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लोन-फ्रॉड से बैंकों की साख पर सवाल

प्रकाशित: 09-11-2025 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
लोन-फ्रॉड से बैंकों की साख पर सवाल
आदित्य नरेन्द्र
ईडी ने हाल ही में अनिल अंबानी समूह की कंपनियों के खिलाफ अपनी जांच के तहत 7500 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क की है। बताया जाता है कि ईडी का यह मामला रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी सहयोगी कंपनियों द्वारा 2010 से 2012 के बीच लिए गए लोन पर केंद्रित है। एजेंसी के मुताबिक कुल बकाया 40185 करोड़ रुपए है और पांच बैंकों ने इन लोन खातों को फ्रॉड घोषित किया है। ईडी का कहना है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच आरकॉम और उसकी समूह कंपनियों ने बैंकों से हजारों करोड़ रुपए जुटाए जिनमें से 19694 करोड़ रुपए अब भी बकाया है। यह खाते अब एनपीए बन चुके हैं जिससे बैंकों को बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी वजह से एक बार फिर लोन फ्रॉड से बैंकें की साख पर सवाल उठने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि लोन देने के मामले में एक आम आदमी और बड़े आदमियों के बीच इतना फर्क क्यों हैं। जब एक आम आदमी किसी बैंक में लोन लेने के लिए जाता है तो उसे चक्कर कटवाए जाते हैं। दुनियाभर की औपचारिकताएं पूरी करवाई जाती हैं जबकि वही बैंक अनिल अंबानी, नीरव मोदी, विजय माल्या या मेहुल चौकसे जैसे लोगों को किस तरह लोन दिया करते थे यह अब सामने आ चुका है। बैंकों में जमा पैसा आम आदमी की जमा पूंजी है। पीएनबी स्कैम के समय ऐसी खबरे चली थी जिनमें कहा गया था कि बैंक के ग्राहकों के पास दवा खरीदने और किराया देने तक के पैसे नहीं बचे थे। बैंक ऊंची दर पर कर्ज देते हैं ऐसे में यदि पैसा डूब जाए तो इसका नुकसान जमाकर्ताओं को ही होता है। सरकार को बताना चाहिए कि अंबानी मामले में बैंक कर्मियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। आरबीआई उस पर संज्ञान ले और ऐसे बैंकों पर लगाम कसे। यदि एनपीए ज्यादा होने की वजह से कोई बैंक फेल हो जाए तो एक खातेदार को अधिकतम पांच लाख रुपए ही वापस मिल सकते हैं, चाहे उस बैंक में उसके करोड़ों रुपए ही क्यों न जमा हो। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। तत्कालीक प्रभाव तो यह होता है कि भारी मात्रा में धन की हानि होती है। जिसमें अक्सर आम लोगों की बचत शामिल होती है। राजकोष पर भारी बोझ पड़ता है। सरकारी बैंकों के मामले में इन घोटालों से हुए नुकसान की भरपाई अंतत करदताओं के पैसे से करनी पड़ती है जिससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ना स्वाभाविक है। बैंकों के साथ धोखाधड़ी से एक बड़ा नुकसान यह भी होता है कि बैंक का बैड लोन बढ़ता है जिससे एनपीए में वृद्धि का सीधा-साधा अर्थ बैंकों की वित्तीय स्थिति का कमजोर होना है। जब बैंकों की वित्तीय स्थिति कमजोर होती है तो बैंकिंग प्रणाली में आम लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है। अपने पैसे की असुरक्षा को भांपकर लोग बैंकों में पैसा जमा कराने से कतराने लगते हैं। इससे निवेशकों का विश्वास भी कमजोर होता है। यह बात घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों पर लागू होती है। जब किसी बैंक की वित्तीय स्थिति कमजोर हो जाए तो ऐसे बैंक नए लोन देने में सक्षम नहीं होते जिसका असर उनके कामकाज पर पड़ता है। व्यवसाय के लिए पूंजी की उपलब्धता कम होने का मतलब है आर्थिक विकास की गति का धीमा पड़ जाना। बड़े घोटाले शेयर बाजार में उथल-पुथल का कारण भी बन सकते हैं। हालांकि बैंकिंग व्यवस्था की साख बचाने के लिए सरकारें सचेत रहती हैं क्येंकि वह इसके नुकसान को समझती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए संबंधित बैंकों पर नए लोन देने, नए निवेश करने या ग्राहकों द्वारा पैसे निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। कुछ मामलों में गंभीर रूप से प्रभावित बैंकों को स्थिर करने के लिए उनका अन्य बैंकों में विलय करना पड़ता है या फिर उन्हें बंद भी किया जा सकता है। इसके अलावा बैंक कर्मियों और धोखेबाजों की गिरफ्तारी भी की जा सकती है। स्पष्ट है कि ऐसे में बैंक घोटाले वित्तीय प्रणाली की नींव हिला देते है। इससे बड़े पैमाने पर आर्थिक हानि, विश्वास की कमी और देश की समग्र आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुंचता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि लोन घोटाले आम जनता के लिए एक गंभीर खतरा है जो लोगों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य और देश की वित्तीय प्रणाली में भरोसे का क्षरण करते है। बैंकों की साख बचाने के लिए लोन फ्रॉड को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए ताकि देश की बैंकिंग व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।