साल ही उन्हें महासचिव चुन लिया गया। इसके बाद वह नागा उग्रवादियों के पहले समूह के साथ सशस्त्र प्रशिक्षण के लिए चीन चले गए जहां उन्होंने करीब दस साल बिताए। मुइवाह 1970 के दशक में मणिपुर में मोस्ट वांटेड थे। उनके सिर पर इनाम की शुरुआती राशि उस जमाने में एक लाख रुपए थी जिसे कई बार बढ़ाया गया था। वर्ष 1975 में शिलांग समझौते के बाद समूह को अन्य नेताओं के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने नागा नेशनल काउंसिल छोड़ दी और इसाक चिशी के साथ मिलकर जनवरी 1980 में एनएससीएन (आईएम) का गठन किया। लेकिन 1988 में इस संगठन के दो हिस्से हो गए। इसके बाद इसमें से कई गुट बन गए जो एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे रहे। इसके बावजूद इस उग्रवादी नेता की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। मुइवाह 1997 के युद्ध विराम समझौते के बाद से केंद्र सरकार के साथ वार्ता कर रहे हैं। वह 2015 में फ्रेमवर्क एग्रीमेंट और 2002 में एक्सटर्डम संयुक्त संवाद को नागा राजनीतिक समाधान की वैध नींव बताते हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने नागा राष्ट्रीय झंडे और संविधान को मान्यता देने में समझौते की भावना का अपमान किया है। उन्होंनें कहा कि हम राजनीतिक वार्ता समाप्त करने के लिए तैयार हैं लेकिन यदि केंद्र सैन्य समाधान लागू करता है तो हम मैदान पर भी तैयार हैं। यह अपने समर्थकों को साथ बनाए रखने वाली भाषा है। नागालैंड को एक दिसम्बर 1963 को अलग राज्य का दर्जा मिला था। स्थानीय जनजातियां भारत में विलय के खिलाफ थीं। यही कारण है कि राज्य में सशस्त्र उग्रवादी आंदोलन का एक लम्बा इतिहास रहा है। नागालैंड पूर्वोत्तर का एक अकेला ऐसा राज्य है जो अभी तक उग्रवाद से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सका है। बीते करीब 28 वर्षों से राज्य में शांति प्रािढया की कवायद जारी रहने के बावजूद जमीनी हालात में खास बदलाव नहीं आया है। मुइवाह ने जून 2001 में भी अपने पैतृक गांव का दौरा करने की कोशिश की थी। मैत्रेयी संगठनों ने इसका भारी हिंसक विरोध किया था। दरअसल मणिपुर के कुछ इलाकों को ग्रेटर नागालैंड में शामिल करने की मांग मैत्रेयी संगठनों की नाराजगी की प्रमुख वजह थी। अब मणिपुर में बर्फ पिघलने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। मुइवाह की घर वापसी यात्रा के दौरान केवल नागा ही नहीं बल्कि मैतेई समुदाय के लोग भी शामिल थे। इस लिहाज से मुइवाह का दौरा मणिपुर में 2023 में हुए मैतेई और कुकी समुदाय की हिंसक झड़पों के बाद महत्वपूर्ण है। इनमें 260 से अधिक लोग मारे गए थे और लगभग 70 हजार विस्थापित हुए थे। अब हालात काफी बदल चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नागा संगठनों को इसी बात का संतोष है कि केंद्र सरकार ने उनकी पहचान और अनूठे इतिहास को मान्यता दे दी है। अब अलग राज्य का कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बने रहने के लिए मुइवाह अलग झंडे और संविधान की मांग तो उठाते ही रहेंगे लेकिन ग्रेटर नागालैंड का मुद्दा अब पृष्ठभूमि में चला गया है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर को अलग संविधान और अलग झंडे के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। ऐसे में नागालैंड को इसकी छूट देना मुमकिन नहीं है। मुइवाह इस बात को समझते होंगे। उनका दौरा केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना संभव नहीं है। उम्मीद है कि उनकी घर वापसी से उन्हें आगे का रोडमैप बनाकर समस्या का हल निकालने में मदद मिलेगी।