आधारभूत और आधेयभूत सत्ता तथा सृष्टि
प्रकाशित: 04-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
शिव शंकर द्विवेदी
जो लोग संस्कृत भाषा से परिचित नहीं हैं उनके लिए भारतीय दर्शन में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को समझने में असुविधा होती है। इन्ही शब्दों में आधारभूत और आधेयभूत सत्ता को समझने की चुनौती कुछ पाठकों के समक्ष रही है। इन पाठकों की सुविधा के लिए आवश्यक हो जाता है कि मैं भारतीय दर्शनशास्त्र में वर्णित सृष्टि को समझने के सन्दर्भ में प्रयुक्त आधारभूत और आधेयभूत सत्ता के अर्थ को समझने के लिए एक टिप्पणी दूं।
उक्त शब्दों अर्थात् आधार भूत सत्ता और आधेयभूत सत्ता को इस प्रकार समझें कि आधेयभूत सत्ता वह है जो किसी आधार पर आधारित हो और आधारभूत सत्ता वह है जिस पर कोई सत्ता आधारित होती है जैसे चेतना आधेयभूत सत्ता है और चेतन आधार भूत सत्ता है। चेतना, चेतन पर ही आधारित रहती है। चेतना का आधार चेतन है और चेतन का आधेय चेतना है। चेतना को धारित करने के कारण ही आत्मा चेतन है।
आधारभूत और आधेयभूत सत्ताओं का सम्बन्ध - ऋचाओं में समझा गया है कि दोनों अर्थात् आधेयभूत एवं आधारभूत सत्ताएं एक दूसरे से शाश्वत रूप से अयुतसिद्ध सम्बन्ध में सम्बद्ध हैं क्योंकि निरपेक्ष रूप में इनका न तो अस्तित्व देखा गया है न सोचा ही जा सकता है। यदि इनके अलग-अलग अस्तित्व का होना सोचा गया तो वह केवल काल्पनिक सोच ही हो सकेगी जबकि ऋचाओं में कल्पना नहीं अपितु साक्षात्कार के माध्यम से यथास्थिति का वर्णन किया गया है। यही कारण है कि ऋचाओं में चेतना अन्तिम सत्ता नहीं समझी गई है अपितु अन्तिम सत्ता के रूप में जो समझा गया है उसका साक्षात्कार इस प्रकार हुआ है कि वह आनीदवातं स्वधयातदेकं था अर्थात् मूलभूत सत्ता वह है जो जड़चेतनात्मक ही नहीं अपितु जड़चेतनवान् भी है जिसमें संघनित रूप से चेतन और अचेतन दोनों होते हैं। जड़चेतनवान् का यही संघनित रूप जब प्रस्फुटित होता है या विघटित होता है तब वर्तमान सृष्टि के रूप में संघनित सृष्टि रूपांतरित होती है जिसका वर्णन नासदीय सूक्त की 5वीं ऋचा और ऋग्वेद के 10वें मंडल के 190वें सूक्त की तीन ऋचाओं में है।
परिवर्तन और आधाराधेय सत्ता - सृष्टि के सम्बन्ध में जो अनुभव हुआ है उसके आधार पर यह समझा जा सकता है कुछ भी स्थाई नहीं है न आधेय न आधार। आधारभूत सत्ता स्थाई होते हुए भी आधेयभूत सत्ताओं के परिवर्तनों के माध्यम से परिवर्तित होता है भले ही इन परिवर्तनों के साक्षी के रूप में वह अपरिवर्तित रहता है। अपरिवर्तित रहते हुए भी आधारभूत सत्ता की प्रास्थितियों में परिवर्तन होता रहता है। चेतना के स्तरों में परिवर्तन होता है, चेतन में नहीं किन्तु चेतना के परिवर्तित होने से चेतन की प्रास्थिति में परिवर्तन होता है।
वर्तमान सृष्टि के सम्बन्ध में मतभेद - यह अलग बात है कि इस विन्दु पर मतभेद है कि संघनित रूप प्रस्फुटित कैसे होता है? नासदीय सूक्त की 4 थी ऋचा में समझा गया है कि ऋषियों ने कल्पना की है कि परमात्मा ने तपस्या की जिसके परिणामस्वरूप संघनित रूप प्रस्फुटित हुआ है जबकि 6ठीं ऋचा में इस मत का खंडन किया गया है कि किसी ने तपस्या की है जिसके फलस्वरूप वर्तमान सृष्टि हुई है क्योंकि इस तथ्य का सत्यापन संभव नहीं है कि किसी ने तपस्या की है या नहीं। इस प्रकार ऋषियों की उस कल्पना को अन्तिम स्थिति के रूप में नहीं समझा गया है कि परमात्मा ने तपस्या की जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान सृष्टि अस्तित्व में आ सकी है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद के 10वें मंडल के 190वें सूक्त की तीसरी ऋचा से स्पष्ट है कि संघनित का प्रस्फुटित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है यह प्रक्रिया वर्तमान के पूर्व भी घटित हो चुकी है और यह वर्तमान सृष्टि पूर्व में घटित सृष्टि के समान ही है-'...यथापूर्वमकल्यत्' इस तथ्य की ओर संकेत कर रहा है कि वर्तमान सृष्टि पूर्व की ही भांति है।
सृष्टि का कोई स्रष्टा नहीं है- यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अकल्पयत् शब्द से यह भ्रम हो सकता है कि कोई स्रष्टा है जिसने वर्तमान सृष्टि को पूर्व की भांति रचा है किन्तु ऋग्वेद के 10 वें मंडल के अन्तिम सूक्त में वर्णित ऋचाओं को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि हमसे अपेक्षा की जा रही है कि हम संघ या समाज के साथ रहें न कि वर्तमान सृष्टि के किसी परिकल्पित स्रष्टा के साक्षात्कार करने या उसे हवि प्रदान करने का उपाम करें। यदि वास्तविक रूप से कोई स्रष्टा रहा होता जिसकी तपस्या से वर्तमान सृष्टि उद्भूत हुई होती तो निश्चित रूप से वह स्रष्टा ही हमारा उपास्य होता और हमसे अपेक्षा की गई होती कि हम उसे हवि देकर उसकी उपासना करें जबकि हमसे अपेक्षा की जा रही है कि हम सब साथ-साथ रहें,एक दूसरे के समान विचारों के साथ रहें।
सृष्टि स्वाभाविक प्रािढया है- ऋग्वेद के 10 वें मंडल के अन्तिम सूक्त में जो हमसे अपेक्षा की गई है उससे यह सिद्ध होता है कि संघनित का प्रस्फुटित होना और प्रस्फुटित का संघनित होना उसी तरह की स्वाभाविक प्रक्रिया है जैसे बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज होने की स्वाभाविक प्रक्रिया होती रहती है। बीज को वृक्ष के रूप में होने के लिए किसी स्रष्टा के होने की कल्पना का कोई औचित्य नहीं है अपितु यह समझने का ही औचित्य है कि बीज से वृक्ष का होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया भर है। बीज में वृक्ष बनने की संभावनाएं निहित हैं और वृक्ष में बीज उत्पन्न करने की संभावनाएं निहित हैं। बीज और वृक्ष के इस क्रम को समझाने के लिए ही कहा जाता हैं यद् पिंडे तत्ब्रह्मांडे या इसे इस तरह भी समझें कि यद्ब्रह्मांडे तद्पिंडे और यही है सर्वं खल्विदं ब्रह्म समझाने का प्रयास।
इस प्रकार से स्पष्ट है कि जो आनीदवातं स्वधयातदेकं के रूप में दिखा था जिसे तत्समय तद् के रूप में सम्बोधित किया गया था उसे ही कालान्तर में ब्रह्म शब्द से सम्बोधित किया गया है तो स्पष्ट रूप में समझ सकते हैं कि ब्रह्म कोई पूज्यनीय तत्त्व नहीं अपितु यह एक जैविक इकाई के रूप में वर्तमान संसार का संघनित रूप है जिसमें चेतन, अचेतन के साथ ही चेतनवान् भी संघनित रूप में संघनित हुए रहते हैं जो प्रस्फुटित होकर वर्तमान सृष्टि के रूप में हमारे समक्ष होते हैं।
श्रीकृष्ण ने इसी तथ्य को समझाने के लिए समझाया है कि प्रकृति क्षेत्र है और चेतन क्षेत्रज्ञ और परमात्मा भी क्षेत्रज्ञ ही हैं जो सभी चेनन के हृदय प्रदेश में रहते हैं। यही कारण है कि परमात्मा को चेतनवान् भी कहा जाता है यद्यपि वह किसी भी रूप में अचेन से भी पृथक् नहीं रहते हैं क्योंकि वह कभी भी अशरीरी नहीं रहते हैं अभिव्यक्त रूप में वह जीवों के हृदय प्रदेश में रहते हैं तो अनभिव्यक्त रूप में स्वधा के साथ रहते हैं।
उक्त से सुस्पष्ट है कि जो व्यक्ति सृष्टि को स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम समझने में सक्षम होता है उसके लिए न कोई पूज्य हो सकता है न घृणा का पात्र। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए श्रीकृष्ण ने उसे पंडित समझा है जिसकी दृष्टि में विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण और चांडाल दोनों समान रूप में समझे जा सकें।
जब सृष्टि स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम है तो समाज का अस्तित्व भी स्वाभाविक है जिसमें रहना भी स्वाभाविक स्थिति ही है और आनन्द के साथ रहना जीव की जैविक प्रवृत्ति है और जब एक से अधिक का अस्तित्व होता है तब एक व्यवस्था बनानी पड़ती है। वैसे तो व्यवस्था भी स्वाभाविक स्थिति है किन्तु व्यवस्था के विरुद्ध स्थितियों का होना अनपेक्षित परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस प्रकार की अनपेक्षित परिस्थितियों से उबरने हेतु ही ऐसी अपेक्षाएं की जाती हैं ताकि स्वाभाविक व्यवस्था में व्यवधान न हो। वैसे अनपेक्षित व्यवधान के विरुद्ध संघर्ष भी स्वाभाविक रूप से आरम्भ होता ही है फिर अपेक्षा की जाती है कि हम व्यवस्था में रहें ताकि स्वाभाविक रूप से अपेक्षित आनन्द को प्राप्त कर सकें अत एव व्यवस्था में रहना हमसे अपेक्षित हो जाता है। यदि सृष्टि स्वाभाविक न हो कर किसी विशिष्ट सत्ता की रचना होती तो हमसे व्यवस्था में रहने की अपेक्षा न होती अपितु स्रष्टा के आराधना की अपेक्षा होती।
ऋचाओं में व्यवस्था में रहने की अपेक्षा की गई है इससे स्पष्ट है कि ऋचाओं में सृष्टि को स्वाभाविक प्रक्रिया का ही परिणाम समझा गया है। ऐसी स्थिति में यदि कोई सृष्टि को किसी रचनाकार की रचना समझ रहा है तो वह निश्चित रूप से ऋचाओं के मन्तव्य से अलग मन्तव्य को मानने वाला ही हो सकता है और अलग मन्तव्य के साथ रहना कोई बुराई नहीं है किन्तु ऋचाओं के व्याख्याकार के रूप में ऋचाओं से भिन्न मत रखना ही ऋचाओं के प्रति उपेक्षात्मक दृष्टि हैहै। इस उपेक्षात्मक दृष्टि से दूर रहना ही अ-मोक्ष साधना है।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव उत्तर प्रदेश शासन हैं।)
जो लोग संस्कृत भाषा से परिचित नहीं हैं उनके लिए भारतीय दर्शन में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को समझने में असुविधा होती है। इन्ही शब्दों में आधारभूत और आधेयभूत सत्ता को समझने की चुनौती कुछ पाठकों के समक्ष रही है। इन पाठकों की सुविधा के लिए आवश्यक हो जाता है कि मैं भारतीय दर्शनशास्त्र में वर्णित सृष्टि को समझने के सन्दर्भ में प्रयुक्त आधारभूत और आधेयभूत सत्ता के अर्थ को समझने के लिए एक टिप्पणी दूं।
उक्त शब्दों अर्थात् आधार भूत सत्ता और आधेयभूत सत्ता को इस प्रकार समझें कि आधेयभूत सत्ता वह है जो किसी आधार पर आधारित हो और आधारभूत सत्ता वह है जिस पर कोई सत्ता आधारित होती है जैसे चेतना आधेयभूत सत्ता है और चेतन आधार भूत सत्ता है। चेतना, चेतन पर ही आधारित रहती है। चेतना का आधार चेतन है और चेतन का आधेय चेतना है। चेतना को धारित करने के कारण ही आत्मा चेतन है।
आधारभूत और आधेयभूत सत्ताओं का सम्बन्ध - ऋचाओं में समझा गया है कि दोनों अर्थात् आधेयभूत एवं आधारभूत सत्ताएं एक दूसरे से शाश्वत रूप से अयुतसिद्ध सम्बन्ध में सम्बद्ध हैं क्योंकि निरपेक्ष रूप में इनका न तो अस्तित्व देखा गया है न सोचा ही जा सकता है। यदि इनके अलग-अलग अस्तित्व का होना सोचा गया तो वह केवल काल्पनिक सोच ही हो सकेगी जबकि ऋचाओं में कल्पना नहीं अपितु साक्षात्कार के माध्यम से यथास्थिति का वर्णन किया गया है। यही कारण है कि ऋचाओं में चेतना अन्तिम सत्ता नहीं समझी गई है अपितु अन्तिम सत्ता के रूप में जो समझा गया है उसका साक्षात्कार इस प्रकार हुआ है कि वह आनीदवातं स्वधयातदेकं था अर्थात् मूलभूत सत्ता वह है जो जड़चेतनात्मक ही नहीं अपितु जड़चेतनवान् भी है जिसमें संघनित रूप से चेतन और अचेतन दोनों होते हैं। जड़चेतनवान् का यही संघनित रूप जब प्रस्फुटित होता है या विघटित होता है तब वर्तमान सृष्टि के रूप में संघनित सृष्टि रूपांतरित होती है जिसका वर्णन नासदीय सूक्त की 5वीं ऋचा और ऋग्वेद के 10वें मंडल के 190वें सूक्त की तीन ऋचाओं में है।
परिवर्तन और आधाराधेय सत्ता - सृष्टि के सम्बन्ध में जो अनुभव हुआ है उसके आधार पर यह समझा जा सकता है कुछ भी स्थाई नहीं है न आधेय न आधार। आधारभूत सत्ता स्थाई होते हुए भी आधेयभूत सत्ताओं के परिवर्तनों के माध्यम से परिवर्तित होता है भले ही इन परिवर्तनों के साक्षी के रूप में वह अपरिवर्तित रहता है। अपरिवर्तित रहते हुए भी आधारभूत सत्ता की प्रास्थितियों में परिवर्तन होता रहता है। चेतना के स्तरों में परिवर्तन होता है, चेतन में नहीं किन्तु चेतना के परिवर्तित होने से चेतन की प्रास्थिति में परिवर्तन होता है।
वर्तमान सृष्टि के सम्बन्ध में मतभेद - यह अलग बात है कि इस विन्दु पर मतभेद है कि संघनित रूप प्रस्फुटित कैसे होता है? नासदीय सूक्त की 4 थी ऋचा में समझा गया है कि ऋषियों ने कल्पना की है कि परमात्मा ने तपस्या की जिसके परिणामस्वरूप संघनित रूप प्रस्फुटित हुआ है जबकि 6ठीं ऋचा में इस मत का खंडन किया गया है कि किसी ने तपस्या की है जिसके फलस्वरूप वर्तमान सृष्टि हुई है क्योंकि इस तथ्य का सत्यापन संभव नहीं है कि किसी ने तपस्या की है या नहीं। इस प्रकार ऋषियों की उस कल्पना को अन्तिम स्थिति के रूप में नहीं समझा गया है कि परमात्मा ने तपस्या की जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान सृष्टि अस्तित्व में आ सकी है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद के 10वें मंडल के 190वें सूक्त की तीसरी ऋचा से स्पष्ट है कि संघनित का प्रस्फुटित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है यह प्रक्रिया वर्तमान के पूर्व भी घटित हो चुकी है और यह वर्तमान सृष्टि पूर्व में घटित सृष्टि के समान ही है-'...यथापूर्वमकल्यत्' इस तथ्य की ओर संकेत कर रहा है कि वर्तमान सृष्टि पूर्व की ही भांति है।
सृष्टि का कोई स्रष्टा नहीं है- यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अकल्पयत् शब्द से यह भ्रम हो सकता है कि कोई स्रष्टा है जिसने वर्तमान सृष्टि को पूर्व की भांति रचा है किन्तु ऋग्वेद के 10 वें मंडल के अन्तिम सूक्त में वर्णित ऋचाओं को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि हमसे अपेक्षा की जा रही है कि हम संघ या समाज के साथ रहें न कि वर्तमान सृष्टि के किसी परिकल्पित स्रष्टा के साक्षात्कार करने या उसे हवि प्रदान करने का उपाम करें। यदि वास्तविक रूप से कोई स्रष्टा रहा होता जिसकी तपस्या से वर्तमान सृष्टि उद्भूत हुई होती तो निश्चित रूप से वह स्रष्टा ही हमारा उपास्य होता और हमसे अपेक्षा की गई होती कि हम उसे हवि देकर उसकी उपासना करें जबकि हमसे अपेक्षा की जा रही है कि हम सब साथ-साथ रहें,एक दूसरे के समान विचारों के साथ रहें।
सृष्टि स्वाभाविक प्रािढया है- ऋग्वेद के 10 वें मंडल के अन्तिम सूक्त में जो हमसे अपेक्षा की गई है उससे यह सिद्ध होता है कि संघनित का प्रस्फुटित होना और प्रस्फुटित का संघनित होना उसी तरह की स्वाभाविक प्रक्रिया है जैसे बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज होने की स्वाभाविक प्रक्रिया होती रहती है। बीज को वृक्ष के रूप में होने के लिए किसी स्रष्टा के होने की कल्पना का कोई औचित्य नहीं है अपितु यह समझने का ही औचित्य है कि बीज से वृक्ष का होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया भर है। बीज में वृक्ष बनने की संभावनाएं निहित हैं और वृक्ष में बीज उत्पन्न करने की संभावनाएं निहित हैं। बीज और वृक्ष के इस क्रम को समझाने के लिए ही कहा जाता हैं यद् पिंडे तत्ब्रह्मांडे या इसे इस तरह भी समझें कि यद्ब्रह्मांडे तद्पिंडे और यही है सर्वं खल्विदं ब्रह्म समझाने का प्रयास।
इस प्रकार से स्पष्ट है कि जो आनीदवातं स्वधयातदेकं के रूप में दिखा था जिसे तत्समय तद् के रूप में सम्बोधित किया गया था उसे ही कालान्तर में ब्रह्म शब्द से सम्बोधित किया गया है तो स्पष्ट रूप में समझ सकते हैं कि ब्रह्म कोई पूज्यनीय तत्त्व नहीं अपितु यह एक जैविक इकाई के रूप में वर्तमान संसार का संघनित रूप है जिसमें चेतन, अचेतन के साथ ही चेतनवान् भी संघनित रूप में संघनित हुए रहते हैं जो प्रस्फुटित होकर वर्तमान सृष्टि के रूप में हमारे समक्ष होते हैं।
श्रीकृष्ण ने इसी तथ्य को समझाने के लिए समझाया है कि प्रकृति क्षेत्र है और चेतन क्षेत्रज्ञ और परमात्मा भी क्षेत्रज्ञ ही हैं जो सभी चेनन के हृदय प्रदेश में रहते हैं। यही कारण है कि परमात्मा को चेतनवान् भी कहा जाता है यद्यपि वह किसी भी रूप में अचेन से भी पृथक् नहीं रहते हैं क्योंकि वह कभी भी अशरीरी नहीं रहते हैं अभिव्यक्त रूप में वह जीवों के हृदय प्रदेश में रहते हैं तो अनभिव्यक्त रूप में स्वधा के साथ रहते हैं।
उक्त से सुस्पष्ट है कि जो व्यक्ति सृष्टि को स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम समझने में सक्षम होता है उसके लिए न कोई पूज्य हो सकता है न घृणा का पात्र। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए श्रीकृष्ण ने उसे पंडित समझा है जिसकी दृष्टि में विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण और चांडाल दोनों समान रूप में समझे जा सकें।
जब सृष्टि स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम है तो समाज का अस्तित्व भी स्वाभाविक है जिसमें रहना भी स्वाभाविक स्थिति ही है और आनन्द के साथ रहना जीव की जैविक प्रवृत्ति है और जब एक से अधिक का अस्तित्व होता है तब एक व्यवस्था बनानी पड़ती है। वैसे तो व्यवस्था भी स्वाभाविक स्थिति है किन्तु व्यवस्था के विरुद्ध स्थितियों का होना अनपेक्षित परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस प्रकार की अनपेक्षित परिस्थितियों से उबरने हेतु ही ऐसी अपेक्षाएं की जाती हैं ताकि स्वाभाविक व्यवस्था में व्यवधान न हो। वैसे अनपेक्षित व्यवधान के विरुद्ध संघर्ष भी स्वाभाविक रूप से आरम्भ होता ही है फिर अपेक्षा की जाती है कि हम व्यवस्था में रहें ताकि स्वाभाविक रूप से अपेक्षित आनन्द को प्राप्त कर सकें अत एव व्यवस्था में रहना हमसे अपेक्षित हो जाता है। यदि सृष्टि स्वाभाविक न हो कर किसी विशिष्ट सत्ता की रचना होती तो हमसे व्यवस्था में रहने की अपेक्षा न होती अपितु स्रष्टा के आराधना की अपेक्षा होती।
ऋचाओं में व्यवस्था में रहने की अपेक्षा की गई है इससे स्पष्ट है कि ऋचाओं में सृष्टि को स्वाभाविक प्रक्रिया का ही परिणाम समझा गया है। ऐसी स्थिति में यदि कोई सृष्टि को किसी रचनाकार की रचना समझ रहा है तो वह निश्चित रूप से ऋचाओं के मन्तव्य से अलग मन्तव्य को मानने वाला ही हो सकता है और अलग मन्तव्य के साथ रहना कोई बुराई नहीं है किन्तु ऋचाओं के व्याख्याकार के रूप में ऋचाओं से भिन्न मत रखना ही ऋचाओं के प्रति उपेक्षात्मक दृष्टि हैहै। इस उपेक्षात्मक दृष्टि से दूर रहना ही अ-मोक्ष साधना है।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव उत्तर प्रदेश शासन हैं।)